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पुनर्बीमा कंपनियों के बीच होड़ बढ़ने और पिछले कुछ वर्षों में दावे कम रहने के कारण फसल बीमा कारोबार में अच्छा मुनाफा हुआ है। ऐसे में बीमा कंपनियां फसल बीमा के नवीनीकरण में पुनर्बीमा कंपनियों से मोटा कमीशन मांग रही हैं।
उद्योग अधिकारियों ने बताया कि बीमा कंपनियां इस बार प्रीमियम का 5 से 8 प्रतिशत तक कमीशन मांग रही हैं, जबकि पिछले नवीनीकरण के समय कमीशन 3 से 5 प्रतिशत के बीच ही था। बढ़ा कमीशन मांगने की प्रमुख वजह देसी और विदेशी पुनर्बीमा कंपनियों के बीच होड़ बढ़ना और फसल बीमा क्षेत्र में ज्यादा मुनाफा होना है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में प्रीमियम की दरें भी लगातार घटती गई हैं।
पहले कई राज्यों ने तीन वर्ष के लिए फसल बीमा की निविदा जारी की थी। लेकिन इस बार अधिकतर राज्य एक साल के लिए ही निविदा लाए हैं। यह प्रक्रिया मई में शुरू हुई और जून के अंत या जुलाई की शुरुआत तक इसके पूरा होने की उम्मीद है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना कि यह देर केंद्र सरकार तीन वर्ष की नई योजना के कारण है, जिसे अभी तक पेश नहीं किया गया है। इसी कारण राज्यों को केवल एक वर्ष की निविदा लानी पड़ी है। एक पुनर्बीमा कंपनी से जुड़े अधिकारी ने कहा, ‘इस समय जोखिम की सबसे बड़ी वजह अल नीनो को माना जा रहा है।
बीमा कंपनियां ज्यादा कमीशन इसलिए मांग रही हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में फसल बीमा कारोबार लाभदायक रहा है और पुनर्बीमा कंपनियों के बीच मुकाबला बढ़ा है। पहले प्रीमियम के 3 से 5 प्रतिशत के बीच कमीशन था लेकिन अब बीमा कंपनियां 5 से 8 प्रतिशत तक कमीशन मांग रही हैं। बातचल रही है और अंतिम समझौते अभी नहीं हुए हैं। दबाव है मगर बाजार में अभी शांति बनी हुई है।’
एक अन्य पुनर्बीमा कंपनी के अधिकारी ने बताया, ‘पहले प्रीमियम के 0.5 प्रतिशत से 6 प्रतिशत तक कमीशन होता था। इस बार कारोबार में बेहतर मुनाफे के कारण बीमा कंपनियां 8 प्रतिशत तक कमीशन की मांग कर रही हैं।’
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसी किसान के लिए बीमा राशि यह देखकर तय की जाती है कि जिला स्तरीय तकनीकी समिति ने उसकी फसल के लिए प्रति हेक्टेयर कितना कर्ज निर्धारित किया है और राज्य स्तरीय समिति ने कितने की घोषणा की है। निर्धारित फसल के रकबे को प्रति हेक्टेयर कर्ज की राशि से गुणा करने पर कुल बीमा राशि तय की जाती है।
इस योजना के तहत किसानों को कम प्रीमियम देना पड़ता है। खरीफ के लिए बीमा राशि का 2 प्रतिशत, रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत और वाणिज्यिक तथा बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत तक प्रीमियम ही लिया जाता है।
पूर्वोत्तर तथा हिमालय राज्यों के अलावा बाकी राज्यों में प्रीमियम की शेष रकम केंद्र तथा राज्य सरकारें चुकाती हैं। किसानों को इसके अलावा कोई प्रीमियम नहीं चुकाना होता।