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चुनावी शोर में अनसुनी रह गई नरेगा की आवाज

Last Updated- December 11, 2022 | 1:16 AM IST

बिहार में चुनाव किसी महोत्सव से कम नहीं होता। हर तरफ रैलियाें का शोर और हर ओर नए-नए वादे। इस बार भी आम चुनाव कुछ अलग नहीं हैं। इस बार भी रैलियों का शोर है।
जात-पात के मुद्दे अहम तो हैं, लेकिन राजनीतिक दल विकास के मुद्दे को भी जोर-शोर उछाल रहे हैं। एक तरफ संप्रग के सहयोगी दल केंद्र के अपने पांच साल के शासन का बखान कर रहे हैं तो दूसरी तरफ राज्य की राजग सरकार के मुताबिक जो कुछ हासिल हुआ है, वह उनकी खुद की उपलिब्ध है।
विकास से ही जुड़ा एक मुद्दा है, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा)। कांग्रेस और उसके सहयोगी राजनीतिक दल इसका इस्तेमाल तो दूसरे राज्यों में खूब कर रहे हैं, लेकिन बिहार में यह मुद्दों की भीड़ में कहीं खो गया है। इसकी याद राजनेताओं को तभी आती है, जब उन्हें याद दिलाई जाती है। कई राजनेताओं की नजर में तो यह मुद्दा ही नहीं है।
क्यों है ये बेरुखी?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वजह काफी जायज है। दरअसल, अभी तक सारा जोर हुआ करता था जातिगत समीकरणों पर, लेकिन बकौल विश्लेषक अब हालात बदल रहे हैं।
उनका कहना है कि, वैसे तो जाति अब भी एक बडा मुद्दा है, लेकिन अब लोग यह भी देखते हैं कि उनके नुमाइंदों ने इलाके के लिए कितना काम किया है। अगर ऐसा नहीं होता, तो वर्ष 2004 में लोगों का मोह मौजूदा सांसदों से इस तरह भंग नहीं होता।
हालांकि, वे यह भी मानते हैं कि जाति को एक मुद्दे के तौर पर सिरे से खारिज कर देना भी बडी बेवकूफी होगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सड़क और बिजली जैसे दूसरे मुद्दे भी अहम हो गए हैं। एक तरफ संप्रग के घटक दल इस नरेगा से इसलिए दूरी बनाए हुए हैं, क्योंकि इसे लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है।
दूसरी तरफ, राज्य की जनता दल (यू) की नीतीश सरकार इस पर इसलिए जोर नहीं दे रही है क्योंकि इस पर जोर देने का मतलब होगा केंद्र सरकार की तारीफ करना। इस मुद्दे के बजाए केंद्र में सत्तारुढ़ संप्रग के घटक दल अपने-अपने नेताओं की खूबियों को गिनाने में लगे हुए हैं, तो राज्य सरकार के नेता अपनी उपलब्धियों को। भाजपा और जद (यू) के नेता बिहार में सुशासन की बात कहकर लोगों से वोट मांग रहे हैं।
बिहार के औरंगाबाद इलाके के सांसद निखिल कुमार बताते हैं कि आज वोटर स्थानीय मुद्दों को ज्यादा जोर देने लगे हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि उनके घर में पानी क्यों नहीं आ रहा। उनके गांव में पक्की सडकें क्यों नहीं बन रही। आज ये मुद्दे अहम हैं।
क्या है जमीनी हकीकत?
बिहार में नरेगा की हालत पहली नजर में तो काफी अच्छी खासी नजर आती है। राज्य सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के आंकडों की मानें तो इसके लिए अब तक 2026.44 करोड़ रुपये की रकम मिल चुकी है। इनमें से राज्य सरकार 1272.82 करोड़  रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
