रैनबैक्सी लैब के प्रमोटर पहले ऐसे मालिकान नहीं हैं, जिन्होंने अपनी कंपनी बेची हो (इसे पहले पारले के रमेश चौहान और मैक्स के अनलजीत सिंह भी ऐसा काम कर चुके हैं)।
न ही वह आखिरी ऐसे मालिकान हैं, जो ऐसा काम कर रहे हैं। लेकिन यह इकलौती कामयाब, सूचीबध्द और एक हिंदुस्तानी के नेतृत्व में दुनिया भर में सफलता के झंडे गाड़ने वाली ऐसी कंपनी है, जिसे अचानक यह लगने लगा कि वह अपने बूते पर तरक्की की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकती और उसे एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी के सहारे की जरूरत है।
वैसे, यह अपनी एक तरह की सबसे बड़ी डील है क्योंकि इसकी वजह से रैनबैक्सी में अपने एक तिहाई शेयरों के बदले सिंह खानदान को 10,000 करोड़ रुपये जो मिलेंगे। इस सौदे से यह बात तो साबित हो ही गई कि भले ही भारतीय कंपनियां कोरस जैसी दुनिया की नामी-गिरामी कंपनियों को निगलने की फिराक में हों, दुनिया की कंपनियां भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। वे भी हिंदुस्तानी कंपनियों पर नजर गड़ाए रहती हैं।
शोध की प्रमुखता वाले एक सेक्टर में मुल्क की कामयाब उद्यमशीलता का झंडा गाड़ने वाली एक कंपनी के इतनी जल्दी विदेशी पैसे के आगे झुक जाने से कई लोगों को जबरदस्त झटका लगा है। वे अब तक विदेशी कंपनियों का भारतीय कंपनियों के पैसों के आगे झुकने को ही देखते रहे हैं। इनमें से कई मामलों में तो उन्होंने खुद रैनबैक्सी के विदेशी आधिग्रहण का जश्न मनाया है। लेकिन शायद वह वक्त आ गया है, जब चीजों को राष्ट्रवाद के चश्मे के बजाए कारोबारी नजरिये से देखा जाए।
वह भी उसी कारोबारी नजरिये से, जिस नजरिये से मालविंदर सिंह ने देखा और अपने अहम से पहले उन्होंने रैनबैक्सी का भविष्य देखा। इस अखबार का शुरू से ही कहना रहा है कि प्रबंधन और मालिकाना हक दो अलग-अलग मुद्दे हैं। इन्हीं दोनों में उलझ जाने की वजह से कारोबारी घराने तरक्की नहीं कर पाते। इस मामले में तो सिंह घराने की तारीफ ही करनी चाहिए कि उन्होंने इतनी ऊंची कीमत पर सौदा करते वक्त भी कारोबारी तर्कों को पूरी तरह से ध्यान में रखा।
मालविंदर का वित्तीय जगत का माहिर खिलाड़ी की वजह से ही उन्होंने पैसों को अहम से ऊपर रखा। रैनबैक्सी आज की तारीख में तकनीकी और वित्तीय दिक्कतों से जूझ रहा है। उसे उम्मीद है कि डायची सांक्यो के सहारे उसका बेड़ा पार हो जाएगा। तकनीकी मामलों की बात करें तो इसे एक मजबूत प्रोडक्ट पाइपलाइन की जरूरत थी। मालिकानों के फेर बदल की वजह से शोध और जेनेरिक्स दवाओं पर इसकी नीति में भी फेर-बदल होगा।
अब इन्हें फिर से बनानी पड़ेंगी। ऊपर से, इस पर 40 करोड़ डॉलर के कनवर्टिबल बॉन्ड्स को भी चुकाने का भार है। वैसे, डायची के नजरिये से देखें तो इस अधिग्रहण से उसकी पहुंच 60 देशों के बाजारों तक हो जाएगी। साथ ही, उसके एक मजबूत उत्पादन बेस और और सस्ते में शोध करने की क्षमता मिल जाएगी। यह देखना अभी बाकी है कि क्या रैनबैक्सी अलग कंपनी बनी रहेगी या डायची नाम की बड़ी मछली का चारा बन जाएगी।