बंगाल की खाड़ी में जम्बूद्वीप एक छोटा सा टापू है। कुछ साल पहले यह काफी चर्चा में आ गया था।
दरअसल, तब उस पेड़ों से भरे टापू की जमीन पर मछलियां सुखाए जाने पर पर्यावरणवादियों ने वहां के मछुआरों को सर्वोच्च न्यायालय में घसीटा था। इस बाबत ‘अतिक्रमण’ का मामला दर्ज कर लिया गया। अदालत की केंद्रीय विशेषाधिकार समिति ने भी मामले की जांच शुरू कर दी।
यह समिति अदालत को जंगलों और पर्यावरण से जुड़े मामलों पर राय देती है। फिर आई इसकी रिपोर्ट, जिसमें समिति ने साफ-साफ कहा कि मछली सुखाना वन्य गतिविधि के अंतर्गत नहीं आता है। इसलिए वन्य संरक्षण कानून (1980) के तहत इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
मछुआरों ने इसके खिलाफ अपील की। उनका तर्क था कि उन्हें कई-कई दिन खुले समंदर में जान जोखिम में डालकर बिताने पड़ते हैं। इसलिए उनके लिए जम्बूद्वीप एक ट्रांजिट कैंप यानी अस्थायी ठिकाने के रूप में काम करता है। उन लोगों के लिए यह एक प्राकृतिक बंदरगाह था, जहां वे अपनी मछलियों को सुखा सकते थे। उनके पास मछलियों के संरक्षण के लिए अत्याधुनिक मशीनों को खरीदने के लायक पैसा भी नहीं था।
वे अपनी मछलियों को वहीं सुखाकर बचा सकते थे। उनके मछली पकड़ने के तरीके भी काफी जायज थे। वे अपने जालों को अपने ही हाथों से बुनते थे और उनके जरिये केवल बड़ी मछलियां पकड़ी जा सकती थीं। इससे सागर में छोटी मछलियां बची रहती थीं। वे मछलियों को सुखाने के लिए भी केवल सूरज की रोशनी का सहारा लेते थे।
वे प्रकृति से केवल उतना ही लेते थे, जितने की उन्हें जरूरत थी। इस मामले को सुलझाने के लिए मछुआरों ने एक योजना भी रखी। उनका कहना था कि वे जो रकम परमिट पाने के लिए वन विभाग को देते हैं, उसका इस्तेमाल टापू पर पेड़ लगाने में किया जाए। साथ ही, टापू को बचाने के लिए उन्होंने एक योजना बनाने का भी सुझाव दिया। इसके लिए वे टापू पर आने वाले नावों की तादाद भी कम करने को तैयार थे।
पहली नजर में तो यह योजना काफी आकर्षक लगती है, लेकिन उस समिति को ये बातें नहीं लुभा सकीं। अदालत ने उनके खिलाफ फैसला दिया और एक ही झटके में 10 हजार लोगों से उनका रोजगार छिन गया। क्या इसे पर्यावरण संरक्षण की राह में एक जीत कह सकते हैं?
अब एक दूसरे मामले पर गौर करते हैं। अदालत वही है और समिति भी वही है। हालांकि, इस बार मामले का ताल्लुक एक बड़ी कंपनी, लंदन के वेदांता ग्रुप की स्टरलाइट इंडस्ट्रीज से है। स्टरलाइट को अपनी बॉक्साइट की खान के लिए अलग-अलग प्रजातियों से पेड़-पौधों और जानवरों से भरपूर एक काफी अहम जंगल की 700 एकड़ जमीन की जरूरत थी। वैसे, इस बार अदालत का फैसला भी अलग रहा।
कोर्ट और समिति तुरंत ही एक समझौते के लिए राजी हो गईं। कंपनी को काफी आसानी से जंगल की जमीन मिल गई, लेकिन उसे बर्बाद हुए जंगल के बराबर कीमत चुकाने के लिए कहा गया। आपको हैरानी होगी कि उस जंगल के लिए कंपनी को केवल 55 करोड़ रुपये चुकाने के लिए कहा गया। अगर उस जंगल के वन्य संसाधनों के बारे में सोचें तो यह रकम ढेला बराबर भी नहीं है।
यह जंगल कई तरह के जानवरों और पेड़-पौधों का घर है। साथ ही, इस जंगल से कम से कम दो बड़ी नदियां और कई छोटी-छोटी बरसाती नदियों को पानी मिलता है। कंपनी को इसके अलावा वन्यजीवन प्रबंधन योजना के तहत 50 करोड़ रुपये देने के लिए कहा गया। साथ ही, कंपनी से ‘सीमा’ में रह कर ही खनन करने के लिए कहा गया।
इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि कैसे कंपनी पहाड़ की चोटी से खनन करेगी और बॉक्साइट के एक टन से निकलने वाले तीन टन कचरे से जंगल की सेहत पर कैसा असर पड़ेगा। इस मामले में शायद सर्वोच्च न्यायालय ने ‘विकास’ की राह में न आने फैसला किया और एक बीच का रास्ता निकल लिया। अब जरा आज से थोड़ा पीछे चलते हैं। वही समिति , वही अदालत।
कुछ साल पहले समिति ने फैसला दिया था कि किसी भी नैशनल पार्क या अभयारण्य में किसी भी तरह की गैर वन्य गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जाएगी। समिति ने यहां तक कहा था कि सूखे पेड़, टहनी और घास को भी जंगल से बाहर ले जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
राजस्थान के कुंबलगढ़ अभयारण्य में इस आदेश ने ऊंटों के लिए मौत के फरमान की तरह काम किया। वहां बारिश के मौसम में ऊंट चरने के लिए जाते थे, लेकिन अदालत के आदेश के बाद इस पर रोक लगा दी गई। इस बारे में अदालत ने किसी भी अपील को सुनने से इनकार कर दिया।
खुद वन्य संरक्षण की वकालत करने वालों का कहना था कि बारिस के तीन महीनों में ऊंटों का चरना अभयारण्य के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। लेकिन समिति ने इस बात पर भी कान देने से साफ इनकार कर दिया, तो अदालत ने भी इस दलील को नहीं माना।
अब आज में वापस आते हैं। फिर से वही समिति और वही अदालत। इस बार मामला है पन्ना नैशनल पार्क के बीचोंबीच हीरों के खनन का। यह नैशनल पार्क बाघों का घर है। इस मामले में अदालत का फैसला बिल्कुल अलग था। अदालत ने फैसला सुनाया कि इस संरक्षित जमीन पर खनन का काम बदस्तूर जारी रह सकता है।
कंपनी को बस अपनी पूंजी लागत का पांच फीसदी हिस्सा और जंगल की बर्बाद हुई जमीन की कीमत चुकानी है। मजे की बात यह है कि इस खदान को बंद करने के लिए कोई आखिरी तारीख नहीं बताई गई है। यह खदान साफ तौर जंगल की जमीन पर की जाने वाली एक गैर वन्य गतिविधि है।
ये मामले केवल ताकतवर या कमजोर के नहीं हैं। ये हमारी उस समझ को बताते हैं, जो यह फैसला लेती है कि संरक्षण के लिए क्या सही है और विकास के वास्ते क्या अच्छा साबित होगा। साफ दिखता है कि हम गरीबों की कमाई की अहमियत समझ पाने में बुरी तरह से नाकामयाब रहे हैं।
हमारे नजरिये से गरीबों की कमाई पर्यावरण के लिए खतरनाक है और इसकी जब चाहे आहुति दी जा सकती है। इसलिए हम उस ‘रोजगार’ (जो हर नजरिये से घटिया है) को ज्यादा अहमियत देते हैं, जो बड़ी-बड़ी कंपनियां मुहैया करवा रही हैं। इसके लिए हम उन क्षेत्रों की बलि दे रहे हैं, जो उनसे अच्छे और ज्यादा रोजगार लोगों को मुहैया करवा रहे हैं।
हम उन कंपनियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं कि वे संसाधनों का सही इस्तेमाल करेंगी। हकीकत में तो वे संसाधनों का जरूरत से ज्यादा दोहन कर रही हैं और जंगलों को बर्बाद कर रही हैं। लेकिन हमें गरीबों की अर्थव्यवस्था पर भरोसा नहीं है, जिनके पास काफी कम पैसे हैं। यह बात हमारी उन लोगों या उनके काम करने के तरीके या फिर दोनों के प्रति नफरत को दिखलाता है।
इस तरह से आज वन्य संरक्षण बस पैसों का खेल बनकर रह चुका है। अगर आप पैसे चुका सकते हैं, तो आप जंगल के जंगल काट सकते हैं और वन्य जीवन को खत्म कर सकते हैं। देश का कोई भी जंगल इतना अमूल्य नहीं है, जिसे खरीदा नहीं जा सकता या फिर काटा नहीं जा सकता। लेकिन इसका इस्तेमाल गरीब नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास पैसे जो नहीं है। क्या हमारी दया की भावना इतनी मर चुकी है?