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सांसदों के अमर्यादित आचरण का क्या होगा?

Last Updated- December 07, 2022 | 4:03 AM IST

सांसदों के अमर्यादित आचरण का क्या होगा?

 

सियासी हलचल

 

आदिति फडणीस /  June 06, 2008

 

 

 

देश के एकमात्र मार्क्सवादी लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पिछले 4 जून को अपना चार साल का कार्यकाल पूरा कर लिया।

 

इसके ठीक दो महीने पहले सोमनाथ चटर्जी ने संसदीय इतिहास में पहली बार 32 लोकसभा सदस्यों का अमर्यादित आचरण का मामला संसद की विशेषाधिकार समिति के पास भेज दिया था।

मजे की बात यह है कि इन 32 सांसदों में से एक इस विशेषाधिकार समिति के सदस्य थे। एक सदस्य ने कानून ही तोड़ दिया था। 32 सांसदों में से ज्यादातर भारतीय जनता पार्टी के थे। उसने यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि लोकसभा अध्यक्ष भाजपा को निशाना बना रहे हैं। शायद किसी को इस बात की याद नहीं आई कि वह सोमनाथ चटर्जी ही थे, जिन्होंने कहा था कि अब तक के इतिहास में सबसे बढ़िया संसदीय कार्य मंत्री सुषमा स्वराज थीं।

यह वही लोकसभा अध्यक्ष हैं जिन्होंने अपनी ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर दबाव डाला कि वे संसद में किए गए अमर्यादित आचरण के  लिए न केवल मौखिक बल्कि लिखित रूप से भी माफी मांगे। (यह मामला तब सामने आया था जब संसद में मैरीटाइम यूनिवर्सिटी विधेयक प्रस्तुत किया जा रहा था।

मैरीटाइम यूनिवर्सिटी बनाने का प्रस्ताव कोलकाता में था, लेकिन बाद में नौवहन मंत्री टीआर बालू के प्रभाव से उसे चेन्नई स्थानांतरित कर दिया गया। इससे पश्चिम बंगाल के सांसद नाराज हो गए। जब टीआर बालू संसद में विधेयक पेश करने जा रहे थे, ये सांसद इसके विरोध  में अध्यक्ष के आसन के सामने जमा हो गए। एक सांसद ने तो मंत्री से कागज छीनने की कोशिश भी की।

लोकसभा अध्यक्ष ने सदन में माकपा के नेता बासुदेव आचार्य से कहा कि इस अमर्यादित आचरण के लिए खेद व्यक्त किया जाए अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहा जाए। अगले ही दिन पार्टी की ओर से इसके लिए माफी मांगी गई)। लेकिन भाजपा के मामले में क्या हुआ? मामले ने दूसरा ही मोड़ ले लिया। कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि लोकसभा एक फसादी सदन है।

जब सदन चल रहा होता है, तो इसमें किसी भी आदमी के धैर्य की परीक्षा होती है। लेकिन वर्तमान अध्यक्ष के साथ साथ सभी अध्यक्षों ने लोकतंत्र की मर्यादा को बचाए रखते हुए कार्यवाही का संचालन किया। अध्यक्षों ने कोशिश की कि वे सदन को चलाते समय पार्टी से ऊपर उठकर अपने दायित्वों का निर्वाह करें। चटर्जी ने भी हस्तक्षेप और टोकाटाकी के बीच सदन की स्वतंत्रता बनाए रखी, लेकिन 24 मई को ऐसा क्या हुआ, जिससे उन्होंने आपा खो दिया।

लोक सभा की आचरण संबंधी नियमावली में स्पष्ट किया गया है कि संसद में सदस्यों की नारेबाजी प्रतिबंधित है। इस हकीकत से सभी सदस्य वाकिफ हैं। 15 अप्रैल को संसद के बजट सत्र के पहले दिन के दूसरे मध्याह्न में अध्यक्ष ने इस बात के लिए पहली चेतावनी दी थी। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर किसी सांसद ने नारेबाजी की तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

