संप्रग सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु करार पर हस्ताक्षर करने के लिए देशवासियों को समझाने के लिए जो विज्ञापन जारी किए उनमें से एक में कहा गया है, ‘अगर हम यह आज नहीं करते तो हमें इतिहास इसके लिए कभी माफ नहीं करेगा।’
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जारी किए गए प्रचार अभियान में कहा गया था कि इस समझौते से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और स्वतंत्रता को बल मिलेगा। विज्ञापन में समझाने की कोशिश की गई थी कि पोखरण के बाद से भारत तकनीकी क्षेत्र में अलग थलग पड़ गया था पर अब हम इस मोर्चे पर विश्व से जुड़ सकेंगे।
साथ ही सरकार ने अमेरिका के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के पीछे कुछ और फायदे भी गिनाएं हैं, जैसे: इससे तेल एवं गैस पर भारत की निर्भरता कम होगी, ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, ऊर्जा के किसी भी दूसरे स्रोत की तुलना में नाभिकीय ऊर्जा से ज्यादा ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। एटोमिक एनर्जी कमीशन के प्रमुख अनिल काकोदकर ने भी कहा है कि, ‘भविष्य के लिए देश की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए यह करार सबसे विश्वसनीय तरीका है।’
सरकार ने जो दावे पेश किए हैं और साथ में काकोदकर का यह बयान जो परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देता है, उसे अब तक कोई खास चुनौती नहीं दी गई है, जबकि यह सभी जानते हैं कि परमाणु उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है, जैसा कि अब तक नहीं देखा गया था। जिस तेजी से कच्चे माल, मुख्य अवयवों और यूरेनियम की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है उससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल कितना फायदेमंद रह जाएगा। खासतौर पर ऐसे समय में जबकि सौर ऊर्जा जैसे ऊर्जा के अक्षय स्रोतों के दाम तेजी से गिर रहे हैं।
दुनिया भर में बड़ी बड़ी परियोजनाओं में विलंब हो रहा है और इसके पीछे कई कारण हैं जैसे लोहे, स्टील और कंक्रीट के दामों में बढ़ोतरी, रिएक्टर के पुर्जों की सीमित आपूर्ति और साथ ही दक्ष लोगों की कमी। यही वजह है कि जिस परमाणु ऊर्जा पुनर्जागरण की चर्चा पिछले चार-पांच सालों से की जा रही है, उसने अब तक रफ्तार नहीं पकड़ी है। दूसरे देशों की बात तो छोड़ दीजिए, खुद अमेरिका की ओर से ये संकेत मिल रहे हैं कि इस पुनर्जागरण की कोई उम्मीद नहीं है।
वर्ष 1978 के बाद से अब तक अमेरिका में एक भी रिएक्टर के लिए ऑर्डर नहीं दिया गया है और 2005 की अमेरिकी ऊर्जा नीति कानून में जितने लुभावने प्रस्ताव दिए गए हैं उसके बावजूद कुछ ही नाभिकीय इकाइयां नई परियोजनाओं को शुरू करने में दिलचस्पी दिखा रही हैं। जबकि जो प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं, वे आकर्षित करने के लिए काफी हैं, जैसे- परियोजना की कुल लागत का 80 फीसदी तक का लोन और प्रति मेगावॉट पर 18 डॉलर का उत्पादन कर क्रेडिट। निर्माण में देरी होने की स्थिति में 50 करोड़ डॉलर तक की बीमा सुरक्षा।
इन रियायतों और प्रोत्साहनों के बाद भी कई अमेरिकी इकाइयों ने कहा है कि वे अपनी नाभिकीय परियोजनाओं पर फिर से विचार कर रही हैं या फिर उन्हें ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी है क्योंकि इन परियोजनाओं में जोखिम बढ़ चुका है। कीमतें प्रति किलोवॉट 1,500 डॉलर से बढ़कर प्रति किलोवॉट 6,000 डॉलर से भी ऊपर जा पहुंची हैं और इनमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसका मतलब है कि तीन साल पहले जिस 1,000 मेगावॉट के रिएक्टर की कीमत 1.5 से 2 अरब डॉलर के करीब थी, अब उसकी कीमत छह अरब डॉलर के करीब हो गई है और इसमें लगातार बढ़ोतरी ही हो रही है।
