वित्तीय बाजार डॉ. सुब्बाराव को केंद्रीय बैंक का गवर्नर बनाए जाने से कमोबेश खुश है। इसका प्रमुख कारण यह लगता है कि वित्त सचिव के रूप में उन्होंने पहले जो काम किए हैं, उससे सकारात्मक रुख के संकेत मिलते हैं।
बाजार यह उम्मीद कर रहा है कि उनके कार्यकाल में वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच बेहतर तालमेल रहेगा, जैसा कि फंड प्रबंधकों ने विभिन्न टेलीविजन चैनलों के साथ साक्षात्कार के दौरान उम्मीद जताई। कुछ विदेशी निवेशक घरानों ने बहरहाल यह संदेह जाहिर किया है कि इस नियुक्ति से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का विलय हो जाएगा। यह आशंका जाहिर करने के पीछे कुछ वजहें हैं।
यह पहला अवसर नहीं है जब वित्त मंत्रालय के एक आला अधिकारी को रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद पर नियुक्त किया गया है। उनके पहले नियुक्त किए गए डॉ. वाईवी रेड्डी भी वित्त मंत्रालय वाले थे। इस तरह से सुब्बाराव की नियुक्ति से मानकों की अवहेलना जैसी कोई बात नहीं है।
दूसरी बात यह है कि रिजर्व बैंक का काम दो प्रमुख कार्य करना है- नियामक का और मौद्रिक नीति नियंता का। इस तरह से मुंबई और दिल्ली के बीच नियामक और ढांचागत नीतियों के सुधार को लेकर बेहतर समन्वय की संभावना बनती है।
बेहतर तालमेल का यह भी मतलब हो सकता है कि विकास और वित्त मंत्रालय के राजस्व के लक्ष्यों को रिजर्व बैंक, रेड्डी के कार्यकाल की तुलना में और ज्यादा आगे ले जाए। मैं इस बात पर संदेह करता हूं कि सुब्बाराव की मौद्रिक नीतियों के नए अवतार में बाजार ज्यादा रुचि दिखा रहा है।
एक सामान्य अनुमान है कि गवर्नर, विकास के प्रति ज्यादा सकारात्मक रुख अपनाएंगे और अपने पूर्ववर्ती की तुलना में मुद्रास्फीति को लेकर ज्यादा नरमी बरतेंगे। कुछ बॉन्ड के व्यवसायी पहले से ही लगातार बढ़ती ब्याज दरों पर लगाम लगाए जाने की प्रतीक्षा में हैं।
मै इस बात से भयभीत हूं कि भारत के केंद्रीय बैंक की भूमिका को पिछले डेढ़ दशक से समझने में बाजार की उम्मीदें एक अधूरी समझ दिखा रही हैं। आर्थिक निर्णय निर्माण के पदानुक्रम की स्थिति में भी यही हाल है। परिवर्तन की इस प्रक्रिया में तीन चीजें उभरकर सामने आती हैं।
पहला, जब ब्याज दरों की बात सामने आती है, तो यह बाजार के खिलाफ जाता है, भले ही वह नार्थ ब्लॉक की इच्छा के खिलाफ हो। पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह खुलकर सामने आया है। दूसरा, महंगाई को लेकर भले ही कोई नियत लक्ष्य न रखा गया हो, मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रित करना रिजर्व बैंक के मुख्य कार्य के रूप में सामने आता है।
इसका मतलब साफ है कि केंद्रीय बैंक की स्थिति, विकास और महंगाई दर को लेकर रिजर्व बैंक की स्थिति साफ है। इसे देखते हुए तात्कालिक बात यही उभरकर सामने आती है कि जब तक महंगाई पर काबू नहीं पा लिया जाता है, मौद्रिक नियमों में बदलाव के मामले में सुब्बाराव कोई कदम उठाने स्थिति में नहीं रहेंगे। तीसरी बात यह है कि केंद्रीय बैंक की बढ़ती स्वतंत्रता से वित्तीय और मौद्रिक चक्र में भी कुछ अलगाव आ रहे हैं।
