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भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने दिल्ली के निजी अस्पतालों की एक बहुप्रतीक्षित जांच में अपनी जांच इकाई के निष्कर्षों को पूरी तरह से स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। आयोग ने कहा है कि सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल केवल इसलिए अलग एकाधिकार वाले ‘आफ्टरमार्केट’ की श्रेणी में नहीं आ जाते क्योंकि वहां भर्ती मरीज दवा, जांच तथा अन्य उपचार सामग्री उन अस्पतालों से ही लेते हैं।
मगर आयोग ने यह स्वीकार भी किया कि अस्पताल मरीजों को एक तरह से बांध लेते हैं, जहां भर्ती मरीज दवाओं, जांच तथा अन्य सुविधाओं के लिए अस्पताल पर ही निर्भर हो जाते हैं।
दिल्ली के प्रमुख अस्पतालों मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल-पटपड़गंज, मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल-साकेत, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल-शालीमार बाग, बीएलके मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, मैक्स मल्टी स्पेशियलिटी सेंटर-पंचशील पार्क, मैक्स मल्टी स्पेशियलिटी सेंटर-पीतमपुरा, फोर्टिस हॉस्पिटल-वसंत कुंज, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट ऐंड रिसर्च सेंटर, इंद्रप्रस्थ मेडिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल), सर गंगा राम हॉस्पिटल, बत्रा हॉस्पिटल ऐंड मेडिकल रिसर्च सेंटर और सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल से संबंधित 12 आदेशों की एक श्रृंखला में आयोग ने यह जांच की कि क्या भर्ती मरीजों को इस तरह से बंधक उपभोक्ता बनाया गया था, जिससे दवाओं, उपभोग योग्य सामग्रियों, परीक्षणों और कमरे के किराये के लिए अत्यधिक मूल्य चुकाना पड़ा हो।
सीसीआई के आदेश पर प्रतिक्रिया के लिए अस्पतालों को भेजे गए ईमेल का जवाब नहीं मिला। बत्रा हॉस्पिटल और सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल से तत्काल टिप्पणी के लिए संपर्क नहीं किया जा सका। यह मामला वर्ष 2015 में दायर एक शिकायत के बाद सामने आया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सिरिंज निर्माता बेक्टन डिकिंसन और मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज ने अस्पताल की इन-हाउस फार्मेसी के माध्यम से ऊंची एमआरपी वाली सिरिंज बेचने के लिए मिलीभगत की थी।
हालांकि आयोग ने बाद में माना कि कोई कार्टेल व्यवस्था साबित नहीं हुई लेकिन बाद में जांच का दायरा बढ़ा दिया गया कि क्या दिल्ली के प्रमुख अस्पतालों ने इन-हाउस सुविधाओं के माध्यम से भर्ती मरीजों से दवाओं, उपभोग योग्य सामना, नैदानिक परीक्षणों और कमरे के किराए के लिए ज्यादा कीमत वसूली गई और अपने दबदबे का दुरुपयोग किया गया। महानिदेशक (डीजी), जो सीसीआई की जांच शाखा है, ने तर्क दिया कि भर्ती मरीजों के लिए अस्पताल एक तरह से अलग ‘आफ्टरमार्केट’ बन जाते हैं क्योंकि भर्ती मरीजों को वहीं की फार्मेसी, लैब और उपभोग योग्य वस्तुओं के लिए मजबूर होना पड़ता है।