यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि रिजर्व बैंक के पास आर्थिक प्रबंधन को लेकर कोई सख्त मॉडल नहीं है। वह बदलते हुए वक्त के मुताबिक ही अपने रास्ते चुनता है।
बीच राह ट्रैक बदलने के मामले में भी उसमें खासी चुस्ती है। हालांकि वह बार-बार बातें तो करता है नीतिगत मामलों में अनुरूपता बरकरार रखने की, लेकिन उसकी बातें कभी भी ठोस कदमों की शक्ल नहीं अख्तियार कर पातीं। मिसाल के तौर पर करेंसी मार्केट को ही ले लीजिए।
बैंक ने कोई भी विनिमय दर लक्ष्य तय नहीं करने की नीति अपना रखी है। उसके मुताबिक ऐसा उसने इसलिए किया ताकि बाजार की ताकतें ही विनिमय दरों के बारे में कोई आखिरी फैसला कर सकें। इस नीति के तहत उसे बाजार में (डॉलर खरीदने या बेचने के लिए) तभी कूदना होता है जब दामों में होने वाले ज्यादा उतार-चढ़ावों को रोकने की जरूरत हो।
लेकिन उसकी विनिमय दर प्रबंधन के हाल के रिकॉर्ड को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। जब रुपये में एक हद से ज्यादा मजबूती आने लगी तो रिजर्व बैंक ने खासी मात्रा में डॉलर की खरीदारी कर अपने पास डॉलर का मोटा-ताजा स्टॉक जमा कर लिया। यहां तो बाजार की ताकतों को अपना जौहर दिखाने का मौका ही नहीं मिला। इसी वजह से तो पिछले कुछ हफ्तों में रुपया छह फीसदी से ज्यादा कमजोर हो गया। इसे तो जरूरत से ज्यादा उतार-चढ़ाव ही कहेंगे।
मेरे मकसद बैंक के इस लचीले रवैया को गलत ठहराना कतई नहीं है। मैं भी मानता हूं कि एक निश्चित खाके के अंदर काम करने से कोई फायदा नहीं होता। खास तौर तब, जब एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था को प्रबंधित करने की जिम्मेदारी आपके कंधों पर हो। रिजर्व बैंक के कदमों से देश की आर्थिक हालत के बारे में बैंक के आकलन और मुश्किलों को दूर करने के लिए उसके पास मौजूद रास्तों पर उसकी सोच का पता चलता है।
वैसे, आरबीआई की नीतिगत सोच और हाल में उठाए कदम हमें क्या बताते हैं? जहां तक मुझे लगता है, रिजर्व बैंक आज की तारीख में विकास दर को बरकरार रखने को लेकर ज्यादा परेशान है। अपने नीतिगत बयानों के जरिये भी उसने यही बताने की कोशिश की है।
आधिकारिक तौर पर तो उसका कहना है कि इस साल अपने देश की विकास दर 8-8.5 फीसदी के आस-पास रहेगी, लेकिन शायद बैंक को इस पर खतरा मंडरता दिख रहा है। इसलिए तो उसने निर्यात को बढ़ाने का अहम फैसला किया, ताकि इससे विकास दर पर मंडराते खतरे के बादल कुछ हद तक कम हों।
करेंसी मार्केट में आज की तारीख में आरबीआई द्वारा ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाए जाने को मकसद यही हो सकता है कि बैंक पूरी कोशिश के साथ निर्यात में जान फूंकने तुला हुआ है। इसकी राह से वह हरेक रोड़े को निकाल फेंकना चाहता है। ऐसी कोशिश वह तब कर रहा है, जब थोड़े से डॉलर बेचने पर रुपये में स्थिरता आ सकती थी।
वैसे, बैंक की यह कोशिश रंग भी लेकर आई है। रुपया का अवमूल्यन कोरिया की वान को छोड़कर दूसरी एशियाई मुद्रा की तुलना में ज्यादा तेजी हुआ। इस वजह से रुपये की दूसरे देशों की मुद्रा के साथ प्रतिद्वंद्विता में रातों-रात इजाफा हो गया। वैसे, इस रास्ते को अपनाने का खामियाजा महंगाई के रूप में हमें झेलना पड़ा। पिछले साल तक आरबीआई विनिमय दरों का इस्तेमाल महंगाई पर काबू करने के लिए करता था, लेकिन अब लगता है, उसने इस विचार को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
