हर बार की तरह इस बार भी भारतीय एथलीट पेइचिंग में होने वाले खेल महाकुंभ यानी नए जमाने के 29वें ओलंपिक खेलों में हिस्सेदारी करने के लिए रवाना हो चुके हैं।
इस बार भी एथलीट अकेले नहीं गए हैं, उनके साथ उम्मीदों और दीवानगी का एक रेला भी गया है। चार साल की हरेक मुद्दत के बाद हमारे सामने एक ही सवाल आ जाता है कि आखिर 100 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला यह मुल्क चंद ऐसे एथलीट क्यों नहीं तैयार कर सकता, जो सोने का तमगा जीतने के काबिल हों और हर बार कयास धूल में मिल जाते हैं और हम कहते हैं कि ‘इस बार’ हमारी अटकलें गलत साबित हुईं।
मुश्किल यह है कि खिलाड़ियों और तमगों को लेकर हमारी उम्मीदें भी उसी तेजी से बढ़ी हैं, जिस तेजी से भारत ने आर्थिक विकास किया है और दुनिया भर की निगाह में एक कामयाब उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन गया है। इसलिए 2004 में प्राइसवाटरहाउसकूपर्स ने भविष्यवाणी कर दी थी कि हम चार पदक जीतेंगे और हम एथेंस से क्या लेकर लौटे थे – चांदी का महज एक तमगा, जो डबल ट्रैप स्पद्र्धा में हमें नसीब हुआ था। इस बार पीडब्ल्यूसी को लगता है कि हम छह पदक जीत लेंगे।
अब इस पर हंसा न जाए तो क्या किया जाए? इस तरह के कयासों के साथ सबसे बड़ी परेशानी उनकी बुनियाद होती है, जो उन आंकड़ों पर रखी जाती है, जिनका ट्रैक या मैदान में खिलाड़ियों के प्रदर्शन से कोई वास्ता ही नहीं होता है और न ही वैश्विक खेल उद्योग से गणित के इन कारनामों का कोई नाता होता है। मिसाल के तौर पर पीडब्ल्यूसी का कहना है कि जैसे-जैसे किसी देश की आबादी और दौलत बढ़ती जाती है, उसके खाते में खेल पदकों की गिनती भी बढ़ती जाती है।
लेकिन यह दरअसल आधा-अधूरा सच है। बेशक अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा दौलतमंद अर्थव्यवस्था है और वह अक्सर ओलंपिक की पदक तालिका में चोटी के आसपास दिखती है। उसके आसपास जापान, फ्रांस, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे नाम दिखते हैं। लेकिन चीन और रूस भी ओलंपिक तालिका में काफी ऊपर दिखते हैं। अपने गुरबत के दिनों में, जब वे कम्युनिस्ट देश थे और उन्हें दुनिया के सबसे अमीर देशों में बिल्कुल नहीं गिना जाता था, भी ये दोनों देश ओलंपिक में जबरदस्त प्रदर्शन करते थे।
दरअसल उनकी कामयाबी के पीछे खेल क्षमता बढ़ाने के लिए दीवानगी की हद तक पहुंचे सरकारी प्रयास होते थे, जो निश्चित रूप से सराहनीय होते, लेकिन वे मानवाधिकार हनन की सीमा तक पहुंच गए थे। चलिए, उनको नजरअंदाज कर भी दें, तो क्यूबा (2004 में 9 स्वर्ण समेत 27 पदक), जॉर्जिया (4 पदक, 2 स्वर्ण), केन्या (7 पदक, 1 स्वर्ण) और मिस्र (5 पदक, 1 स्वर्ण) की कामयाबी को क्या कहेंगे? इन देशों की अर्थव्यवस्था तो भारत के मुकाबले बेहद छोटी है।
किसी भी देश की दौलत भी उसी तरह से अहम होती है, जैसे खेल का बुनियादी ढांचा मुहैया कराने की उसकी क्षमता और अक्सर ये पहलू राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उसके खिलाड़ियों की कामयाबी पर खासा प्रभाव डालते हैं, लेकिन खिलाड़ियों की क्षमता का इस दौलत से कोई लेना-देना नहीं है। यदि पीडब्ल्यूसी की बात सही होती, तो अमेरिका ने दुनिया को सबसे बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी दिए होते, लेकिन असल में तो ऐसे खिलाड़ी सामने लाने की उपलब्धि ब्राजील और अर्जेंटीना के पास है। इसी तरह लंबी दूरी के चैंपियन धावकों की कतार खड़ी करने की जो क्षमता अफ्रीका महाद्वीप के देशों ने दिखाई है, उसका उनके आर्थिक प्रदर्शन से शायद ही कोई रिश्ता होगा।
