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RBI MPC Meet: बदलाव नहीं और इंतजार करने वाली नीति पर जोर

अब इस सप्ताह की नीति को लेकर हम क्या उम्मीदें कर सकते हैं? यह मौजूदा वित्त वर्ष की पहली नीति होगी

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तमाल बंद्योपाध्याय   
Last Updated- April 06, 2026 | 9:19 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दिसंबर के पहले सप्ताह में ही क्रिसमस का तोहफा दे दिया था। केंद्रीय बैंक ने 25 आधार अंकों (बीपीएस) की नीतिगत दर में कटौती की और खुले बाजार संचालन (ओएमओ) और डॉलर-रुपये के खरीद-बेच स्वैप के माध्यम से प्रणाली में पर्याप्त नकदी डालने का वादा किया।

इसके बाद, फरवरी की मौद्रिक नीति में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ जो वित्त वर्ष 2026 की आखिरी और केंद्रीय बजट के बाद की पहली नीति थी। आरबीआई की छह सदस्यीय दर​ निर्धारण समिति, मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत दर को 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा और अपना ‘तटस्थ’ रुख अपनाए रखा।

अब इस सप्ताह की नीति को लेकर हम क्या उम्मीदें कर सकते हैं? यह मौजूदा वित्त वर्ष की पहली नीति होगी। यह मल्होत्रा की आठवीं मौद्रिक नीति होगी और शायद सबसे कठिन भी होगी। इस साल फरवरी में विराम लगाने से पहले, फरवरी से दिसंबर 2025के बीच 125 आधार अंकों की दर कटौती की गई थी जो 2019 के बाद की सबसे आक्रामक नरमी थी।

दिसंबर में दर कटौती के बाद, मल्होत्रा ने भारतीय अर्थव्यवस्था के संतुलित दौर में होने की बात कही थी जो वास्तव में बेहतर आर्थिक वृद्धि और कम मुद्रास्फीति वाला (गोल्डीलॉक्स अवधि) दौर होता है। फरवरी में उनका कहना था कि अर्थव्यवस्था पहले से बेहतर प्रभावी क्षेत्र में है क्योंकि अंतर्निहित मुद्रास्फीति अनुकूल रही जबकि वृद्धि को लेकर उत्साह मजबूत हो रहा था। यह टिप्पणी उन्होंने 6 फरवरी को तीन दिन की एमपीसी बैठक के बाद की थी। इसके तीन सप्ताह बाद 28 फरवरी को, अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त हवाई हमले किए। युद्ध अब भी जारी है। पश्चिम एशिया संकट ने सब कुछ बदल दिया है। इसने मुद्रास्फीति के ऊपर की जोखिमों और वृद्धि से जुड़े निचले स्तर के जोखिमों को बढ़ा दिया है।

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) द्वारा 26 मार्च की रिपोर्ट में वृद्धि और मुद्रास्फीति के अनुमानों पर चर्चा की गई थी और इसने संघर्ष के प्रभाव को संक्षेप में पेश किया गया है। इसका अनुमान है कि वैश्विक जीडीपी वृद्धि 2025 में 3.2 फीसदी से घटकर 2026 में 2.9 फीसदी हो जाएगी, जिसका कारण उच्च शुल्क, नीतिगत अनिश्चितता और निवेश में कमी है। यह भी अनुमान लगाया गया है कि जी20 देशों में मुद्रास्फीति 2026 में बढ़कर 4 फीसदी हो जाएगी, जो पहले 3.4 फीसदी आंकी गई थी। कुछ प्रमुख केंद्रीय बैंकों, जैसे बैंक ऑफ इंगलैंड, यूरोपियन सेंट्रल बैंक और अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने भी अपने मुद्रास्फीति के अनुमान को ऊपर की ओर संशोधित किया है।

25 मार्च को जारी एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स की एशिया-प्रशांत क्षेत्र से जुड़ी टिप्पणी के अनुसार, इस क्षेत्र में वृद्धि दर बनी रह सकती है, खासतौर पर तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाएं और क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन करेंगे। हालांकि, इसमें यह भी कहा गया है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें एक बड़ी बाधा हैं और ऊर्जा बाजार में लंबी बाधा एक प्रमुख जोखिम बनी हुई है। भारत, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में बढ़ती ऊर्जा कीमतों के कारण सब्सिडी पर अधिक खर्च करना पड़ेगा जिससे सरकारी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ेगा।

