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टॉप-5 UPI ऐप में शामिल होने के लिए दौड़ रहा भीम, अगले 3 साल में 5% हिस्सेदारी का लक्ष्य

एनपीसीआई ने भीम ऐप को तैयार कर 2016 में पेश किया था ताकि वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया जा सके और भारत को डिजिटल तौर पर एक सशक्त समाज बनाया जा सके

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सुब्रत पांडा   
अजिंक्या कवाले   
मनोजित साहा   
Last Updated- March 17, 2026 | 10:42 PM IST

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के क्षेत्र में एकाधिकार के जोखिम को दूर करने के लिए नैशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के भुगतान ऐप भारत इंटरफेस फॉर मनी (भीम) को निजी खिलाड़ियों के बीच एक सरकारी विकल्प के तौर पर पेश किया जा रहा है। यूपीआई भुगतान के मामले में करीब 80 फीसदी बाजार हिस्सेदारी फिलहाल महज दो प्लेटफॉर्म के पास है।

सूत्रों ने बताया कि इसका उद्देश्य यूपीआई के क्षेत्र में भीम को शीर्ष 5 तीसरे पक्ष के ऐ​प्लिकेशन प्रदाता (टीपीएपी) में शामिल करना है। साथ ही अगले तीन वर्षों में भीम ऐप की बाजार हिस्सेदारी को करीब 5 फीसदी तक पहुंचाना है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, यूपीआई लेनदेन के मामले में भीम ऐप की बाजार हिस्सेदारी महज 0.86 फीसदी है।

इस मामले से अवगत एक सूत्र ने कहा, ‘हम उम्मीद करते हैं कि भीम न केवल बाजार हिस्सेदारी के मामले में बल्कि उपयो​गकर्ता अनुभव और तकनीकी क्षमता के मामले में भी बड़े खिलाड़ियों से मुकाबला करेगा।’ उन्होंने कहा कि इससे कुछ हद एका​धिकार के जोखिम से निपटने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा, ‘इससे यह भी सुनि​श्चित होगा कि इस क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प मौजूद रहे और वह अन्य फिनटेक कंपनियों की ही तरह या उनसे भी बेहतर हो।’

एक अन्य सूत्र ने बताया कि यूपीआई लेनदेन की संख्या के लिहाज से हाल के वर्षों में भीम ऐप को अ​धिक सफलता नहीं मिली, लेकिन अब वह रफ्तार पकड़ने लगा है। उम्मीद है कि अगले 3 वर्षों में उसकी बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 5 फीसदी तक पहुंच जाएगी। इससे यह निजी कंपनियों के बीच एक सरकारी विकल्प के तौर पर अपनी जगह बना लेगा।

एनपीसीआई ने भीम ऐप को तैयार कर 2016 में पेश किया था ताकि वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया जा सके और भारत को डिजिटल तौर पर एक सशक्त समाज बनाया जा सके। इस फरवरी में भीम ऐप के जरिये 21,263 करोड़ रुपये के कुल 17.6 करोड़ लेनदेन प्रॉसेस हुए। यह आंकड़ा फरवरी 2025 के मुकाबले करीब 5 गुना वृद्धि को दर्शाता है। फरवरी 2025 में भीम ऐप के जरिये 3.68 करोड़ से अ​धिक लेनदेन हुए थे।

एनपीसीआई ने अगस्त 2024 में भीम ऐप को अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक इकाई के तौर पर शामिल किया और उसे एक एनपीसीआई-भीम सर्विसेज लिमिटेड (एनबीएसएल) के रूप में अलग कर दिया। पूर्व बैंकर ललिता नटराज को मुख्य कार्या​धिकारी (सीईओ) के रूप में इस नई सहायक इकाई का प्रमुख बनाया गया। नटराज इससे पहले आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और आईसीआईसीआई बैंक के साथ काम कर चुकी हैं।

एनपीसीआई ने एक बयान में कहा, ‘इसका मकसद लेनदेन की बढ़ती मांग और बाजार की बदलती उम्मीदों को पूरा करना है। नवाचार और ग्राहकों की पसंद में तेजी से हो रहे बदलाव के साथ इसे आगे बढ़ाना भी है। इसका मकसद वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना है।’

