खाद्य पदार्थों, उर्वरक और ईंधन पर दी जा रही सब्सिडी दिन पर दिन बढती जा रही है तथा पिछले कुछ महीनों में इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि आखिर कैसे इस सब्सिडी को नियंत्रण में रखा जाए।
ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2008-09 में इन पदार्थों पर सब्सिडी की दर जीडीपी की क्रमश: 1, 2 और 3 फीसदी हो जाएगी। आप इन्हें राजनीतिक नेताओं का नया 1-2-3 करार कह सकते हैं। सब्सिडी देने की प्रक्रिया करीब छह दशक पुरानी है और भले ही इससे अर्थव्यवस्था को चोट पहुंच रही हो तथा यह कितना कारगर होता है, यह भी अपने आप में गौर करने योग्य विषय है।
जरा इन मुद्दों पर ध्यान दें:
बिजली: बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी काफी अरसे से चली आ रही है। भले ही इस सब्सिडी को कम करने के तमाम प्रयास किए जा चुके हैं फिर भी सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस सब्सिडी का भार कितना बढ़ चुका है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि 2007-08 में राज्य विद्युत बोर्ड की ओर से बिजली पर दी जा रही सब्सिडी बढ़कर 43,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी जो जीडीपी का करीब एक फीसदी है।
इनमें से दो तिहाई सब्सिडी कृषि क्षेत्र को दी जाती है और बाकी घरेलू इस्तेमाल पर। सब्सिडी की समस्या के साथ कुछ और मसले भी जुड़े हुए हैं जिससे बिजली विभाग परेशान है जैसे गारंटी और काउंटर गारंटी का डरावना इतिहास, निरंतर विद्युत घाटा (वर्ष 2007-08 में तो यह घाटा 15 फीसदी के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया था), मध्यम और छोटे स्तर के उद्योगों को बाधित विद्युत आपूर्ति, भूजल का अत्यधिक दोहन और देश भर में नियमित ‘लोड शेडिंग’ जिसमें राजधानी दिल्ली को भी नहीं बख्शा गया।
सिंचाई: विभिन्न राज्यों के बजट में बिजली के बाद सिंचाई के लिए सबसे अधिक सब्सिडी का प्रावधान होता है। अगर गुजरात और महाराष्ट्र को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में सिंचाई परियोजनाओं में पानी के लिए जो शुल्क देना पड़ता है उससे ओ ऐंड एम लागत के कुछ हिस्से की भरपाई हो पाती है। इसमें पिछले कुछ दशकों में नहर और बांधों को तैयार करने के लिए जो भारी निवेश किया गया है वह भी शामिल है।
परिणामस्वरूप सिंचाई व्यवस्थाओं की देखभाल ठीक ढंग से नहीं हो पाती है और इन योजनाओं की जितनी क्षमता होती है उसका भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है। पानी की समूचित व्यवस्था नहीं होने के कारण ही कृषि उत्पादन घट रहा है। और हम सभी जानते हैं कि इस बार इन समस्याओं के साथ ऊंची महंगाई दर की मार भी लोगों को सता रही है।
शहरी जल आपूर्ति: कम कीमत वसूलना और सब्सिडी इस क्षेत्र की भी बड़ी समस्याएं हैं। जैसे की दुनिया के अधिकांश देशों में होता है वैसे ही भारत में भी शहरों में हफ्ते के सातों दिन 24 घंटे पानी की आपूर्ति नहीं हो पाती है। जल और सफाई इंतजामात के लिए सही निवेश नहीं हो रहा है और साथ ही इन क्षेत्रों में मरम्मत की जो आवश्यकता है उसे भी पूरा नहीं किया जा पा रहा है।
स्लम में रहने वाले लोगों को अगर पाइप से जलापूर्ति होती है तो उन्हें भाग्यशाली ही समझा जाना चाहिए, यह अलग बात है कि इस पानी से भी उनके स्वास्थ्य के खराब होने का खतरा बना रहता है। कई लोग ऐसे होते हैं जो दूसरे माध्यमों से ऊंची कीमत पर पानी खरीदते हैं। ऐसे में जो सब्सिडी दी जाती है उसका ज्यादातर हिस्सा अमीरों और मध्यम तबके के लोगों को चला जाता है।
