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वामपंथियों के समर्थन वापस लेने के बाद उन विधेयकों का भविष्य क्या होगा, जो आर्थिक सुधारों में अहम माने जा रहे हैं

Last Updated- December 07, 2022 | 11:42 AM IST

जनविरोधी कदमों का होगा विरोध
गुरुदास दासगुप्ता
नेता, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी


हम लोगों ने सरकार को बाहर से अपना समर्थन दिया। हमारी कोशिश थी कि यह सरकार आम जनता के हित में काम करे लेकिन ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ के किसी भी वादे को पूरा नहीं किया गया।

हो सकता है कि अगर सरकार रहे तो उन विधेयकों को फिर लाने की कोशिश करे, जिनका हम विरोध कर रहे थे। यह सरकार तो कॉरपोरेट सेक्टर के लोगों के निर्देश पर ही चल रही है। अब अगर मनमोहन सिंह से मुकेश अंबानी के मिलने की बात को ही लें तो हम सब यह जानते हैं कि चाहे वो मुकेश अंबानी हो या अनिल अंबानी सब कांग्रेस के साथ किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं।

इस सरकार पर मित्तल, अंबानी और सहारा जैसे पूंजीपतियों का वर्चस्व है। हम आर्थिक सुधारों के खिलाफ तब नहीं होंगे जब वह सुधार आम आदमी के हित में होगा। अगर उन सुधारों का फायदा कुछ पूंजीपतियों तब सीमित होता है और आम आदमी को नुकसान उठाना पडेग़ा तो हम उसे कत्तई बर्दाश्त नहीं करेंगे।

आर्थिक सुधार का मतलब क्या पूंजीपतियों के लिए दरवाजे खोलना, छंटनी करना, ट्रेड यूनियन को कुचलना और कम पैसे से ज्यादा काम कराना है? ऐसे आर्थिक सुधारों की हमें जरूरत नहीं है जो आम आदमी के हित को नजरअंदाज करता हो और पूंजीपतियों की वकालत करता हो। सरकार मजदूरों का खून चूसने के लिए आर्थिक सुधार चाहती है।

आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर सरकार ने देश को बर्बादी की ओर ले जाने का काम किया है और अब भी सरकार इस पर कायम ही है। अगर आप भारत-अमेरिका परमाणु समझौते की ही बात करें तो यह देश की स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा है। इस समझौते से परमाणु ऊर्जा के द्वारा जो बिजली बनाई जाएगी वह महंगी होगी।

जहां तक पेंशन फंड रेगुलेटरी अथॉरिटी और विकास प्राधिकरण विधेयक, खुदरा क्षेत्रों, टेलीकॉम, बीमा के क्षेत्र में में विदेशी निवेश और सार्वजनिक क्षेत्र की क ई कंपनियों और बैंकों के शेयरों को बाजार में उतारने की बात है, सरकार अगर उसके लिए कदम उठाती है तो हम संसद में उसका विरोध तो करेंगे ही। इंडस्ट्रियल एक्ट और ट्रेड यूनियन एक्ट को बदलने की कोशिश अगर सरकार करती है तो हम उसका भी विरोध करेंगे। हम संसद से बाहर भी इन नीतियों का विरोध करेंगे जो आम आदमी को परेशान करने के लिए बनाई जाएंगी।

आज भी अगर आप बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो आप पाएंगे कि औद्योगिक उत्पादन की दरों में कमी आ रही है और कीमतें काफी ज्यादा बढ़ रही हैं। औद्योगिक उत्पादन बढ़ नहीं रहा है और 36 प्रतिशत का निवेश भी औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने में उतना कारगर नहीं हो पा रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था स्टैगफ्लेशन की स्थिति से गुजर रही है और सरकार इसके लिए जिम्मेदार है। हमारी वजह से ही सरकार का वजूद था और तभी वह जनता के हित में कुछ बेहतर काम कर सकती थी। लेकिन अब हम उनके साथ नहीं रहेंगे तो सरकार शायद ही कुछ बेहतर कदम उठाएं जनता के हित में। यह सरकार बिल्कुल निकम्मी है।

जहां तक श्रम कानूनों के सुधार की बात है तो हम उसके लिए संघर्ष तो जरूर करते रहेंगे। हम लोगों पर सरकार की तरफ से ऐसा दबाव था कि  हमारे दल के लोग भी मंत्री बने लेकिन हमने ने ऐसा नहीं किया। मैं यह नहीं कह सकता हूं कि सरकार रहेगी या जाएगी यह बिल्कुल ही अनिश्चित है। हम अभी से यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि सरकार अगर बनी भी रहे तो उसका कदम कैसा होगा। यह सरकार अगर बनी रही तो यह उसकी मर्जी पर है कि वह आर्थिक सुधारों की रफ्तार को तेज करेगी या कम करेगी। वामदल आम जनता के हित में अपना संघर्ष तो जरूर जारी रखेंगे।
 (बातचीत: शिखा शालिनी )

