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भारतीयों के लिए एफडीआई के क्या हैं मायने

Last Updated- December 11, 2022 | 1:37 PM IST

 कुछ खास तरह के रुझानों का विश्लेषण करने वाले विश्लेषक इसे इस तथ्य के रूप में पेश कर रहे हैं कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, हालांकि यह बयान कारोबारी माहौल की भ्रामक तस्वीर को दर्शाता है। सफलता की धारणाओं के साथ तुलनात्मक आंकड़ों और सूचकांकों के संयोजन के प्रति  झुकाव जोखिम भरा है क्योंकि यह नीतिगत उपायों को गलत तरीके से पेश कर सकता है।
उदाहरण के तौर पर अब निष्क्रिय हो चुकी कारोबारी सुगमता (ईओडीबी) रैंकिंग से संकेत मिला है कि वैश्विक पूंजी आकर्षित करने की सफलता कुछ कठिन मानदंडों को पूरा करने में निहित है। कई अन्य मुद्दे हैं जिसे वैश्विक सूचकांक नहीं दर्शाते हैं लेकिन एक स्वस्थ कारोबारी माहौल बनाने में मदद करते हैं। ईओडीबी इसका बेहतर सबूत देता है।
कोविड-19 से पहले भी अधिक बेरोजगारी और वृद्धि में मंदी के बावजूद भारत 2014 के 142वें स्थान से 2020 में 63वें स्थान पर पहुंच गया। सालाना ईओडीबी रैंकिंग मीडिया की सुर्खियों में रही और इसकी वजह से चीन, अजरबैजान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की सरकारों ने डेटा में बदलाव की मांग की। यही कारण है कि विश्व बैंक ने इसे रद्द कर दिया।
लेकिन डॉलर खर्च करने का विकल्प तलाश रहे निवेशकों ने शायद ही इसे विश्वसनीय माना हो। अंकटाड की वैश्विक निवेश रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में कारोबारी सुगमता की 31वीं रैंकिंग के बावजूद चीन 2021 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिहाज से दूसरे पायदान पर रहा।
ईओडीबी की 63वीं रैंकिंग के साथ ही एफडीआई हिस्सेदारी के लिहाज से भारत सातवें स्थान पर था लेकिन 2021 में भारत पूंजी प्रवाह में कमी दर्ज करने वाला एकमात्र देश था ( ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि वर्ष 2020 के बाद से गूगल और फेसबुक के रिलायंस जियो की सहयोगी कंपनी कंपनी में निवेश के कारण इसमें भारी तेजी देखी गई थी।
सवाल यह है कि वास्तव में विदेशी प्रत्यक्ष निवेशक क्या चाहते हैं? कारोबारी सुगमता से जुड़े पुराने मानकों में  ‘निर्माण परमिट मिलने’ या ‘कारोबार शुरू करने’ में सहूलियत जैसे पैमाने मायने रखते हैं। लेकिन ये सभी एक आंशिक तस्वीर पेश करते हैं क्योंकि इसमें बड़ी कंपनियों के विचार ही परलक्षित होते हैं।
भारत में कारोबार करना वास्तव में कितना चुनौतीपूर्ण या सहूलियत से भरा है इसका अंदाजा लगाने के लिए वैश्विक निवेशकों को छोटे और मझोले कारोबारों (एसएमई) के कारोबारियों से बात करनी चाहिए जिनकी रोजगार देने में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
ये छोटे एवं मझोले उद्यम स्थानीय अफसरशाही प्रणाली की वास्तविक चुनौतीपूर्ण परिस्थियों के बीच काम करते हैं। भारत में कारोबार को स्थापित करने के लिए आज भी कई तरह के परमिट और लाइसेंस लेना अनिवार्य है जिसके लिए काफी जूझना पड़ता है ऐसे में इन उद्यमों की धारणा, बड़ी कंपनियों के समान नहीं हो सकती है जिनके पास पूंजी आसानी से सुलभ है। मंजूरी देने वाले संस्थानों में तारतम्यता न होने की वजह से एसएमई कारोबारियों को इन मुद्दों को हल करने के लिए अपने स्थानीय ‘संपर्कों’ और अक्सर स्थानीय तरीकों पर भरोसा करना पड़ता है।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ताकतवर नेताओं और अफसरों से आसानी से संपर्क बनाने वाली बड़ी कंपनियों की तुलना में इन छोटे एवं मझोले उद्यमों के लिए बिजली के कनेक्शन से लेकर कई परमिट हासिल करने की लागत काफी बढ़ जाती है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत में जितने भी यूनिकॉर्न यानी एक अरब डॉलर से अधिक की हैसियत रखने वाली कंपनियां या स्टार्टअप हैं उनका ताल्लुक आईटी क्षेत्र से हैं जहां स्थानीय लाइसेंस-परमिट व्यवस्था अपेक्षाकृत कम शोषण करने वाली है।