खाद: सब्सिडी का यह ऐसा हिस्सा है जिसका बोझ केंद्र सरकार उठाती है। अधिकांश सब्सिडी यूरिया पर ही दी जाती है। लंबे समय से खाद क्षेत्र को दी जा रही सब्सिडी को लेकर विभिन्न वर्गों की ओर से सुझाव दिए जाते रहे हैं, फिर भी यह सिलसिला पहले की तरह ही चला आ रहा है। और कुछ ऐसे ही चला आ रहा है पोटैशियम और फॉस्फेट की तुलना में नाइट्रेट का अत्यधिक इस्तेमाल, जिससे जमीन को नुकसान पहुंच रहा है।
इसी का नतीजा है कि लोग नए निवेश से कतरा रहे हैं और पिछले 20 वर्षों के दौरान किसी नई क्षमता का विकास नहीं हो पाया है। फिलहाल विश्व स्तर पर खाद की जो किल्लत शुरू हुई है, उसके पीछे कहीं न कहीं यह एक बड़ी वजह रही है।
उच्च शिक्षा: सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और संबंधित संस्थानों में सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है और कुछ एक संस्थान तो ऐसे हैं जहां पिछले कई दशकों से फीस नहीं बढ़ाई गई है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि इन संस्थानों में भौतिक आधारभूत संरचनाओं का अभाव है और इन्हें अच्छे शिक्षाकर्मी भी नहीं मिल पा रहे हैं। इस समस्या को और जटिल बनाने का काम जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था ने किया है।
अमीरों और सुविधासंपन्न लोगों ने अपने बच्चों को ऐसे संस्थानों से अलग कर लिया है और अब वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने लगे हैं (जो कई गुना अधिक फीस वसूलते हैं)। या फिर ऐसे लोग अपने बच्चों को निजी संस्थानों में पढ़ाना बेहतर समझ रहे हैं। जिनके पास इतना पैसा नहीं है उनके पास इन सरकारी संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं है। यह राजनीतिक दाव पेंच का ही नतीजा है कि इन संस्थानों में सुधार नहीं हो पा रहा है। ऐसे में जब कि पूरी दुनिया ज्ञान आधारित शक्ति की बात कर रही है देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है।
पेट्रालियम उत्पाद: तेल सब्सिडी की कहानी को शायद दोहराने की जरूरत न हो। सब्सिडी से सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को जो नुकसान हुआ, उसके अलावा भी देश का राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसे सब्सिडी का ही खेल कहा जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था का ‘डीजलीकरण’ हो रहा है और साथ ही इससे भी अधिक सस्ते केरोसीन से पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है।
खाद्य पदार्थ: भले ही इस विषय पर सबकी राय एक जैसी न हो पर कहना गलत नहीं होगा कि शुरुआती वर्षों में पीडीएस आधारित खाद्य सब्सिडी को कुछ सफलता मिली थी। खासतौर पर इससे गरीबों को काफी लाभ हुआ था। पर धीरे धीरे पीडीएस व्यवस्था बिगड़ती ही चली गई और वितरण व्यवस्था ने कमोबेश पांच राज्यों में ही ठीक ठाक काम किया है, जिनमें उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे घनी आबादी वाले और गरीब राज्य शामिल नहीं हैं।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि देश के कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनका प्रदर्शन बेहद खराब रहा है और इसके पीछे आपूर्ति व्यवस्था, कीमतें और सब्सिडी जिम्मेदार हैं। साफ है कि अगर खराब प्रदर्शन के दौर से गुजर रहे क्षेत्रों को विकास की पटरी पर लाना है तो एक ही विकल्प हो सकता है, उन्हें दी जा रही सब्सिडी को खत्म करना।
आप शायद ही किसी ऐसे क्षेत्र का नाम गिना पाएं जहां भारी सब्सिडी दी जाती हो और उस क्षेत्र का प्रदर्शन भी अच्छा रहा हो। वहीं अगर इसके विपरीत देश के कुछ ऐसे क्षेत्रों का नाम लें जो बेहतर प्रदर्शन करते रहे हैं जैसे आईटी, टेलीकॉम, औषधि, दोपहिया वाहन और मनोरंजन, तो पता चलता है कि ये सभी सब्सिडी के जाल से बचे रहे हैं।