चुनावी मौसम में खास उम्मीद नहीं
डी. एस. रावत,
महासचिव, एसोचैम

चुनावी वर्ष में सरकार आर्थिक सुधारों को रफ्तार देने का काम करेगी, ऐसा नहीं लगता। एसोचैम की काफी पहले से यही राय रही है और हमारे इस दृष्टिकोण में अभी भी कोई बदलाव नहीं आया है। इसमें कई पेंच हैं और हमें जमीनी हकीकत को देखते हुए व्यवहारिक रुख अख्तियार करना चाहिए।

मेरी राय है कि यह कहना उतना सही नहीं है कि वामपंथी पार्टियों द्वारा संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन देना आर्थिक सुधारों में बहुत बड़ा रोड़ा था। यह सोचना बिलकुल गलत होगा कि वामपंथी पार्टियों की मनमोहन सरकार के साथ चली कदमताल ने आर्थिक सुधारों की गति को उल्टी दिशा में मोड़  दिया है।

अब इस बात की क्या गारंटी दी जा सकती है कि सरकार के नये सहयोगी के रूप में सामने आई समाजवादी पार्टी दूसरे दौर के आर्थिक सुधारों को लागू करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पूरा सहयोग करेगी। दरअसल अब जिन सेक्टरों में भी आर्थिक सुधार होने बाकी हैं, वह किसी भी राजनीतिक दल के लिए बहुत संवेदनशील हैं। इन सेक्टरों में बीमा क्षेत्र, नागर विमानन क्षेत्र, रिटेल क्षेत्र, पेंशन, और इनसे भी संवेदनशील श्रम क्षेत्र शामिल है।

इन क्षेत्रों में सुधार को लेकर राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति नहीं है। यहां तक कि कांग्रेस में भी इसको लेकर दोफाड़ की स्थिति है। एक बात के लिए वामपंथी पार्टियों की तारीफ की जा सकती है कि शुरुआत से कुछ मुद्दों को लेकर उनका जो दृष्टिकोण था, उस पर ये दल आखिर तक डटे रहे। वामपंथी पार्टियों ने पहले ही कह रखा था कि यदि सरकार अमेरिका के साथ प्रस्तावित परमाणु करार पर कदम बढ़ाती है, तो वे सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे और आखिरकार उन्होंने समर्थन वापस ले भी लिया।

दूसरी ओर संप्रग में सबसे बड़ी हिस्सेदार कांग्रेस पार्टी ने परमाणु करार को करने की ठान रखी है। दोनों पार्टियां अपने असल रुख पर अड़ी रहीं और दोनों ने ही अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा से समझौता करने से इनकार कर दिया। नतीजतन लगभग चार साल पुरानी वाम और संप्रग की ‘शादी’ , ‘तलाक’ में तब्दील हो गई। एसोचैम अमेरिका के साथ प्रस्तावित परमाणु करार का समर्थन करता है क्योंकि इससे देश को जरूरी तकनीक हासिल होगी जिससे आर्थिक विकास की गति भी तेज होगी।

दूसरी ओर वामपंथी पार्टियों का रवैया हमेशा से ही इसके विरोध का रहा है और उनके मुताबिक परमाणु करार राष्ट्रीय हित में नहीं है। हम इसके लिए वामपंथी पार्टियों को गलत नहीं ठहराते, लेकिन हमें लगता है कि यह दूसरे दौर के आर्थिक सुधारों की जमीन तैयार करने में मदद करेगा। सुधारों के लिए कुछ कड़े निर्णय लेने पड़ते हैं, और गठबंधन सरकारों के चलते ऐसा करना बहुत मुश्किल है। वहीं चुनावी वर्ष में तो यदि एक पार्टी की भी सरकार हो तो वह भी ऐसा करने में हिचक जरूर महसूस करेगी क्योंकि आमतौर पर जनता कड़े निर्णय पसंद नहीं करती है और यदि कोई सरकार ऐसा करती है तो फिर चुनाव परिणामों में उनको जनता के कोप का सामना करना पड़ सकता है।

यह सही है कि श्रम और बीमा क्षेत्र में सुधारों को लेकर वामपंथी पार्टियों का रुख बहुत कड़ा है, और इन दोनों क्षेत्रों में सुधार का समर्थन करना उनके लिए ‘राजनीतिक आत्महत्या’ करने के समान होगा। यह उनका दृष्टिकोण है कि वे अपने तर्कों से अपने विरोध को जायज ठहरायें लेकिन यह सुधारों की रफ्तार को तो मंद ही कर सकता है। 

एसोचैम, बीमा, नागर विमानन, पेंशन, रिटेल जैसे क्षेत्रों में सुधार का समर्थन करता है। लेकिन एसोचैम जैसी संस्था कुछ तरह से रिटेल क्षेत्र को खोलने का विरोध भी करती है। हमें लगता है कि विदेशी खिलाड़ियों के मुकाबले भारतीय उद्योग को 3 से 5 साल का ‘ग्रेस पीरियड’ देना चाहिए क्योंकि विदेशी कंपनियों का ढांचा बहुत मजबूत है।
(प्रस्तुति: प्रणव सिरोही)

First Published - July 16, 2008 | 11:06 PM IST

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