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Health Insurance: सिर्फ कंपनी के हेल्थ इंश्योरेंस पर निर्भर, तो जेब पर लगेगा तगड़ा झटका

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कंपनी ने स्वास्थ्य बीमा कराया हो, आपको पर्याप्त रकम वाला व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा भी लेना चाहिए

Last Updated- July 30, 2023 | 11:15 PM IST
Insurance

पॉलिसीबाजार डॉट कॉम ने हाल ही में 2,000 से अधिक कॉरपोरेट स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों का अध्ययन किया, जिसमें पता चला कि बीमा के साथ कई सीमाएं और शर्तें जुड़ी हैं। आपको अपनी कंपनी से जो स्वास्थ्य बीमा मिला है, वह बीमारी या दुर्घटना होने पर सबसे पहले काम आता है मगर केवल उसी के भरोसे बैठना सही नहीं होगा।

बड़ी कमियां

कमरे के किराये की सीमा: पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के अध्ययन में पता चला कि 12 फीसदी कॉरपोरेट स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में अस्पताल के कमरे का किराया कुल बीमा राशि के 1 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। 48 फीसदी पॉलिसियों में किराया 5,000 रुपये प्रति रात्रि से अधिक नहीं है।

यदि कॉरपोरेट पॉलिसी में कुल 3 लाख रुपये का बीमा है और कमरे का किराया 1 फीसदी ही रखा गया है तो अधिकतम 3,000 रुपये प्रति रात्रि से अधिक किराया नहीं दिया जा सकता। जाहिर है कि महानगर में बढ़िया अस्पताल में केवल एक मरीज के लिए वातानुकूलित कमरा इस रकम में मिल ही नहीं सकता।

मान लीजिए कि किसी कर्मचारी को कंपनी के स्वास्थ्य बीमा के तहत 5,000 रुपये प्रति रात्रि तक का कमरा मिल सकता है मगर वह 10,000 रुपये किराये वाला कमरा लेता है तब क्या होगा? पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के सह-संस्थापक यशीष दहिया कहते हैं, ‘इस सूरत में पॉलिसी के तहत मंजूर किराया असली किराये का 50 फीसदी ही है।

जानकारी नहीं होने की वजह से लोग मान लेते हैं कि उन्हें बकाया 5,000 रुपये प्रति रात्रि ही अपनी जेब से देने पड़ेंगे। वास्तव में बीमा कंपनी तय कायदे लागू करेगी और इलाज पर हुए कुल खर्च का केवल 50 फीसदी ही मरीज को अदा करेगी।’

बीमा राशि भी कम: अध्ययन में पता चला कि 26 फीसदी पॉलिसियों में केवल 1 या 2 लाख रुपये का बीमा किया गया था और 48 फीसदी पॉलिसियों में बीमा राशि 3-4 लाख रुपये थी। अक्सर कंपनियां प्रीमियम कम रखने के लिए ऐसा करती हैं। मगर गंभीर बीमारी हुई तो 4 लाख रुपये की बीमा राशि बहुत कम पड़ेगी।

को-पेमेंट: कई पॉलिसियों में अब 10-20 फीसदी को-पेमेंट की शर्त भी होती है। को-पेमेट का मतलब है कि बीमा कराने वाले को इलाज के कुल खर्च की 10 या 20 फीसदी रकम अपनी जेब से चुकानी पड़ेगी। बीमा कंपनी केवल 80 या 90 फीसदी बिल ही चुकाएगी।

मोतियाबिंद के लिए सब-लिमिट: कॉरपोरेट बीमा पॉलिसी में मोतियाबिंद के लिए आम तौर पर 25,000 रुपये की सब-लिमिट भी होती है। लेकिन चीरा लगाए बगैर इलाज कराने पर 1.5 से 2 लाख रुपये खर्च हो सकते हैं।

रोबॉटिक सर्जरी: रोबॉटिक सर्जरी में ऑपरेशन एकदम सधे हाथों से होता है मगर हो सकता है कि आपे कॉरपोरेट स्वास्थ्य बीमा में इसे शामिल ही नहीं किया गया हो या इसका पूरा खर्च नहीं दिया जाता हो।

