संप्रग गठबंधन सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (नरेगा) योजना बिहार में बहुत ज्यादा सफल होती नहीं दिखाई देती है।
यहां सरकारी आंकड़ों की कलाबाजी आपको यह जरूर आश्वस्त कर सकती हैं कि सुदूर गांव के मजदूरों को इसका फायदा हो रहा है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। इस बात से केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह भी इनकार नहीं करते हैं।
उनका कहना है, ‘केंद्र ने बिहार के 23 जिलों में नरेगा को लागू करने की बात कही, लेकिन राज्य सरकार ने इसे एक साथ 38 जिलों में लागू कर दिया। इसका खामियाजा यह हुआ कि अफसरशाही को छूट मिली है और ठीक तरह से जॉब कार्ड बांटने का काम तक नहीं पूरा किया गया। यहां के हर जिले में 100 करोड़ रुपये इस योजना के तहत खर्च होने चाहिए लेकिन आंकड़ा 10-12 करोड़ रुपये के बीच में ही बना हुआ है।’
वहीं बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री नरेगा की सफलता के बारे में कहते हैं, ‘इस साल फरवरी तक 1.01 करोड़ लोगों से ज्यादा को जॉब कार्ड दिया गया लेकिन 33,20,916 लोगों को काम मुहैया कराया गया।’ उनका कहना है कि केंद्र से दी गई राशि का 64 फीसदी फरवरी तक खर्च की गई। हालांकि उनका दावा है की मार्च तक कुल व्यय 83 फीसदी तक संभावित है।
जमीनी दास्तां
नरेगा पर शोध करने वाली ऋतिका खेरा का कहना है, ‘बिहार में नरेगा के तहत बहुत कम काम शुरू हुआ है। कई जगह ग्रामीणों का आवेदन नहीं लिया जा रहा है तो कहीं पैसा राज्य से जिले तक बहुत देर से पहुंचता है और अक्सर पूरी तरह से खर्च भी नहीं होता है और जागरूकता का अभाव भी है। मस्टर रोल पर हमने कई झूठे नाम और झूठी हाजिरी देखी है।’
गौरतलब है कि इस योजना के लिए बिहार के लिए कुल फंड 2041.47 करोड़ रुपये दिए गए जिसमें से 1305.81 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके अलावा नरेगा के तहत कुल 104339 योजनाओं पर काम किया जाना था। फिलहाल स्थिति यह है कि इसमें से 52456 काम ही पूरे हुए हैं। बिहार की महिलाओं की भागीदारी भी इस योजना में 30.09 फीसदी ही है।
नरेगा के लिए जनजागरण अभियान के तहत अररिया और कैमूर जिले में काम करने वाली कामायनी का कहना है कि इन दोनों जिलों में एक सर्वे कराया गया जिसके मुताबिक महज 2 फीसदी लोगों को ही 100 दिनों काम मिला था। इसके अलावा वर्ष 2007-08 में नरेगा के तहत ग्रामीण घरों को 7 दिन का रोजगार मिला जबकि राजस्थान में 68 दिन का रोजगार मिला।
कामायनी कहती है, ‘बिहार में नरेगा में कई स्तर पर समस्याएं हैं। अररिया जिले में बहुत ज्यादा पलायन सी स्थिति है। वहां के लोगों का कहना है कि अगर मौका मिले तो हम पूरे साल काम करने के लिए तैयार हैं और हमें हर साल अपना घर छोड़कर काम की तलाश में दूसरे राज्य नहीं जाना पड़ेगा। बिहार में नरेगा के तहत औसतन 22 दिनों का जबकी राजस्थान में औसतन 73 दिनों का काम सृजन हुआ।’
कामायनी ने अररिया और कैमूर जिले में काम करते हुए पाया कि वहां लोगों को काम के एवज में 40-60 रुपये तक मिलता था। जबकि वैध रूप से 89 रुपये तक का भुगतान करना है। बिहार के कैमूर जिले में ठेकेदारों और स्थानीय दबंग लोगों का वर्चस्व भी साफ दिखाई देता है।