इस सप्ताह सरकार ने कपास से आयात शुल्क पूरी तरह हटाने का फैसला किया। इसका मकसद है कि टेक्सटाइल मिलों की सहायता की जाए, जो ऊंची कीमतों पर कपास खरीद रहे हैं।
आखिर इस तरह की छूट और कीमतों में बढ़ोतरी के मामलों में किसानों का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता है? वर्ष 1997 और 1999 के बीच शुल्क 5 प्रतिशत के मामूली स्तर पर था। कीमतें वैश्विक स्तर पर कम थीं और आयात के चलते बाजार में इसकी अधिकता थी। वर्ष 1998 में अकेले आंध्र प्रदेश में कपास की खेती करने वाले करीब 3000 किसानों ने अपनी जान दे दी।
वर्ष 2001 में एनडीए सरकार ने चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया, जिससे गन्ना उत्पादकों को मदद मिले, लेकिन कपास पर लगने वाले शुल्क में केवल 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई। कपास उत्पादक किसानों को केवल बहस में ही उलझाए रखा गया।
एक ओर जहां उद्योग जगत को सहयोग देने के लिए सरकार ने 15 प्रतिशत शुल्क समाप्त कर दिया है, वहीं कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के प्रस्ताव को अभी तक लटकाए रखा है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने कपास के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 3000 रुपये प्रति क्विंटल किए जाने की सिफारिश की है। इस समय कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,900 से 2,000 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि कपास की वैश्विक कीमतें 3,500 रुपये प्रति क्विंटल के आस-पास हैं।
एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में बने राष्ट्रीय किसान आयोग ने प्रस्ताव दिया था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, उत्पादन मूल्य से 50 प्रतिशत ज्यादा होना चाहिए। वर्तमान में यह दर 15 प्रतिशत है। इस प्रस्ताव को भी किसी भी फसल के लिए नहीं स्वीकार किया गया। अगर टेक्सटाइल मिलों को जरा सी भी कठिनाई होती है तो सरकार हरकत में आ जाती है और उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए मचल उठती है। आयात शुल्क को हटा दिया गया।
जबकि आयात शुल्क को हटाए जाने की घोषणा के मात्र एक दिन पहले केंद्रीय वाणिज्य सचिव गोपाल कृष्ण पिल्लै ने कहा था कि इस तरह के कदम उठाए जाने या कपास के निर्यात पर पाबंदी लगाए जाने की कोई जरूरत नहीं है। केंद्र सरकार ने अभी हाल ही में किसानों की मदद करने के लिए किसानों का 80,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज माफ किया है। आखिर में जब किसानों की इतनी दुर्दशा है, तो सरकार को आयात शुल्क हटाए जाने जैसे कदम उठाने की क्या जरूरत थी?
आखिर में इसके पीछे क्या तर्क है? एक बार फिर यह सवाल उठता है कि किसानों को कर्ज में डूबने पर मजबूर करने के बाद आखिर प्रधानमंत्री समय समय पर किसानों के लिए राहत पैकेज की घोषणा क्यों करते हैं? कपास के किसान तभी फसल उपजाएंगे जब उन्हें लंबे समय के लिए लाभ की उम्मीद हो। एक खास बात का ध्यान सरकार को जरूर रखना चाहिए कि उद्योग तभी चलेगा जब फसल उगेगी। खेती बंद होगी तो उद्योग पर भी ताला लग जाएगा।
विदर्भ इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि किसानों में विभेद पैदा करने वाली नीतियों के चलते खेती-बाड़ी करने वाले लोगों में निराशा आई और इसके परिणामस्वरूप उपज में गिरावट दर्ज की जा रही है। अभी पिछले महीने ही नाबार्ड ने संवाददाताओं को दिखाया कि विदर्भ के किसान अब किस तरह की रणनीति अपना रहे हैं। वहां के किसान अब कपास की खेती बंद कर सोया का उत्पादन कर रहे हैं। यह इस बात का एक उदाहरण है कि सरकार किसानों को कपास के उत्पादन की ओर आकर्षित करने में विफल रही है और किसान दूसरी फसलों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
अगर अमेरिका सभी तरह की सब्सिडी हटा ले तो कपास की कीमतें 5,000 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएंगी। इसके बाद उद्योग जगत का क्या होगा? क्या इसके बाद कपड़े बनने बंद हो जाएंगे? शुल्कों को हटा लीजिए, कोई बात नहीं लेकिन हमारे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना ही चाहिए जिसकी वे मांग करते हैं। स्पष्ट रूप से यह संवेदनशीलता की कमी है, जो अन्य फसलों के मामलों में भी नजर आती है। धान का ही उदाहरण लीजिए।
सीएसीपी के चेयरमैन महेन्द्र देव ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा गेहूं और धान का उत्पादन लागत एक समान है फिर भी दोनों के लिए अलग अलग न्यूनतम समर्थन मूल्य होने का मतलब समझ में नहीं आता। वे इस बात की शिकायत कर रहे थे कि सरकार सीएसीपी की सिफारिश पर अमल नहीं कर रही है। सीएसीपी ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,000 रुपये प्रति क्विंटल किए जाने की सिफारिश की है। वाम दल, अमेरिका से प्रस्तावित परमाणु समझौते पर तो खूब हाय तौबा मचा रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे को उठाने या इस पर कुछ भी करने में असफल रहे।
हालांकि उन्हीं की पार्टी ने केरल में धान का समर्थन मूल्य बढ़ाकर 1,000 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। कपास के मामले में अब किसानों की चिंता यह है कि सरकार टेक्सटाइल मंत्रालय के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी और कीमतों को स्थिर रखने के लिए या तो कपास के निर्यात को कम करेगी या इस पर पूरी तरह से पाबंदी लगा देगी, जिससे घरेलू उद्योग को मदद मिल सके। अगर ऐसा होता है तो सरकार को कर्ज माफी के माध्यम से किसानों को राहत देने के लिए एक और पैकेज की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।