सार्वजनिक क्षेत्र के कई ऐसे उपक्रम हैं जिन पर इसलिए ताला लगा दिया जाता है क्योंकि जैसे ही इनमें काम शुरू किया जाता है ये फिर से नुकसान दिखाने लगते हैं। पर क्या इन इकाइयों को बंद रखने मात्र से ही मूल समस्या का समाधान हो जाएगा?
नुकसान से बचने के लिए इन इकाइयों पर ताला तो जड दिया गया है पर क्या किसी ने सोचा है कि आखिर इन इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों की क्या हालत है। वे अपने विवादों का निपटारा करने के लिए कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाते रहते हैं। उत्तर प्रदेश खनिज विकास निगम मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने जो फैसले सुनाए वे विरोधाभासी थे।
माजरा कुछ यह था कि राज्य सरकार के स्वामित्व वाले इस निगम ने अपने गठन के शुरुआती सालों में तो अच्छा प्रदर्शन किया, पर धीरे धीरे यह ढलान की ओर जाने लगा। दो दशक बाद हालात इतने बिगड़ गए कि निगम अपने 800 कर्मचारियों को वेतन तक देने की स्थिति में नहीं रह गया। निजी कंपनियों से मिल रही टक्कर, वैश्वीकरण और वन्य एवं खनिज संसाधनों के संरक्षण को लेकर अदालती आदेशों से परेशान होकर इकाई का काम ठप पड़ गया।
निगम ने कर्मचारियों का बकाया वेतन चुकाने के लिए सरकार से उधार लेने की कोशिश भी कि पर इसका कोई नतीजा नहीं निकला। कर्मचारियों ने अपनी परेशानियों को लेकर इलाहाबाद और लखनऊ में उच्च न्यायालय के बेंच में अपील की। निगम ने बेंच के सामने अपनी बेबसी का रोना रोकर सहानुभूति बटोरनी चाही। जब कर्मचारियों की ओर से दबाव बढ़ने लगा तो उच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया कि वह चार महीने के अंदर इन कर्मचारियों को राज्य सरकार के संगठनों या फिर सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में नियुक्त करे।
साथ ही सरकार को यह भी आदेश दिया गया कि कर्मचारियों को पर्याप्त मुआवजा भी दिया जाए। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो फैसला सुनाया उससे औद्योगिक इकाइयों को कुछ राहत तो जरूर मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया जा रहा हो तो वे जल्दबाजी में उच्च न्यायालय में अपील नहीं कर सकते। इस तरह के मामलों के निपटारे के लिए सबसे पहले औद्योगिक ट्रिब्यूनल या फिर लेबर कोर्ट में आवेदन देना चाहिए।
अगर ऐसे मामलों में कोई दूसरा विकल्प हो तो उसकी मदद भी ली जानी चाहिए। दूसरी बात यह है कि चूंकि ऐसे मामलों में तथ्यों को लेकर बहुत उधेड़बुन होती है इसलिए मामले के निपटारे के लिया पहला फोरम ही सबसे उपयुक्त है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामले जिनमें तथ्यों को लेकर कई सवाल खड़े हों, उन्हें सीधे उच्च न्यायालय के पास ले जाना ठीक नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चाहे परिस्थितियां कुछ भी हों उच्च न्यायालय कोई ऐसा फैसला नहीं सुना सकता जो नियमों के प्रतिकूल हों।
आखिर में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया कि भले ही निगम के अधिकारियों ने कर्मचारियों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए कुछ वादे किए हों, पर अगर वे नियम-कानून के विपरीत हों तो उन्हें किसी हालत में बाध्य नहीं किया जा सकता कि वे उन्हें पूरा करें। उत्तर प्रदेश में यह मसला सरकारी अथवा सार्वजनिक निगमों से छंटनी किए गए कर्मचारियों को पुन: रोजगार देने संबंधी नियम, 1999 के दायरे में आता है, जिसमें समय समय पर परिवर्तन किया जाता है।
कोई भी प्राधिकरण न तो इससे अलग हटकर काम कर सकता है और न ही फैसला सुना सकता है। उच्चतम न्यायालय के फैसले में इस बात पर भी सशर्त सहमति बनी कि अगर किसी कारोबार में नुकसान हो रहा है तो ऐसे में नियोक्ता पर कारोबार को जारी रखने का दबाव नहीं डाला जा सकता। अगर नियोक्ता तात्कालिक नियमों का उल्लंघन नहीं करता तो उसे पूरी आजादी है कि वह अपने कारोबार को बंद कर दे। हालांकि इस मसले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जो फैसला सुनाया गया था, उसमें भी न्यायाधीशों के बीच मतभेद था।
इनमें से एक न्यायाधीश (मार्कण्डेय काटजू) का मानना था कि इस तरह की बीमारू इकाई को किसी तरह जिंदा रखने की कोशिश बेकार है। उनका कहना था कि अदालत सरकार को यह आदेश नहीं दे सकती कि वे कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करे। वाणिज्यिक मामलों में सरकारी नीतियों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों को बैंक, दूरसंचार, विद्युत, जलापूर्ति और यहां तक कि नगर निगम को भी सार्वजनिक हाथों से निकालकर निजी हाथों में सौंप देना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने जो फैसले दिए वे काफी हद तक इस अकेले न्यायाधीश के विचारों से ही मेल खाते थे।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते वक्त आर्थिक नीतियों पर कोई टिप्पणी तो नहीं की। वहीं इस मामले के ठीक विपरीत पांच साल पहले उच्चतम न्यायालय ने बिहार की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के कर्मचारियों को मुआवजे के तौर पर 50 करोड़ रुपये दिए जाने का आदेश दिया था। मामला कपिला हिंगोरानी बनाम बिहार राज्य का था। बिहार और झारखंड सरकार को सम्मिलित रूप से यह बोझ उठाना पड़ा था। यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया था।
हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के निजीकरण को लेकर अब भी कई ऐसे मसले हैं जो उच्चतम न्यायालय के फैसले की राह तक रहे हैं। बालको मामले में सरकार को विनिवेश की पूरी छूट दे दी गई थी। हालांकि इस फैसले के कुछ अंशों की जोरदार आलोचना भी हुई थी और जेसोप लिमिटेड के कर्मचारियों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान उस मामले पर एक बार फिर से विचार करने के लिए अदालत ने सहमति जताई थी। पर अब तक अदालत को इस मसले पर पुनर्विचार के लिए समय नहीं मिल पाया है।