साथ ही,  इसके तहत 102943 कामों का बीड़ा उठाया गया था और अब तक 52138 काम पूरे किए जा चुके हैं। साथ ही, 50805 परियोजनाओं में काम प्रगति पर है। इसके अलावा, सरकारी आंकडों की मानें तो महिलाओं की हिस्सेदारी भी इसमें 30 फीसदी से ज्यादा नजर आती है। तो ऊ पर से सब कुछ अच्छा नजर आता है। लेकिन आंकडों के इस जंजाल के पीछे भी एक हकीकत है।
किशनगंज, कैमूर, वैशाली और भोजपुर जैसे जिलों में महिलाओं की भागीदारी काफी कम रही है। कुछ इलाकों में तो यह 14-15 फीसदी तक सिमट जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी करीब 48 फीसदी की है। साथ ही, दरभंगा, कटिहार, मधुबनी और समस्तीपुर जैसे कुछ जिलों में आबंटित रकम के बस थोड़े से हिस्से का इस्तेमाल किया गया है।
साथ ही, सुपौल, मुंगेर, जहानाबाद और रोहतास में काफी कम कामों को पूरा किया गया है। साथ ही, अभी आदर्श चुनाव संहिता के लागू होने से भी यहां ऊहापोह की स्थिति थी। बाद में केंद्र सरकार द्वारा स्थिति स्पष्ट किए जाने के बाद यह काम फिर से शुरू हुआ है।
नेताजी कहिन
नरेगा को लेकर राज्य और केंद्र में मौजूद अलग-अलग पार्टियों की सरकारें और उनके नेता इस बारे में कुछ खुलकर कहने को तैयार नहीं होते। बक्सर से भाजपा के मौजूदा सांसद लाल मुनी चौबे का कहना हैं,  ‘चुनाव में बड़ा मुद्दा विकास का ही रहेगा। लालू यादव और उनके सहयोगी जाति का सहारा लेकर लड़ते हैं, लेकिन हम नहीं। हम सबको रोजगार देंगे।’
हालांकि, चौबे इसके लिए नरेगा का सहारा नहीं लेना चाहते। उनका कहना है कि, इस योजना को लाकर केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार की ज़डों को ग्रामीण समाज में और गहरा उतार दिया है। अब मुखिया से लेकर चपरासी तक सब ग्रामीण जनता को और लूटेंगे। साथ ही, लोग जागरूक नहीं हैं, इसलिए वे काम करने के बजाए खुद अफसरों की जेब को भरना ज्यादा पसंद करेंगे।
दूसरी तरफ, कांग्रेस के औरंगाबाद से सांसद निखिल कुमार इसके ठीक उलट बात कहते हैं। उनका कहना है कि नरेगा एक बहुत ही उम्दा योजना है। इसके तहत अब तक पिछले तीन सालों में हर साल 16-18 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। अगर इनमें से एक छोटा सा हिस्सा भी ग्रामीण जनता तक आया होगा, तो उसने एक बडी भूमिका निभाई है।
जब उनसे अपने क्षेत्र के बारे में पूछा गया, तो उनका कहना था कि उनके निर्वाचन क्षेत्र के लिए पिछले वित्त वर्ष में 38 करोड़ रुपये की रकम आबंटित की गई, जिसमें से सिर्फ 13 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इतने कम इस्तेमाल का ठीकरा वह राज्य सरकार के ऊपर फोड़ते हैं। इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है, इसलिए वह इसमें भ्रष्टाचार के लिए राज्य की नीतीश सरकार को जिम्मेदार मानते हैं।
बात पब्लिक की
जहां तक जनता की बात है, तो उसे भी नरेगा पर से फोकस हटने से कोई ज्यादा तकलीफ होती दिखाई नहीं दे रही है। पटना में एक कोचिंग इंस्टीटयूट चलाने वाले ए.के. सिन्हा बताते हैं, ‘आज लोगों के लिए अहम बात यह है कि अपराध की दर कम हुई है। यह एक राहत की बात है और यह हमारे लिए बडी बात है।’ 
पेशे से किसान रघुनाथ झा का कहना है कि हमारे लिए अहम यह है कि किसी उम्मीदवार ने मेरे इलाके के लिए कितना काम किया है। कितनी सड़कें बनाईं गयीं हैं और बाढ़ से हमारी फसल को बचाने के लिए?क्या-क्या उपाय किए गये हैं।

First Published - April 20, 2009 | 9:49 AM IST

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