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सत्ता की लड़ाई में जाति और धर्म अब भी हावी

Last Updated- December 11, 2022 | 1:16 AM IST

बिहार में मधेपुरा इलाके के सकरापुरा गांव के लोग इसलिए लोक  सभा चुनाव में मतदान नहीं करने जाएंगे क्योंकि वहां बिजली एवं सड़क की हालत बदतर है।
उन्हें न तो जात से मतलब है और न ही मजहब से। उन्हें मतलब है अपने विकास से। और इन्हीं कारणों से उन्होंने मधेपुरा के जिलाधिकारी से लिखित रूप में चुनाव के बहिष्कार की इच्छा जाहिर की है। लेकिन बिहार में सभी जगहों पर ऐसा नहीं है।
अधिकतर इलाकों में अब भी उम्मीदवारों की जाति, परिवारवाद, धर्म, बाबरी मस्जिद प्रकरण, मुसलमानों की सुरक्षा एवं दलितों के साथ अत्याचार जैसी बातें चुनावी मुद्दे बन कर उभर रही हैं। बिहार में वैशाली लोक सभा सीट से राजद प्रत्याशी एवं केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह अपनी चुनावी सभा में यह जरूर कह रहे हैं कि नीतीश सरकार को विकास के लिए केंद्र से जो राशि मिली है वह खर्च नहीं हो पायी।
और बिहार में सड़क निर्माण का काम केंद्र सरकार के पैसे से हुआ है न कि राज्य सरकार के। लेकिन सिंह विकास की बात को मुख्य चुनावी मुद्दा नहीं मानते। उनके मुताबिक बिहार में जातिगत राजनीति अब भी हावी है और वोटों का असली आधार यही है। हालांकि चुनावी मंच से खुलेआम जात के नाम पर वोट देने की अपील बिहार के किसी कोने में नहीं की जा रही है।
वामपंथी नेता और बिहार की राजनीति में 40 सालों तक सक्रिय रहने वाले चतुरानन मिश्र के मुताबिक मंडल कमीशन के दौरान सिर्फ एक ही मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया। लेकिन बार-बार इन्हीं मुद्दों को प्रमुखता नहीं दी जा सकती है। अब पिछड़ी जातियां भी आरक्षणभोगी एवं गैर आरक्षण भोगी भागों में बंट चुकी हैं।
 बिहार के दिग्गज लालू एवं रामविलास करीब दो दशक पुराने बाबरी मस्जिद मामले को चुनावी मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लगभग हर चुनावी मंच से लालू प्रसाद बाबरी मस्जिद ढहने का जिक्र करते हैं। बाबरी मस्जिद के नाम पर अपने वोट बैंक को एक करने के लिए उन्होंने भाजपा के साथ कांग्रेस को भी मस्जिद गिरने के लिए जिम्मेदार बता दिया।
राजग विरोधी पार्टियां यह भी कह रही है कि केंद्र में राजग की सरकार बनने पर बिहार में भी गुजरात की तरह दंगे होंगे। दूसरी तरफ राजद विरोधी पार्टी के नेता परिवारवाद यानी कि लालू-राबड़ी के परिवार को भी चुनावी मुद्दा बनाने पर तुले हैं। वे कह रहे हैं कि लालू ने अपने परिवार के लोगों को अपने शासनकाल में पूर्ण रूप से संरक्षण दिया और उनके विकास में ही लगे रहे।
कोसी की राजनीति भी बिहार में हो रही है। और कोसी के कहर से पीड़ित इलाकों में हर पार्टी के नेता अपने-अपने राहत कार्य को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बाढ़ के पानी को सिंचाई के काम आने वाली नदियों से जोड़ा जाएगा।
चुनावी सभा में इस बात की गूंज भी सुनाई दे रही है कि कोसी पीड़ितों के पुनर्वास के लिए 14,900 करोड़ रुपये के पैकेज की मांग केंद्र सरकार से की गयी, लेकिन यूपीए के सहयोगी दलों ने इस राशि की प्राप्ति में टांग अड़ाए।
कई वरिष्ठ नेताओं का यह भी मानना है कि इस बार बिहार में कोई भी ऐसा मुद्दा नहीं है जो एक लहर पैदा कर सके। हर नेता अलग-अलग तरीकों से वोट बैंक को रिझाने में लगे हैं।  लेकिन एक बात की समानता हर पार्टी के चुनावी मुद्दों में है और वह है विकास का मुद्दा। 

First Published - April 20, 2009 | 9:52 AM IST

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