मंदी के दौर में भी लुधियाना के सिलाई मशीन उद्योग के लिए उम्मीद की एक रोशनी नजर आ रही है।
दरअसल, कच्चे माल की घटती कीमतों की वजह से उद्योग को थोड़ी राहत है। पिछले साल स्टील की रिकॉर्ड कीमतों ने सिलाई मशीन उद्योग की हालत खस्ता कर दी थी।
अब जब कच्चे माल की कीमतें नीचे आई हैं तो शहर के सिलाई मशीन डीलर्स खुद यह मान रहे हैं कि आने वाले दिनों में उनका कारोबार कुछ सुधर सकता है। देश में जितनी सिलाई मशीनों की मांग होती है, उनमें से 85 फीसदी मशीनें लुधियाना के बाजारों से ही आती हैं।
हालांकि शहर से जो सिलाई मशीनें तैयार होकर निकलती हैं उनसे ज्यादातर घरेलू बाजार की जरूरतें ही पूरी होती हैं क्योंकि उद्योगों के लिए सिलाई मशीनों की आपूर्ति चीन से होती है।
लुधियाना में सिलाई मशीन डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल कपूर ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि कच्चे माल की कीमतें घटने से शहर के डीलरों पर बोझ कम हुआ है और पिछले साल की तुलना में इस साल उनका कारोबार तकरीबन 50 फीसदी तक बढ़ा है।
उन्होंने बताया कि सिलाई मशीनों में कच्चा लोहा इस्तेमाल किया जाता है जिसकी कीमत पिछले साल बढ़कर प्रति टन 42,000 रुपये तक पहुंच गई थी। पर अब इसकी कीमतें घटकर आधी रह गई हैं और इससे उद्योग को काफी राहत है।
वहीं पिग आयरन की कीमतें भी पिछले साल की तुलना में 50 फीसदी तक घटी हैं और इस वजह से सिलाई मशीनों की लागत भी 25 फीसदी तक कम हुई है। सिलाई मशीनों की कीमत कम होने से सीधा सीधा असर इसकी बिक्री पर पड़ा है और इसमें तेजी दर्ज की गई है।
डीलरों को भी उम्मीद है कि कच्चे लोहे की कीमतें घटने से वित्त वर्ष 2009-10 में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में उनका कारोबार 15 से 20 फीसदी तक बढ़ेगा। कपूर ने यह भी बताया कि लुधियाना के सिलाई मशीन उद्योग को इस साल 350 करोड़ रुपये का कारोबार होने की उम्मीद है जो पिछले वित्त वर्ष (2008-09) में 300 करोड़ रुपये का था।
वहीं सिलाई मशीन डीलर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र रखेजा ने भी माना कि कच्चे माल की कीमतें घटने से सिलाई मशीन डीलरों में उत्साह है। कीमतें बढ़ने से मशीनों की बिक्री में इजाफा साफ देखा जा सकता है।