कम परिजन: कॉरपोरेट पॉलिसियों में अब बीमा का दायरा छोटा किया जा रहा है। पॉलिसीबॉस डॉट कॉम के कार्यकारी निदेशक अपार कासलीवाल बताते हैं, ‘ज्यादातर पॉलिसियों में केवल कर्मचारी और उसके निकटतम परिजनों यानी पति/पत्नी और बच्चों को ही शामिल किया जा रहा है। माता-पिता या सास-ससुर जैसे बुजुर्ग परिजनों को इसमें जगह नहीं दी जा रही है क्योंकि ऐसा करने पर प्रीमियम बढ़ जाता है।’
अस्थायी बीमा कवर: कॉरपोरेट स्वास्थ्य बीमा तभी तक मिलता है, जब तक आप उस कंपनी में काम करते हैं। नौकरी छोड़कर दूसरी कंपनी में जाने पर, नौकरी से निकाले जाने पर या अपना काम शुरू करने पर इस बीमा की सुविधा खत्म हो जाती है।

मगर फायदे भी

कॉरपोरेट पॉलिसियों के फायदे भी होते हैं। कर्मचारी को इसका प्रीमियम खुद नहीं भरना पड़ता। कासलीवाल कहते हैं, ‘यदि कर्मचारी को पहले से कोई बीमारी है तो प्रतीक्षा अवधि के झंझट में पड़ने के बजाय उसे पहले दिन से ही उस बीमारी का भी बीमा कवर मिलने लगता है।’ हालांकि इसमें बीमा राशि कम होती है मगर छोटी-बीमारी या दुर्घटना के कारण कुछेक दिन ही अस्पताल में गुजारने हो तो इसी पॉलिसी में काम चल जाता है।

व्यक्तिगत बीमा में देर न करें

यदि आप सोचते हैं कि व्यक्तिगत बीमा पॉलिसी रिटायर होने पर ही खरीद लेंगे तो मामला जोखिम भरा हो सकता है। दहिया समझाते हैं, ’58-60 साल की उम्र में आपको कुछ गंभीर बीमारियां हो सकती हैं, जिनकी वजह से कोई कंपनी आपको बीमा देने के लिए तैयार ही नहीं होगी।’ पॉलिसी दे दी तो उसमें बीमा राशि बहुत कम होगी या पहले से मौजूद बीमारी के लिए लंबी प्रतीक्षा अवधि होगी।

व्यक्तिगत पॉलिसी में बीमा राशि अच्छी खासी होनी चाहिए ताकि भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में चल रही 12-15 फीसदी सालाना की महंगाई से निपटा जा सके। दहिया की सलाह है, ‘अपनी हैसियत के मुताबिक अधिक से अधिक बीमा राशि वाली पॉलिसी लें। स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम रकम बढ़ने के साथ बहुत कम बढ़ते हैं।’

कासलीवाल की सलाह है कि कम से कम 10 लाख रुपये की बीमा राशि वाली स्वास्थ्य पॉलिसी खरीदनी चाहिए। इसके साथ ही वह सुपर टॉप-अप लेने की भी राय देते हैं।

बीमा में क्या हो जरूरी

कमरे के किराये की सीमा या खास बीमारियों के लिए सब-लिमिट लगाने वाली पॉलिसी नहीं खरीदें। दहिया का कहना है, ‘छोटे बच्चों वाले परिवार को ओपीडी कवर वाली पॉलिसी लेनी चाहिए। गंभीर बीमारी के इलाज के लिए विदेश जाने के इच्छुक धनाढ्य लोगों को ऐसी पॉलिसी लेनी चाहिए, जो दुनिया भर में मान्य हो।’कासलीवाल के हिसाब से ऐसी पॉलिसी चुनना सबसे जरूरी है, जिसके कैशलेस नेटवर्क में आपके आसपास के अस्पताल शामिल हों।

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First Published - July 30, 2023 | 11:15 PM IST

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