कारोबारी सुगमता से जुड़े मानकों में सुधार किए गए हैं जिसमें ‘दिवालियापन को हल करने’ में तेजी लाने जैसे प्रावधान शामिल हैं जिसके बलबूते भारत की रैकिंग दिवाला और ऋणशोघन अक्षमता संहिता के लागू होने के साथ ऊपर चली गई। लेकिन यह छोटे और मझोले उद्यमों के संदर्भ में निरर्थक है। इस संहिता प्रक्रिया का लाभ उठाने में सक्षम न होने के चलते अधिकांश एसएमई ने अपनी हजारों दुकानें बंद कर दीं, जैसा कि इन्हें वर्ष 2016, 2017 और 2020 में भी ऐसा करना पड़ा जब इन सालों के दौरान क्रमशः नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर लागू की गई और देश में कोविड-19 की वजह से लॉकडाउन लगाया गया।
अगर भारत में छोटे एवं मझोले उद्योग सुचारु रूप से काम नहीं कर पाते हैं तब बड़ी वैश्विक कंपनियों के लिए भी बेहतर तरीके से काम करने की संभावना नहीं बनेगी। हालांकि वास्तविकता यह भी है कि कुछ सरकारें ही कारोबारी सुगमता नीति पर ज्यादा ध्यान दे पाती हैं क्योंकि इससे अच्छे प्रचार की संभावना नहीं बन पाती है और न ही एसएमई राजनीतिक दलों का समर्थन करने के लिए कोई राजनीतिक योगदान दे पाते हैं।
मोदी सरकार ने भारत के कारोबारी माहौल में मौजूद खामियों से यथार्थवादी तरीके से निपटने की कोशिशों के तहत उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) के माध्यम से विदेशी निवेश के लिए नीतिगत प्रावधान किया है। चूंकि पीएलआई उद्यम अपेक्षाकृत तौर पर नए हैं, ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि वे कारगर होंगे या नहीं। लेकिन एक बात निश्चित तौर पर स्पष्ट हो रही है: इन प्रोत्साहनों के अल्पकालिक प्रकृति के होने की संभावना नहीं है क्योंकि भारत को वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे प्रतिद्वंद्वियों के साथ वैश्विक निवेश के लिए लगातार प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
निवेश प्रोत्साहन के पिछले अनुभवों में मुआवजे वाली नीतियों के साथ कारोबारी माहौल की सीमाएं स्पष्ट तौर पर दिखी हैं। सनसेट क्लॉज यानी ऐसी सार्वजनिक नीतियां जो किसी खास समय, तिथि के बाद वे लागू नहीं होती हैं, उनके प्रावधान के साथ ही लघु एवं मझोले क्षेत्रों की कंपनियां भी गायब हो गईं।
दक्षिण पूर्व एशिया में एफडीआई के लंबे अनुभव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि मुआवजे वाली नीतियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने से ऐसी स्थिति बनेगी जिसमें किसी दूसरे के नुकसान के साथ ही कोई समूह जीत हासिल कर सकता है। पीएलआई योजनाओं के केंद्र में आयात का विकल्प भी है जो 1970 और 1980 के दशक में असफल साबित हुआ। 
चीन और हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर, ताइवान दक्षिण कोरिया (एशियन टाइगर्स के नाम से पहचाने जाने वाले) का अनुभव, एक बुनियादी हकीकत की तरफ इशारा करता है। भारत को एक गतिशील वैश्विक निवेश के माध्यम के रूप में काम करने के लिए, इसे अपने आम लोगों के लिए कारगर होना चाहिए जिसमें छोटे पैमाने पर कारोबार करने वाले उद्यमी, कार या किसी इलेक्ट्रॉनिक कारखाने में काम करके आर्थिक रूप से स्वावलंबी होने की इच्छा रखने वाली महिला आदि शामिल हैं यानी वे सामान्य नागरिक जो बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच के साथ एक सुरक्षित जीवन चाहते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इन प्रक्रियाओं को आगे बढ़ा सकता है लेकिन ऐसा तभी संभव है जब सरकारें भी इस दिशा में काम करें।  

First Published - October 17, 2022 | 10:49 PM IST

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