पिछले साल अक्टूबर में मूडी की निवेश सेवा ने आकलन किया था कि एक नई परमाणु इकाई की ‘ओवरनाइट कॉस्ट’ 5,000 डॉलर से 6,000 डॉलर प्रति किलोवॉट घंटा हो सकती है। हालांकि उसने यह भी कहा था कि यह आकलन अंदाजे के हिसाब से किया गया है और वास्तविक आंकड़े इससे अलग भी हो सकते हैं। ओवरनाइट कॉस्ट वह कीमत है जो किसी रिएक्टर के त्वरित निर्माण में लगती है, जबकि आमतौर पर इकाइयों के निर्माण में कम से कम पांच साल और कुछ मौकों पर दस साल से अधिक लगते हैं।
अमेरिका के सबसे बड़े नाभिकीय ऑपरेटर एक्जेलन कॉर्प के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जॉन रो मानते हैं कि नाभिकीय ऊर्जा का अर्थशास्त्र निराशाजनक है। यही वजह है कि उन्होंने कहा था कि भले ही लोग नाभिकीय ऊर्जा के पुनर्जागरण की बात करते हों, पर वास्तविकता तो यही है कि इसमें अभी समय लगेगा। इस मामले में वॉरेन बफेट के ऊर्जा संयंत्र मिडअमेरिकन एनर्जी होल्डिंग्स का जिक्र करना जरूरी है जिसने इस वर्ष की शुरुआत में ही अपनी परमाणु योजना को समाप्त करने की घोषणा की थी क्योंकि उन्हें लगता था कि यह अब फायदे का सौदा नहीं रह गया है।
यूरोप में भी स्थितियां कुछ खास बेहतर नहीं हैं जहां मौजूदा परियोजनाएं कीमतों का भार झेलने को विवश हैं। रिएक्टर परियोजनाओं में कुछ दूसरी तरह की अड़चनें भी जुड़ी हुई हैं नाभिकीय प्रमाणपत्र प्राप्त कॉन्ट्रैक्टरों और दक्ष पेशेवरों की कमी। उद्योग सूत्रों का कहना है कि अगर रूस को छोड़ दें तो केवल दो कंपनियां जापान स्टील वर्क्स और फ्रांस की क्रेसोट फोर्ज ही महत्त्वपूर्ण रिएक्टर हिस्से बनाने की क्षमता रखती हैं। और इन दोनों ही के पास अतिरिक्त क्षमता नहीं है।
पर भारत के ‘स्वतंत्र और अखंडित’ नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम को इन सबसे क्या लेना देना है, भले ही इस परमाणु कार्यक्रम को काफी हद तक विदेशी फंडों, तकनीकों और ईंधन पर निर्भर रहना पड़ेगा। न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) जो कि देश की एकमात्र एजेंसी है जिसके पास नाभिकीय इकाइयां लगाने और उसके संचालन के अधिकार हैं वर्तमान में 17 रिएक्टरों का संचालन कर रही है और इन रिएक्टरों को इनकी क्षमता से 50 फीसदी कम पर चलाया जा रहा है।
इसकी वजह है कि इन इकाइयों को पूरी क्षमता से चलाने के लिए अधिक यूरेनियम की जरूरत होगी, जबकि ऐसा नहीं है कि देश में ईंधन भंडार की कमी है। पर ईंधन आपूर्ति व्यवस्था में जो खामियां मौजूद हैं उनकी वजह से ही नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रमों की हालत बुरी है। देश की नाभिकीय क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की योजना को धक्का लगा है और इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि सभी विस्तार योजनाओं पर फिलहाल रोक लगा दी गई है और मौजूदा परियोजनाओं में भी दो से तीन सालों की देरी देखने को मिल रही है।
जब तक देश में नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रमों की निर्भरता विदेशी फंडों और तकनीक के प्रति कम नहीं होगी तब तक इसकी सफलता की बात कहना बेमानी ही होगा। भले ही 2020 तक 20,000 मेगावॉट ऊर्जा का सामान्य सा लक्ष्य रखा गया है, उसके बाद भी इसे प्राप्त करने की संभावना कम ही है क्योंकि कम से कम 8,000 मेगावॉट तो विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से आने हैं।
नाभिकीय ऊर्जा की दुनिया में जहां कुछ भी बहुत साफ नहीं है, यहां तक कि वास्तविक लागत का भी पता लगाना मुश्किल हैं, वहां भ्रम की दुनिया से निकलकर हकीकत में आना आसान नहीं है। पर यह कहां तक उचित है कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा की दुहाई देकर भारतीयों को इस छलावे की दुनिया में सैर कराया जाए?