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बिजली बिल में बड़ा बदलाव संभव! फिक्स्ड चार्ज बढ़ाने की तैयारी में सरकार

केंद्र सरकार बिजली के फिक्स्ड चार्ज और टैरिफ ढांचे में बदलाव की तैयारी कर रही है, जिससे उपभोक्ताओं के बिल पर असर पड़ सकता है।

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सुधीर पाल सिंह   
Last Updated- May 18, 2026 | 7:22 AM IST

केंद्रीय बिजली मंत्रालय बिजली की दरों में नियत शुल्कों (फिक्स्ड चार्ज) को युक्तिसंगत बनाने के लिए राष्ट्रीय फ्रेमवर्क बनाने और बिजली वितरण इकाइयों द्वारा नियत लागत की वसूली को सुगम बनाने के लिए बिजली की खुदरा दरों को नए सिरे से तैयार करने पर काम कर रहा है।

मंत्रालय के तहत काम कर रहे केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन (एआईडीए) और वितरण कंपनियों के साथ इस विचार पर पहले ही चर्चा कर ली है। फोरम ऑफ रेगुलेटर्स की टिप्पणी के लिए विस्तृत सिफारिशें साझा की जा रही हैं। डिस्कॉम द्वारा वहन की जा रही नियत लागत और संबंधित राज्य विद्युत नियामक के अनुमोदन के आधार पर उपभोक्ताओं से वसूल किए जा रहे नियत शुल्कों के बीच अंतर को खत्म करने के मकसद से यह बदलाव किया जा रहा है।

नियत लागत में ताप बिजली उत्पादक को भुगतान और पारेषण लागत शामिल है। यह बिजली वितरण कंपनी (डिस्कॉम) की कुल सालाना राजस्व जरूरत (एएआर) के 56 प्रतिशत तक होती है। वहीं इस समय नियत शुल्क इस समय उनके कुल राजस्व का महज 9 प्रतिशत है।

एआईडीए ने अपनी रिपोर्ट में मंत्रालय से कहा है, ‘यह अंतर लागत और टैरिफ की वसूली की व्यवस्था के बीच बुनियादी दिक्कत को उजागर करता है। यह एक समस्या है, क्योंकि नियत लागत की वसूली के लिए बिजली की कीमत पर निर्भर रहने से डिस्कॉम के लिए मात्रा संबंधी जोखिम और फंसी लागत की स्थिति पैदा होती है।’ बिजली की खपत की परवाह किए बगैर बिजली वितरण कंपनियां नियत क्षमता शुल्क का भुगतान करती हैं। इसकी रिकवरी अलग अलग दरों से बिजली की बिक्री से करती हैं। इसकी वजह से कम मांग की अवधि जैसे जैसे जाड़ा और गर्मी या आर्थिक सुस्ती के दौरान नकदी का संकट पैदा हो जाता है।

इसी तरह से जब उच्च भुगतान करने वाले औद्योगिक या आवासीय ग्राहक कैप्टिव पॉवर या ओपन एक्सेस का विकल्प अपना लेते हैं तो डिस्कॉम से कम बिजली लेते हैं, लेकिन ग्रिट पर निर्भर बने रहते हैं। ऐसे डिस्कॉम की बुनियादी ढांचे की लागत फंसी हुई रह जाती है।

इसके अलावा बिजली के शुल्क में नियत लागतों को छिपाने से लागत-सेवा मूल्य निर्धारण रुक जाता है, जिससे ज्यादा उपभोग वाले ग्राहकों को उन उपभोक्ताओं के बुनियादी ढांचे की लागतों पर भारी सब्सिडी मिलती है, जिनकी अनुबंध मांग अधिक है लेकिन वास्तविक उपयोग कम है।

इस चर्चा का मकसद नियत शुल्क में तेज बढ़ोतरी की समस्या का समाधान करना भी है, जिसके कई अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं। विशेष रूप से कम लोड फैक्टर वाले औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए उच्च नियत शुल्क से उनका बिजली का कुल बिल बढ़ सकता है और प्रतिस्पर्धा की क्षमता कम हो सकती है।

घरेलू उपभोक्ताओं के मामले में नियत शुल्कों में वृद्धि उन छोटे, कम आय वाले और ग्रामीण परिवारों को प्रभावित कर सकती है, जो कम बिजली का उपयोग करते हैं लेकिन उनका बिजली का बिल अधिक आएगा।

समस्या के समाधान के लिए डिस्काम ने अगले पांच वर्षों (2030 तक) में घरेलू और कृषि श्रेणियों के लिए 25 प्रतिशत और उद्योग, वाणिज्यिक और संस्थागत श्रेणियों के लिए 100 प्रतिशत नियत लागत वसूली का लक्ष्य रखा है।

First Published : May 18, 2026 | 7:22 AM IST