इन दिनों भारत को लेकर एक धांसू बात यह कही जा रही है कि यहां के शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। इस सिद्धांत के अनुसार अगर श्रेष्ठ प्रतिभाओं से लैस अरबों डॉलर के वैश्विक फंड भारत की आर्थिक संभावनाओं पर दांव लगाएं तो अगले दो दशकों में डॉलर में अपना निवेश आठ गुना तक बढ़ा सकते हैं।
इस सिद्धांत के अनुसार निरंतर संरचनात्मक सुधारों, बेहतर श्रम उत्पादकता, महिला श्रम-बल की उच्च भागीदारी, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से औपचारिक अर्थव्यवस्था की तरफ तेजी से बढ़ते कदमों और ऋण की व्यापक पहुंच के दम पर भारत उच्च वृद्धि दर, कम मुद्रास्फीति और न्यूनतम मुद्रा अवमूल्यन के एक दीर्घकालिक दौर में प्रवेश करेगा।
विदेशी निवेशक इस ‘स्वर्ण युग’ का लाभ नहीं उठाकर स्वयं का ही नुकसान करेंगे। यह प्रस्ताव दो बड़ी मान्यताओं पर आधारित है। पहली बात, भारत दशकों तक 8 फीसदी की सालाना आर्थिक वृद्धि के साथ आगे बढ़ सकता है। दूसरी मान्यता यह है कि मुद्रास्फीति इतनी कम रहेगी कि रुपये में बहुत अधिक गिरावट नहीं आएगी।
सैद्धांतिक रूप से कोई भी अर्थव्यवस्था कुछ वर्षों तक 8 फीसदी की दर से आगे बढ़ सकती है मगर दशकों तक यह रफ्तार बनाए रखना मुश्किल है। इसके लिए नीतिगत निरंतरता, निरंतर क्रियान्वयन और गलतियां होने पर सुधार करने की क्षमता बेहद आवश्यक है। भारत कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है। सबसे तात्कालिक चुनौती निजी पूंजीगत व्यय में कमजोरी है।
वर्ष 2008 में आए वैश्विक वित्तीय संकट से पूर्व की तेज आर्थिक वृद्धि के दौरान देश की निवेश दर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 38 फीसदी तक बढ़ गई थी जिससे कई वर्षों तक तीव्र आर्थिक वृद्धि दर्ज करने में मदद मिली थी। मगर तब से यह घटकर 30 फीसदी के आसपास आ गई है। अवसंरचना पर सार्वजनिक व्यय में तेज वृद्धि हुई है मगर केवल सरकारी निवेश ही व्यापक निजी निवेश चक्र को आगे नहीं बढ़ा सकता। कई कंपनियां असमान मांग और अनिश्चित वैश्विक वातावरण को लेकर सतर्क बनी हुई हैं।
दूसरी बात यह है कि भारत के कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कृषि से जुड़ा हुआ है जो राष्ट्रीय उत्पादन में बहुत कम योगदान देता है। ऐतिहासिक रूप से विनिर्माण क्षेत्र तीव्र विकास के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त श्रम बल को रोजगार प्रदान करता है। दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों ने लाखों श्रमिकों को कारखानों और निर्यात उद्योगों में स्थानांतरित कर 8 फीसदी से अधिक की निरंतर वृद्धि दर हासिल की।
इसके विपरीत भारत का विस्तार मुख्य रूप से सेवाओं पर निर्भर रहा है जो कार्यबल के एक छोटे हिस्से को रोजगार प्रदान करती हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि अर्थव्यवस्था सम्मानजनक रूप से आगे बढ़ती है मगर पर्याप्त औपचारिक, उच्च-उत्पादकता वाली नौकरियां सृजित नहीं करती है।
शैक्षणिक स्तर पर सुधार जरूर हुआ है मगर स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल एवं उद्योग की आवश्यकताओं के बीच तालमेल में असमानता बनी हुई है। वहीं, महत्त्वाकांक्षी सुधार लागू करने में सक्षम रहने के बावजूद अक्सर क्रियान्वयन की धीमी प्रक्रिया एक चुनौती साबित हुई है। विनियामक जटिलता, अनुबंधों का अनियमित क्रियान्वयन और राज्यों में प्रशासनिक विखंडन परियोजनाओं में देरी कर सकते हैं और निवेशकों को हतोत्साहित कर सकते हैं।