इसके अनुमान के अनुसार, मौद्रिक नीति में ढील देने की अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। ऊर्जा कीमतों से बढ़ती महंगाई और मुद्रा के कमजोर होने के दबाव के चलते एशिया-प्रशांत क्षेत्र के केंद्रीय बैंक सतर्क रुख अपनाए रखेंगे। इसी बीच, मूडीज रेटिंग्स ने भारत की वित्त वर्ष 2027 के लिए आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को 6.8 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी कर दिया है।

इस पृष्ठभूमि में अब यह देखना जरूरी है कि पिछली मौद्रिक नीति के बाद भारत के लिए क्या बदलाव हुए हैं। 6 फरवरी को एक डॉलर की कीमत 90.66 रुपये थी। पिछले सप्ताह रुपया 93.1 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ जबकि 30 मार्च को यह 95.125 के स्तर तक पहुंच गया था। वहीं, 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड जो 6 फरवरी को 6.7 फीसदी थी वह पिछले सप्ताह 7.1 फीसदी पर बंद हुई जो मई 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है जब नीतिगत दर 6.5 फीसदी थी। इस दौरान, ब्रेंट क्रूड की कीमत 68.5 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 108.61 डॉलर तक पहुंच गई है।

मुद्रा में उतार-चढ़ाव और सट्टेबाजी को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई ने 10 अप्रैल से बैंकों के ऑनशोर डिलीवरेबल बाजार में रोजाना रुपये की ओपन पोजिशन को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित कर दिया है जिससे रुपये में तेज गिरावट हो रही थी। इससे पहले बैंकों को उनकी कुल पूंजी के 25 फीसदी तक पोजिशन रखने की अनुमति थी। सिर्फ इतना ही नहीं, केंद्रीय बैंक ने बैंकों को निवासी और अनिवासी ग्राहकों को रुपये के नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड्स देने से भी रोक दिया है।

हालांकि इन दोनों कदमों के प्रभाव को लेकर अलग-अलग राय हैं लेकिन इससे यह साफ हो जाता है कि आरबीआई बाहरी आर्थिक परिस्थितियों को लेकर काफी चिंतित है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और रुपये की कमजोरी, दोनों ही मुद्रास्फीति पर गहरा असर डालते हैं। बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि आरबीआई रुपये की चाल को किस नजरिये से देखता है। फरवरी तक उसका फॉरवर्ड बुक बढ़कर 77.7 अरब डॉलर हो चुका है और मार्च में यह और बढ़ सकता है। इससे आरबीआई की यह क्षमता प्रभावित होगी कि वह हाजिर बाजार में डॉलर बेचने के असर को संतुलित करने के लिए खरीद-बिक्री स्वैप का इस्तेमाल कैसे करता है।

फॉरवर्ड बुक का मतलब है वे शुद्ध बकाया अनुबंध, जो आरबीआई ने भविष्य में विदेशी मुद्रा (डॉलर) खरीदने-बेचने या स्वैप के जरिये किए हैं। ‘ऋणात्मक’ या ‘शॉर्ट’ फॉरवर्ड बुक का मतलब होता है कि आरबीआई ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को तुरंत कम किए बिना, रुपये को स्थिर रखने के लिए भविष्य में डॉलर बेचने के सौदे किए हैं।

अब सवाल उठता है कि गिरती मुद्रा और बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच क्या ब्याज दर बढ़नी चाहिए? जवाब है, अभी नहीं। ऐसा इसलिए कि दूसरी ओर बढ़ती लागत का असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाला है, जिससे वृद्धि दर प्रभावित होगी। पश्चिम एशिया संकट के कारण वृद्धि के मोर्चे को लेकर गंभीर जोखिम की स्थिति बनी हुई है हालांकि इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रह सकता है।

मौद्रिक नीति समिति, नीतिगत दर और अपने रुख को पहले जैसा ही बनाए रख सकती है, भले ही परिस्थितियां बदल गई हों। यानी यह एक ‘कोई बदलाव नहीं’ वाली नीति हो सकती है। साथ ही, आरबीआई उत्पादक क्षेत्रों के लिए पर्याप्त नकदी उपलब्ध कराता रहेगा। इस बार की नीति में कदम उठाने से ज्यादा महत्त्व संवाद का होगा।


(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ सलाहकार हैं)

First Published : April 6, 2026 | 9:14 PM IST