facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

हंगामा है क्यों बरपा बुश के बयान पर

Last Updated- December 06, 2022 | 10:01 PM IST

पिछले दिनों अमेरिकी नेतृत्व के एक बयान से हमारे मुल्क के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया।


अमेरिकी नेतृत्व ने यह कहा था कि खाने के सामानों की बढ़ती कीमत की अहम वजह भारत और चीन जैसे विकासशील देशों में खाद्यान्नों का बढ़ता इस्तेमाल है। इसके बाद तो अपने देश की हरेक राजनैतिक पार्टी ने एक सुर में इसकी निंदा शुरू कर दी।


मैंने भी अमेरिकी नेतृत्व के उस बयान को पढ़ा है, वो भी एक नहीं कई बार। लेकिन मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही है कि इस बयान को भारत की बेइज्जती के तौर पर क्यों देखा जा रहा है। जॉर्ज बुश और उनकी विदेश मंत्री कोंडालिजा राइस ने केवल इतना कहा था कि भारत और चीन जैसी बड़ी, लेकिन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ती अमीरी की वजह से विकसित मुल्कों के लिए कम कीमतों के दिन पूरे हो चुके हैं।


मैं बुश या राइस का पक्ष नहीं ले रहा, लेकिन मैं यह भी नहीं मानता कि उन्होंने हमें या चीनियों को कम खाने की ‘सलाह’ दी है। इसमें कोई राज नहीं है कि विकसित देशों में लोग-बाग हम से ज्यादा अच्छा जीवन जी रहे हैं। साथ ही, उनके पास खर्च करने के लिए पैसे भी ज्यादा हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले 20 सालों से चीजों की स्थिर कीमतें हैं। कुछ सामानों की कीमतों में तो इस दौरान काफी गिरावट आई है।


अगर महंगाई दर को ताक पर रख दें तो अमेरिका में खाद्य पदार्थों, कपड़ों और रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीजों की 2007 के दाम तो 1990 की कीमतों से भी कम थे। यह ‘चमत्कार’ मुमकिन हो पाया विकासशील देशों, खास तौर पर चीन की वजह से, जो अमीर देशों के लिए सस्ते सामान बनाने वाले कारखाने बन गए।


सस्ता श्रम, कमजोर श्रम कानून, मोटी सब्सिडी, कमजोर पर्यावरण कानून और कच्चे माल तक आसान पहुंच की वजह से विकसित देशों के लिए इन मुल्कों से साल दर साल सस्ती से सस्ती कीमत पर ज्यादा से ज्यादा सामान मंगवा पाना आसान हो सका। चीन, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे गरीब देशों में इन्हें सस्ती से सस्ती कीमत पर सामान मुहैया करवाने वालों की लिस्ट कभी छोटी भी नहीं पड़ी है।


खुद भारत सरकार ने कई योजनाओं के जरिये ऐसी निर्यात गतिविधियों को बढ़ावा दिया है। इन्हीं योजनाओं की वजह से तो निर्यातकों ने अरबों डॉलर की सब्सिडी की सीधे तौर या घुमा-फिराकर कमाई की। जब भारत में निर्यातक को किसी भी कीमत पर मदद देने का ट्रेंड चल रहा था, तब यह जानकर कई लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई कि कुछ कंपनियां तो अपनी कुल कमाई से ज्यादा का टैक्स फ्री मुनाफा कमा रहे थे।


कई लोगों के मुताबिक तो अकाउंटेंसी की जुबान में यह काम असंभव है। लेकिन भारत सरकार की दरियादिली की वजह से यह नामुमकिन काम भी मुमकिन हो गया। हमारी ‘दरियादिल’ सरकार की नीतियों की वजह से ही तो विकसित देशों के लोगों का जीवन सुखमय बनाने के लिए निर्यात को इतनी ऊंची सब्सिडी दी गई। ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है, जब हमारे देश के नीति-निर्धारकों का ज्यादा जोर कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना हुआ करता था।


