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बिहार के नालंदा में कुछ ऐसे बही बदलाव की बयार

Last Updated- December 06, 2022 | 9:44 PM IST

आजकल बिहार के छोटे से जिले नालंदा के दो ब्लाकों, चांदी और नगरनौसा में एक नारा खूब सुनाई देता है।


यह नारा है, ‘जो दलितों के हित की बात करेगा, वही पंचायत में राज करेगा’। यह तो यहां के दलितों के बीच खासा लोकप्रिय हो चुका है। कमजोर वर्गों पर अत्याचारों के लिए कुख्यात हो चुके इन ब्लाकों में इन लोगों ने खुद को पूअरेस्ट एरिया सिविल सोसाइटी के तहत एकजुट किया है (पाक्स) और अपने अधिकारों की मांग करने में जुटे हुए हैं।


डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के प्रमुख अशोक खोसला का कहना है कि,’पाक्स प्रोग्राम है ब्रिटिश सरकार का। इसे पैसे भी ब्रिटिश सरकार का अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग देता है। इसकी शुरुआत हुई थी 2001 में और पिछले साल यह खत्म हो गया। इसके तहत देश भर के 94 सबसे गरीब जिलों में 192 करोड़ रुपये के कुल रकम के साथ विकास कार्यों की शुरुआत की गई।


इसमें से 15 करोड़ रुपये बिहार के 24 जिलों के लिए दिए गए। यह पैसे वहां लगाए गए दलित उत्थान, रोजगार मुहैया करवाने, पारदर्शिता सुनिश्चित करने और पंचायती राज व्यवस्था की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने में। इन कामों को गांवों की सामुदायिक संस्थाओं और गैर सरकारी संस्थाओं की मदद से अमली जामा पहनाया गया।’ डेवपलमेंट अल्टरनेटिव्स ने पाक्स को भारत में अंजाम दिया था।


इससे आम लोगों को फायदा भी हुआ है। दलित संघर्ष समिति नामक संस्था के ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ता और माधोपुर गांव के निवासी अशोक साहेब का कहना है कि,’पहले हमें अपने अधिकारों के बारे में पता नहीं था। और न ही हम ग्राम सभा की बैठक में हिस्सा लेते थे। लेकिन अब हम ग्राम सभा की बैठक में हिस्सा लेते हैं और अपने मुद्दों को उठाते हैं।’


अशोक का तो सपना इस मोर्चे को राज्य स्तर पर ले जाने का है, लेकिन वह नहीं जानते कि पाक्स के खत्म हो जाने के बाद वह अपने सपने को कैसे पूरा करेंगे। उनका कहना है कि यहां यह प्रोग्राम काफी देर से आया और जल्दी चला गया।

First Published - May 6, 2008 | 11:18 PM IST

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