म्युचुअल फंड उद्योग में प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ योजनाओं के प्रदर्शन, लागत ढांचे और वितरण तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इससे भी आगे चली गई है। हाल के महीनों में कई फंड हाउस ने निवेश निकासी (रिडम्पशन) पर लगने वाले एग्जिट लोड को तर्कसंगत बनाया है, जो इस बात का संकेत है कि वे निवेशकों को आकर्षित करने और उन्हें अपने साथ जोड़े रखने के तरीके में बदलाव ला रहे हैं।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एमएफ ने अप्रैल में अपनी 5 ऐक्टिव इक्विटी योजनाओं के लिए एग्जिट लोड की अवधि को एक साल से घटाकर एक महीना कर दिया। व्हाइटओक कैपिटल एमएफ ने भी हाल में अपनी सभी इक्विटी और हाइब्रिड योजनाओं से एग्जिट लोड हटा दिए हैं। टाटा और एसबीआई फंड ने अगस्त-सितंबर 2025 में अपनी ज्यादातर इक्विटी और हाइब्रिड योजनाओं के लिए इसी तरह की कटौतियों की घोषणा की थी। हाल के महीनों में कई अन्य फंडों हाउसों कुछ विशिष्ट योजनाओं, खासतौर पर आर्बिट्राज फंडों के लिए एग्जिट लोड को तर्कसंगत बनाया है।
एग्जिट लोड किसी निवेश पर वह शुल्क होता है, जब निवेशक किसी फंड योजना से तय निवेशित अवधि से पहले पैसे निकालते हैं या आंशिक निकासी करते हैं। यह शुल्क निकाली गई रकम पर लगता है और योजना चुनते समय निवेशकों के लिए अहम कारक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार इन बदलावों की वजह सिर्फ बढ़ती प्रतिस्पर्धा ही नहीं बल्कि निवेशकों के बेहतर होता व्यवहार भी है।
क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक पीयूष गुप्ता ने कहा, एग्जिट लोड अब उतने अहम नहीं रह गए हैं क्योंकि लोग अब निवेश को होल्ड करने के मामले में ज्यादा अनुशासन दिखा रहे हैं और लंबी अवधि के निवेश पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। साथ ही, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और लागत कम करने की लगातार कोशिशों की वजह से फंडों ने अपने शुल्क ढांचे को आसान बनाया है, जिससे एग्जिट लोड में कमी आई है या वह हट गया है।
जानकारों का कहना है कि कम एग्जिट लोड से ऐक्टिव योजनाओं को पैसिव फंडों के साथ ज्यादा असरदार तरीके से मुकाबला करने में भी मदद मिलेगी, जिनमें आम तौर पर कोई एग्जिट शुल्क नहीं होता।
प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के संस्थापक और सीईओ विशाल धवन ने कहा, इसका एक कारण यह है कि अगर निवेशक जल्दी बाहर निकलना चाहें तो उन्हें निकासी में अधिक लचीलापन मिलता है। खासकर इसलिए कि बहुत से निवेशक पैसिव फंडों के साथ-साथ ऐक्टिव फंडों पर भी नजर रखते हैं और पैसिव फंडों में आम तौर पर एग्जिट लोड और समय-सीमा कम होती है, जिससे ऐक्टिव फंडों कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
आमतौर पर एक साल के भीतर निवेश निकासी पर करीब 1 फीसदी एग्जिट लोड रहा है। लेकिन कई फंड हाउसों मसलन यूनियन म्युचुअल फंड, आईटीआई म्युचुअल फंड, पीजीआईएम इंडिया म्युचुअल फंड, नवी म्युचुअल फंड, क्वांट म्युचुअल फंड और जियो ब्लैकरॉक ऐसेट मैनेजमेंट आदि ने अपनी ज्यादातर इक्विटी और हाइब्रिड योजनाओं में शुरुआत से ही या कई सालों से बहुत कम या बिल्कुल भी एग्जिट लोड नहीं रखा है।
हाल के बदलावों के कारण अब अलग-अलग फंडों में एग्जिट लोड के ढांचे में काफी अंतर देखने को मिल रहा है। उदाहरण के लिए, फ्लेक्सी कैप फंडों में एक साल के अंदर रिडम्पशन करने पर एग्जिट लोड शून्य से लेकर 2 फीसदी तक हो सकता है। पराग पारिख फ्लेक्सी कैप फंड का एग्जिट लोड अभी भी ज्यादा है। फंड हाउस के सीईओ नील पारिख ने कहा कि निवेश में अनुशासन बनाए रखने के लिए एग्जिट लोड को ऊंचे स्तर पर रखा जाएगा।
उन्होंने कहा, यह एक ऐसा इनबिल्ट व्यावहारिक टूल है, जो निवेश के लिए अनुशासित सोच में मदद करता है। जब हमने शुरुआत की थी, तब हमारा कोई एग्जिट लोड नहीं था। हमने देखा कि योजना में बार-बार खरीद-बिक्री हो रही थी, जिससे असली लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए लागत बढ़ गई थी (जैसे कि चर्निंग/ब्रोकरेज वगैरह के रूप में)। जब हमने एग्जिट लोड लागू किया तो निवेशकों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला।
जिन फंड हाउस में एग्जिट लोड कम या बिल्कुल नहीं होता, उनके अनुसार कर का ढांचा ही शॉर्ट-टर्म निवेश को रोकने के लिए काफी है। व्हाइटओक कैपिटल एमएफ के सीईओ आशिष सोमैया ने कहा, पिछले कुछ सालों में शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म पूंजीगत लाभ कर में जो बदलाव हुए हैं, वे बार-बार खरीद-बेच रोकने के लिए काफी हैं। इसलिए, हमें निवेश लागत को और बढ़ाने के लिए एग्जिट लोड लगाने का कोई कारण नजर नहीं आता। ऐसे में अब एग्जिट लोड की कोई खास जरूरत नहीं रह गई है।