यहीं से इस घटना की शुरुआत हुई। बजट सत्र में अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान ही आर्थिक मुद्दों पर चर्चा होती है, अलग से नहीं।  लेकिन जब माकपा के सदस्यों ने बढ़ती कीमतों पर चर्चा कराए जाने की मांग की, जो पिछले सत्र में हंगामे के चलते टल गई थी और लंबित थी, तो अध्यक्ष इसके लिए तैयार हो गए। उन्होंने अल्पकालिक चर्चा की अनुमति दी। इसका मतलब यह था कि इसमें सदस्यों की व्यापक भागीदारी रहती।

भारतीय जनता पार्टी ने इस तरह की चर्चा के लिए कोई सूचना नहीं दी थी। यही नहीं भाजपा के सदस्य चर्चा के लिए निर्धारित दिन अध्यक्ष के आसन के सामने एकत्र हो गए और नारेबाजी करने लगे। चर्चा अगले दिन तक के लिए टाल दी गई। उस दिन भाजपा ने बहस में हिस्सा तो लिया लेकिन पार्टी के सदस्यों की उपस्थिति बहुत कम थी।  मूल्य वृध्दि पर चली सात दिन की बहस के बाद भाजपा ने एक बार फिर मुद्रास्फीति का मामला उठाया।

नियम कहता है कि एक ही सत्र में एक ही मुद्दे पर दो बार चर्चा नहीं कराई जा सकती। लेकिन भाजपा ने यह कहते हुए कि उन्हें मुद्रास्फीति का मुद्दा उठाने का अधिकार है क्योंकि ‘यह देश के आम लोगों से जुड़ा सवाल है।’ भाजपा के सदस्यों ने न केवल प्रश्नकाल का बहिष्कार किया, बल्कि उन्होंने 12 बजे दोपहर को संसद भवन परिसर में मानव श्रृंखला भी बनाई और अध्यक्ष के आसन के सामने जमा होकर नारेबाजी की।

टकराव की शुरुआत हो चुकी थी। अध्यक्ष सदन के नियमों की अवहेलना करने के खिलाफ पहले ही चेतावनी दे चुके थे। उन्होंने चेतावनी को दोहराते हुए अपराह्न तक के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। इस मामले को विशेषाधिकार समिति के पास भेज दिया गया। इसके साथ ही ब्रजेश पाठक के अमर्यादित आचरण के मामले को भी विशेषाधिकार समिति के पास भेजा गया।

पाठक खुद इस समिति के सदस्य हैं। उन्होंने इस्पात मंत्री राम विलास पासवान से एक सवाल पूछा था, लेकिन जब वे उत्तर दे रहे थे, तो उन्होंने जवाब नहीं सुना और अध्यक्ष के आसन के सामने आकर नारेबाजी करने लगे। एक और सदस्य विजयेन्द्र पाल सिंह को आचार समिति और विशेषाधिकार समिति दोनों का सामना करना पड़ा। ( वह दोनों समितियों के सदस्य हैं और इससे पहले उन्हें आचार समिति ने उन्हें संसद भवन परिसर में प्रवेश करने के लिए वाहन पर फर्जी प्रवेश पास स्टिकर लगाने के मामले में चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था)।

लोक सभा अध्यक्ष की इस कार्रवाई ने सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के सदस्य दहशत में आ गए। अगले ही दिन दोनों पक्षों के नेता अध्यक्ष से मिले और उन्हें आश्वासन दिया कि वे अगले सत्र से मिल-जुलकर सदन की कार्यवाही संचालित करने में उनका साथ देंगे। इसके बाद अध्यक्ष ने अपने आदेश को वापस ले लिया। आप यह सवाल उठा सकते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या सांसदों को सबक नहीं सिखाया जाना चाहिए था।  ( विशेषाधिकार समिति के पास यह अधिकार है कि मामला सही पाए जाने पर वह सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित करने की सिफारिश कर सकती है।)

हकीकत यह है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ये सांसद अध्यक्ष के नियमों का पालन करते। अगर वे अध्यक्ष की बात की अनसुनी करते हुए उन पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की मांग करते तो इससे लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी और प्रतिष्ठा पर ही आंच आती।  संसद का मानसून सत्र जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त के पहले सप्ताह में शुरू होगा। क्या संसद चलेगी? इस बात की परीक्षा होनी है।

 

 

 

First Published - June 6, 2008 | 11:03 PM IST

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