देश को एक एकल बाजार में जोड़ने के उद्देश्य से लागू माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के बाद भी व्यवसाय अनुपालन संबंधी बोझ और अफसरशाही की जटिलताओं से जूझ रहे हैं। हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है खास तौर पर सड़कों, हवाई अड्डों और डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में। फिर भी रसद, शहरी नियोजन और बिजली वितरण जैसे क्षेत्रों में बाधाएं बनी हुई हैं। ये क्षेत्र अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।
भारत में शहरीकरण की गुणवत्ता भी इसकी आय के स्तर के हिसाब से अपेक्षाकृत कम है जिससे घनी आबादी वाले शहरों से मिलने वाले उत्पादकता लाभ सीमित हो जाते हैं। वित्तीय बाजार एक और बाधा हैं। हालांकि, बैंकिंग प्रणाली एक दशक पहले की तुलना में अधिक मजबूत है फिर भी दीर्घकालिक परियोजना वित्त तक पहुंच सीमित है और कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार अभी भी कमजोर ही है। अंतिम बात, पहले भारत की वृद्धि दर वैश्विक व्यापार और पूंजी प्रवाह में तेजी के दौर के साथ मेल खाती थी।
आज दुनिया में व्यापार की वृद्धि धीमी है और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं जिससे निर्यात आधारित विनिर्माण को बढ़ावा देने के प्रयास जटिल हो रहे हैं। इस देखते हुए देश की विकास गाथा अब घरेलू सुधारों और निवेश पर अधिक निर्भर है। कृषि से श्रमबल बाहर निकालने, मानव पूंजी मजबूत करने और निजी निवेश को तेजी से बढ़ावा दिए बिना 8 फीसदी की वृद्धि दर बनाए रखना एक सपना बनकर रह जाएगा।
‘स्वर्णयुग’ सिद्धांत का दूसरा स्तंभ यह है कि कम मुद्रास्फीति रुपये को डॉलर के मुकाबले उल्लेखनीय रूप से गिरने से बचाएगी। वर्ष 2000 से 2024 की अवधि में डॉलर के मुकाबले रुपये के सालाना अवमूल्यन और वार्षिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति दर के बीच संबंध के विश्लेषण से लगभग 0.31 के पियर्सन सह-संबंध गुणांक के साथ एक कमजोर से मध्यम सकारात्मक रैखिक सह-संबंध का पता चलता है।
रुपये के अवमूल्यन में होने वाले बदलाव का केवल 9-10 फीसदी ही मुद्रास्फीति द्वारा रैखिक रूप से समझाया जा सकता है। अन्य प्रमुख कारकों में वैश्विक वस्तु मूल्य (विशेष रूप से तेल आयात), पूंजी प्रवाह और विदेशी निवेश के रुझान, व्यापार असंतुलन, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के बीच मौद्रिक नीति में अंतर, अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई का सक्रिय मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और भू-राजनीतिक घटनाओं या वैश्विक जोखिम से बचाव जैसे बाहरी झटके शामिल हैं।
उदाहरण के लिए गिरावट के दौरान घरेलू मुद्रास्फीति के रुझानों की तुलना में अक्सर पूंजी की बाहर निकासी या तेल की कीमतों में उछाल जैसी बातें दिखती हैं जबकि रुपये में मजबूती मजबूत अंतर्प्रवाह और यहां तक कि मध्यम मुद्रास्फीति के दौरान भी देखी गई है। आसान समृद्धि की परिकल्पना यानी 8 फीसदी वृद्धि, कम मुद्रास्फीति और रुपये में लगातार मजबूती यह सब सुनने में तो अच्छा लगता है मगर निवेश के दृष्टिकोण से यह तर्क काफी साधारण लगता है।
विदेशी निवेशक, जिनका वास्तविक धन दांव पर लगा है और जिन्होंने पिछले 14 महीनों में लगभग 20 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयर बेचे हैं, वे जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। वे निश्चित रूप से तब लौटेंगे जब स्थिति सुधरेगी न कि इसलिए कि कुछ अर्थशास्त्रियों ने ‘स्वर्ण युग’ की घोषणा कर दी है।
(लेखक मनीलाइफ डॉट कॉम के सह-संस्थापक एवं मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)