शायद, अर्थव्यवस्था में हो रहे नए-नए शोधों और अखबारों की उन कतरनों पर उसे ज्यादा भरोसा होने लगा है, जिनके मुताबिक महंगाई और विनिमय दरों के बीच संबंध न के बराबर होता है। मेरे मुताबिक तो इस वक्त यह फैसला थोड़ा अजीब है। इस बात पर किसी के बीच मतभेद नहीं होगा कि अभी की महंगाई की असल वजह बाहर से आई चीजों के दामों में इजाफा है, न कि घरेलू बाजार में मांग का बढ़ना।
यह बात तो एक बच्चे की भी समझ में आ जाएगी कि जब भी रुपये का अवमूल्यन होता है, आयातित होने वाली वस्तुएं और भी महंगी हो जाती हैं। दूसरी तरफ, महंगाई पर काबू पाने के लिए घरेलू आपूर्ति पर ज्यादा ध्यान देने और निर्यात की चमक को कुछ दिन के लिए फीकी करने की बात चल रही है। लेकिन कमजोर होते रुपये से हो ठीक उल्टा रहा है। यह निर्यात को और भी ज्यादा चमकदार बना रहा है।
तो रिजर्व बैंक कैसे निपटे इस मुसीबत से? एक बात तो यह हो सकती है कि आरबीआई इसलिए तैयार हो गया क्योंकि उस भरोसा था कि सरकार इसके प्रभावों से अच्छी तरह से निपट लेगी। मतलब, उसे भरोसा था कि कीमतों पर सरकारी नियंत्रण और वायदा बाजार पर प्रतिबंधों की वजह से कीमतें ज्यादा नहीं बढ़ पाएंगी। साथ ही, उसे इस बात पर भी विश्वास रहा होगा कि जरूरी चीजों के निर्यात प्रतिबंधों की वजह से भी घरेलू बाजार में जरूरी चीजों की कमी नहीं हो पाएगी।
वहीं, दूसरी चीजों के निर्यात से मुल्क की विकास दर कुलांचे मारती रहेगी। अगर रिजर्व बैंक की यही सोच है, तो उसने साफ तौर पर प्रत्यक्ष नियंत्रण से होने वाली दिक्कतों के बारे में नहीं सोचा। दूसरी तरफ, ब्याज दरों के बारे में उसकी नीतियों से उसकी विकास दर को ऊंची बनाए रखने की परेशानी ही झलकती है। इस बात का सबूत है, बैंक का ऊंची ब्याज दरों के बारे में स्पष्ट संकेत न देना।
हालांकि, महंगाई से दो-दो हाथ कर पाने की अपनी काबलियत पर भी सवालिया निशान नहीं देखना चाहती। इसलिए तो उसने बाजार में मौजूद लिक्विडिटी यानी नगदी पर निशाना साधा। उसने ब्याज दर बढ़ाने से तो इनकार किया, लेकिन तरलता पर काबू करने की कवायद तेज कर दी। वैसे, इन दोनों के बीच एक हल्की सी रेखा मौजूद है। रिवर्स रेपो रेट को बढ़ाने से देसी बैंकिंग सिस्टम नगदी की मात्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव से प्रभावित होने की स्थिति में आ गया है।
मुल्क से पैसा बाहर जाने की हाल के वाकयों से भी बैंकों के सामने धन की कमी पैदा हो सकती है। रेपो व रिवर्स रेपो रेट और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (एलएएफ) के बीच मौजूद खाई की वजह से छोटे समय के लिए लिए गए लोन पर ब्याज दरों में दो फीसदी का उतार-चढ़ाव तक हो सकता है। बिल्कुल इस हालत में हमने खुद को पिछले हफ्ते पाया था, जब मनी मार्केट का अच्छे-खासे मुनाफे से भारी नुकसान में आ गया।
रिजर्व बैंक ने इन्हें तात्कालिक मुश्किलें कहकर इनसे पल्ला झाड़ लिया। उसके मुताबिक इसका ब्याज दरों पर असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, इसमें कई तरह से खतरे जुड़े हुए हैं। मिसाल के तौर पर अगर विदेशों से निवेश नहीं आया, तो ब्याज दरें ऊंची रह सकती हैं और वहीं बनी रह सकती हैं।
पॉलिसी बनाना हमेशा दस फैसलों में से किसी एक सही को चुनने का काम होता है। इस वक्त भी आरबीआई ने जो पॉलिसी चुनी है, उसमें भी कुछ खतरे जुड़े हुए हैं। या तो विकास दर पर असर पड़ेगा या फिर रुपये के अवमूल्यन का खामियाजा महंगाई के रूप में हमें झेलना पडेग़ा।