वैसे तो सोमवार को ही रिजर्व बैंक ने यह बात साफ कर दी थी कि वह महंगाई के राक्षस को साधने के लिए सख्त से सख्त कदम उठाने से भी पीछे नहीं रहेगा।
फिर भी रेपो रेट और कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) में मंगलवार को हुए इजाफे से बड़े-बड़े विश्लेषक भी हैरान रह गए। यह तो सभी मानकर चल रहे थे कि रिजर्व बैंक रेपो रेट में या सीआरआर में या फिर दोनों में चौथाई फीसदी यानी 25 बेसिस प्वाइंट का इजाफा करेगा।
इस उम्मीद की वजह यह थी कि पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में काफी गिरावट आई है। हालांकि, यथार्थवादियों का कहना है कि बदले हुए हालात के बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत काफी कम है। पिछले साल की दूसरी छमाही में महंगाई की दर काफी कम थी। इसलिए नकारात्मक बेस इफेक्ट की वजह से इस साल महंगाई की दर को ऊपर रहना ही है।
इसलिए रिजर्व बैंक के तरकश में तीर तो वैसे ही काफी कम थे। अगर वह हालात को जस का तस बने रहने देता, तो इससे लोगों के बीच में इस बारे में मिले-जुले संकेत जाते कि सरकार विकास दर के बारे में कुछ किए बगैर महंगाई की समस्या से कैसे निपटेगी। यह अखबार पहले से ही अपने संपादकीय में इस बात पर जोर देता आ रहा है कि इस वक्त रिजर्व बैंक की तरफ से साफ और बिना लाग-लपेट वाले संकेतों की सख्त जरूरत है।
हालांकि, लगातार दूसरी बार आधा फीसदी की जबरदस्त बढोतरी की उम्मीद तो बड़े से बड़े यथार्थवादियों तक को नहीं थी। अभी पिछले महीने में ही तो रिजर्व बैंक ने अचानक इन दरों में इजाफा किया था। माना कि इस वक्त सारे संकेत तरलता पर लगाम लगाने की तरफ इशारा कर रहे हैं और इसके लिए जनता भी तैयार है, लेकिन चौथाई फीसदी का इजाफा भी इस बारे में साफ और स्पष्ट संकेत देने के लिए काफी था। साथ ही, इतने इजाफे से ही मनचाहे नतीजे भी मिल सकते थे।
साथ ही, अगले कुछ हफ्तों में ब्याज दरों में कमी की उम्मीद भी इस बात से जाती रही कि सीआरआर में इजाफा अगस्त के आखिर तक ही लागू होगा। वैसे, रेपो रेट में उम्मीद से ज्यादा हुआ इजाफा इस बात की चिंता पैदा कर देता है कि कहीं इससे विकास का सपना और धुंधला तो नहीं पड़ जाएगा। वैसे, रिजर्व बैंक के इस कड़े फैसले का कारण बढ़ता राजकोषीय घाटा हो सकता है। अब तक महंगाई के राक्षस को साधने के लिए सरकारी नीति मांग की पैरों में बेडियां डालने की ही रही है, लेकिन सरकार द्वारा वेतनों और कर्जमाफी की रेवड़ियां इस राह के सबसे बड़े रोड़े हैं।
इन दोनों वजहों से मांग में इजाफा होता है, जिससे महंगाई का राक्षस और मजबूत होता जा रहा है। इनके अलावा, चुनावी साल होने की वजह से ऐसी रेवड़ियां सरकारी पिटारे में हैं। इसीलिए तो रिजर्व बैंक अभी से कड़े कदम उठा रही है, ताकि वह आने वाले दिनों में मांग पर लगाम रख सके। हालांकि यह तो वक्त ही बताएगा कि उसका यह कदम कितना महंगा साबित होगा।