उन्होंने यह जोर उस वक्त भी कम नहीं किया, जब इस बात के पक्के सबूत साफ दिखाई देने लगे थे कि कृषि उत्पादों और दूसरी चीजों की डिमांड-सप्लाई के पैटर्न में वतन में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। इस बदलाव की बड़ी वजह थी भारत में कुलांचें मारती अर्थव्यवस्था, जिसकी वजह से लगभग सभी की सभी वस्तुओं और सेवाओं की मांग में काफी उछाल आया है।


आज प्राथमिक क्षेत्र से जुड़े सभी सेक्टरों में उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाए जाने की जरूरत है। फिर चाहे वह सेक्टर बुनियादी ढांचा या पूंजी निर्माण का हो या फिर भूमि और श्रम सुधारों का ही क्यों न हो। बदकिस्मती से इस मामले में जो छूट देने की जरूरत थी, उसे सरकार और एक के बाद एक गद्दीनशीन हुई राजनैतिक पार्टियों ने अनदेखा ही किया है। आज इस अनदेखी की कीमत 10-15 फीसदी को छोड़ सारे हिन्दुस्तान को चुकाना पड़ रहा है।


जो संकेत दिखाई दे रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि आगे चलकर हालत और भी बुरी हो जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि अब तो शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे दूसरे आधारभूत क्षेत्रों में भी यह कमी साफ दिखाई देने लगी है। इन सेक्टरों पर तो आज की तारीख में क्षमता बढ़ाने का काफी बड़ा बोझ है, जबकि उनके सामने वित्तीय और सामाजिक उद्देश्यों के बीच सामंजस्य बैठाने की एक बहुत बड़ी चुनौती भी है। 


ऊर्जा, खनिज, पानी और खाद्यान्न जैसे सभी प्राकृतिक संसाधनों की पूरी दुनिया में डिमांड आज की तारीख में आसमान को छू रही है। मेरी मानिए तो हमारे राजनैतिक नेतृत्व और नीति निर्धारकों को भी इस सच को अपने दिमाग में अच्छी तरह से उतार लेना चाहिए। भारत, चीन, ब्राजील और दूसरे देशों की आबादी इतनी ज्यादा है कि सकल घरेलू उत्पाद में एक फीसदी का इजाफा भी डॉलर या यूरो के चश्मे से देखने से काफी कम नजर आता है।


लेकिन अगर इस बढ़ोतरी को इस्तेमाल करने की निगाह से देखने पर यह पता चलता है कि जीडीपी में एक फीसदी का इजाफा भी कितना जबरदस्त असर डालता है। मजे की बात यह है कि डिमांड को एक ही हथियार से कम किया जा सकता है। वह हथियार है वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास को कम करना। लेकिन अगर हमने यह ब्रह्मास्त्र चलाया तो इसका गरीब देशों पर और भी बुरा असर पड़ेगा।


अगर भारत को इस संकट से बचना है तो राजनैतिक परिदृश्य के मामले में उसे बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। हमें दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बिना देर किए हुए वैचारिक और नीतिगतवित्तीय सुधारों को अपनाना पड़ेगा। कृषि उत्पादों और दूसरे चीजों के मुक्त व्यापार से इस स्टेज पर हमें फायदा ही होगा।


राज्यों के बीच व्यापार पर लगने वाले टैक्स और इस व्यापार के सामने आने वाली दिक्कतों को हटाकर उस ऊपरी कीमत को हटाने में मदद मिलेगी जिसका भार आखिरकार आम लोगों को सहना पड़ता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की राह में आने वाली सभी दिक्कतों को दूर करके हमें परदेस से ज्यादा रकम अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं।


इससे फायदा यह होगा कि इससे हमें अपनी देसी पूंजी को बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे आने वाले सालों में उत्पादन को भी बढ़ाने में मदद मिलेगी। भूमि और श्रम क्षेत्रों में बड़े सुधारों से इसका हम भरपूर इस्तेमाल कर सकेंगे। जब तक हम ऐसा नहीं करते, महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही रहेगी।  

First Published - May 7, 2008 | 10:42 PM IST

संबंधित पोस्ट