एनबीएसएल को एक अलग सहायक इकाई बनाने की पहल ऐसे समय में की गई है जब एनपीसीआई भारत के यूपीआई बाजार में महज दो कंपनियों के वर्चस्व की चुनौती से निपट रहा है। भीम के जरिये लेनदेने की तादाद ऐसे समय में बढ़ी है जब कंपनी ग्राहकों को जोड़ने की पुरजोर को​शिश रही है। इसी क्रम में वह ग्राहकों को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन और कैशबैक जैसे उपायों का इस्तेमाल कर रही है।

पिछले साल मार्च में भीम ऐप में एक बड़ा बदलाव किया गया था ताकि उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर किया जा सके, कम नेटवर्क वाले इलाकों में भी उसके जरिये लेनदेन हो सके और उपयोगकर्ताओं को यूपीआई की नई सुविधाएं भी मिल सकें।

भीम की वृद्धि योजनाओं से अवगत एक सूत्र ने कहा, ‘फिलहाल भीम किसी खास आंकड़े के पीछे नहीं भाग रहा है। मगर यह जरूरी कि भीम लगातार आगे बढ़ता रहे। इसलिए भीम ऐप लगातार निवेश कर रहा है। ऐसे में उसे कुछ बाजार हिस्सेदारी भी मिलेगी। मगर वह वृद्धि सार्थक होनी चाहिए।’

ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि फरवरी 2026 में यूपीआई बाजार में फोनपे और गूगल पे की कुल बाजार हिस्सेदारी घटकर 78.8 फीसदी रह गई जो फरवरी 2025 में 83.8 फीसदी थी। फोनपे और गूगल पे की बाजार हिस्सेदारी 30 फीसदी की उस उच्चतम सीमा से काफी अ​धिक है जिसको एनपीसीआई ने लक्ष्य बनाया है। वहां तक पहुंचने के लिए 31 दिसंबर, 2026 की समय-सीमा निर्धारित की गई है। एनपीसीआई ने दिसंबर 2024 में बाजार हिस्सेदारी की सीमा लागू करने के लिए निर्धारित समय-सीमा को दो साल के लिए बढ़ा दिया था।

यह प्रस्ताव सबसे पहले नवंबर 2020 में दिया गया था। इसमें कहा गया था कि डिजिटल भुगतान कंपनियों को यूपीआई के जरिये होने वाले लेनदेन की कुल संख्या में 30 फीसदी से अ​धिक हिस्सेदारी रखने की अनुमति नहीं होगी। इसका मकसद यूपीआई लेनदेन में
एका​धिकार की समस्या को रोकना और डिजिटल भुगतान फर्मों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना था।

एक अन्य सूत्र ने कहा, ‘भीम अकेले बाजार में एका​धिकार की समस्या का समाधान नहीं कर सकता है। मगर विचार यह है कि यदि सरकार तीन साल में यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू कर देती है तो बाजार में प्रतिस्पर्धा अपने आप बढ़ने लगेगी। फिलहाल प्रोत्साहन कम होने के कारण कंपनियां इस क्षेत्र में अ​धिक निवेश नहीं कर रही हैं।’

बहरहाल यूपीआई लेनदेन के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक और एनपीसीआई फिलहाल पर्सन-टु-मर्चेंट (पी2एम) लेनदेन के लिए शून्य एमडीआर नीति बनाए हुए हैं। सरकार ने जनवरी 2020 में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और व्यापारियों एवं ग्राहकों के बीच यूपीआई की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए शून्य एमडीआर व्यवस्था शुरू की थी। भुगतान कंपनियों और बैंकों ने बार-बार कहा है कि शून्य एमडीआर के लिए उन्हें बिना किसी लेनदेन शुल्क के बुनियादी ढांचे और परिचालन खर्च उठाने पड़ते हैं। ऐसे में यह व्यवस्था टिकाऊ नहीं है।

First Published : March 17, 2026 | 10:26 PM IST