कई जानकार यह कह चुके हैं कि हमें खेलों में कामयाब होने और पदक जीतने के मौके बढ़ाने के लिए रूस और चीन के उस मॉडल पर चलना चाहिए, जिसमें सरकार का दखल काफी ज्यादा होता है। लेकिन मैं तो यही कहूंगी कि हर चार साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारे राष्ट्रीय सम्मान यानी तिरंगे की जो यात्रा होती है, वह खेल प्रशंसकों के लिए बेशक अच्छी हो, असल में मुल्क के लिए तो पैसे और वक्त की बरबादी भर ही है।
चीन ने पिछले 7 साल में अपने एथलीटों को प्रशिक्षण देने पर तकरीबन 100 करोड़ डॉलर की रकम खर्च की है, जिसे भारत में तो उन स्कूलों और अस्पतालों, शहरीकरण या तमाम तरह के सामाजिक बुनियादी ढांचे के लिए खर्च कर फायदा उठाया जा सकता था, जिन्हें वाकई धन की जरूरत है। भारत ओलंपिक के लिए अपनी कोशिशों पर जो निवेश करता है, उसके बदले तो उसे काफी खराब नतीजा मिलता है। इससें अचंभा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इस रकम का एक बड़ा हिस्सा हमारे खिलाड़ियों की क्षमताएं तराशने पर खर्च नहीं होता, बल्कि अधिकारियों के ऐशोआराम पर खर्च किया जाता है।
क्या ओलंपिक खेलों में अपने 57 खिलाड़ियों की देखरेख करने के लिए हमें वाकई 42 अफसरों की जरूरत है? अगर रूस और चीन को छोड़ दिया जाए, तो पदक तालिका में अव्वल रहने वाले सभी धनी देशों में एथलेटिक्स हो या फुटबॉल, बास्केटबॉल या फिर टेनिस और गोल्फ, समूचे खेल उद्योग की गाड़ी निजी क्षेत्र के निवेश से ही आगे बढ़ती है। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं तो होती हैं, लेकिन वे गहमागहमी भरे उस कैलेंडर का छोटा सा हिस्सा भर होती हैं, जो निजी क्षेत्र या कॉर्पोरेट निवेश के साथ क्लबों के घमासान वाली प्रतियोगिताओं से भरा होता है।
इन प्रतियोगिताओं में खिलाड़ी किसी प्रांत के प्रतिनिधि होने की वजह से नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा के बूते पहुंचते हैं। यही वजह है कि आइवरी कोस्ट का खिलाड़ी दिदिएर द्रोग्बा और कैमरून का सैमुअल इतोओ सबसे उम्दा फुटबॉल खिलाड़ियों में शुमार किए जाते हैं, जबकि उनके देश में तो फुटबॉल का बुनियादी ढांचा भी नहीं है। इसी तरह ओलंपिक में मिले पदक भी आपके बारे में दुनिया भर के नजरिये पर खास असर नहीं डालते हैं। चीन का नाम विदेशी निवेशकों को अपनी ओर इसलिए नहीं खींचता है कि वह ओलंपिक पदक जीतने वाले पांच अव्वल देशों में शामिल है।
इसी तरह कोई भी वैश्विक निवेशक ओलंपिक में कामयाबी देखकर भारत नहीं आएगा, बल्कि वह भारत के संभावनाओं से भरे बाजार, आर्थिक विकास, कॉर्पोरेट कामयाबी और गरीबी में आई कमी देखेगा, जो आर्थिक उदारों के 17 साल में भारत को मिली है। यह गांधीवादी बयान लग सकता है, लेकिन भारत को ओलंपिक से तब तक दूर रहना चाहिए, जब तक भारतीय कॉर्पोरेट जगत एथलीटों और खिलाड़ियों को ज्यादा बढ़ावा देने के लिए तैयार नहीं होता। नकदी के टोटे से जूझ रही भारत सरकार को इस खूबसूरत सपने पर गाढ़ी रकम खर्च नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके पास करने के लिए और भी जरूरी काम हैं।