आसान मौद्रिक नीति बनाकर वित्तीय आधिक्य को संतुलित करने से इनकार करके इसने एक स्पष्ट संदेश दिया कि वह बजट के उद्देश्यों को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं कर सकता, यह सुनिश्चित करता है कि सरकार अपनी फिजूलखर्ची का खामियाजा भुगतती है। संस्थात्मक विकास के लिहाज से रिजर्व बैंक ने एक प्रवृत्ति विकसित की कि कुछ चीजें अपरिवर्तनीय हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या यह आवश्यक रूप से अच्छी चीज है? या क्या हम वित्तीय और मौद्रिक नीति के मामले में नई दिल्ली और मुंबई के बीच रिश्ते को और वर्णनात्मकता से देख सकते हैं? मेरा तर्क है कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच समन्वय के अभाव होने से वास्तव में देश की मैक्रो इकनॉमिक नीतियों में वास्तव में कुछ बेहतरीन बातें सामने आई हैं।
वर्तमान घटनाक्रम में, जब मुद्रास्फीति बहुत ज्यादा है, हम पाते हैं कि महंगाई दर 90 के दशक के अंतिम वर्षों में महंगाई के औसत स्तर में कमी आई थी उस समय रिजर्व बैंक और नार्थ ब्लॉक में कोई संबंध नहीं था। उस समय जो मौद्रिक नीतियां बनती थीं उनके कई लक्ष्य होते थे, जिनका लक्ष्य मुद्रास्फीति के अलावा भी तमाम चीजें होती थीं।
इस मामले में भारत अकेला देश नहीं है। अब यह देखा जा रहा है कि पूरी दुनिया में महंगाई को रोकने के लिए माहौल बनता है और केंद्रीय बैंक उसको रोकने के लिए कोशिश करते हैं। यूरोपियन सेंट्रल बैंक और बैंक आफ इंगलैंड जैसे बड़े केंद्रीय बैंकों का भी इस समय एकमात्र लक्ष्य है कि महंगाई दर को लक्षित स्तर पर लाया जाए। इनमें से कि न्हीं भी सेंट्रल बैंकों ने एक्सचेकर का हस्तक्षेप मंजूर नहीं किया और न ही एक्सचेकर को मध्यस्थ बनाने का काम किया।
एक बात यह भी है कि नए गवर्नर की अपनी भी अवधारणाएं हैं। अगर उनके द्वारा दिए गए सामान्य बयान से उनकी सोच का अनुमान लगाएं तो ऐसा लगता है कि वे केंद्रीय बैंक के गवर्नर के रूप में वैचारिक रूप से सही हैं। वित्त सचिव के रूप में प्रेस से बातचीत के दौरान उन्होंने कुछ आर्थिक मंदी के बारे में अपनी राय जाहिर की थी और कुछ मसलों को उठाया था।
उन्होंने कहा था कि नीति निर्माण में मुद्रास्फीति पहली प्राथमिकता होती है। उन्हें यह भी स्पष्ट है कि कौन सी नीतियां हैं, जिन्हें लागू करके महंगाई पर नियंत्रण पाया जा सकता है। दो महीने पहले एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि मौद्रिक नीति का पहला उद्देश्य महंगाई से रक्षा करना है।
संक्षेप में कहें तो ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि बाजार को बेहतर समन्वय मिलेगा। वित्त मंत्रालय और मिंट स्ट्रीट एक ही राग नहीं अलापेंगे। दोनों संस्थाओं की ओर से विनिमय दरों, ब्याज दरों और विकास जैसी चीजों पर विरोधाभासी बयान आएंगे। इस मतभेद की प्रमुख वजह यह है कि दोनों संस्थाओं के एजेंडे अलग-अलग होंगे।
वित्त मंत्रालय की एक जटिल भूमिका यह है कि अर्थव्यस्था की उम्मीदों को पूरा करे और कठिन दौर में निराशा के माहौल को दूर करे। अन्य केंद्रीय बैंकों की तरह ही भारतीय रिजर्व बैंक जमीनी हकीकतों को ध्यान में रखकर फैसले करेगा। एक बार जब बाजार को यह विश्वास हो जाएगा, तो वहां से बेहतरीन प्रतिक्रियाएं आने लगेंगी।