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Tamil Nadu Elections: मुफ्त लैपटॉप से लेकर ₹10,000 नकद तक, क्या वादों का बोझ सह पाएगी राज्य की तिजोरी?

तमिलनाडु चुनाव 2026 में राजनीतिक दलों ने वादों की झड़ी लगा दी है। हालांकि राज्य की विकास दर अच्छी है, लेकिन बढ़ता राजस्व घाटा वित्तीय अनुशासन के लिए चुनौती बन सकता है

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यश कुमार सिंघल   
Last Updated- April 20, 2026 | 11:13 PM IST

तमिलनाडु में 23 अप्रैल को विधान सभा चुनावों के मतदान की तैयारी चल रही है। राज्य में दो प्रमुख प्रतिस्पर्धियों- द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक)- के नेतृत्व वाले गठबंधनों के अलावा अभिनेता विजय अपनी तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) के साथ चुनावी मैदान में उतर चुके हैं।

राज्य में 234 सीटों पर होने वाले मुकाबले में मुख्य तौर पर महिलाओं और युवा मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इन मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सभी दल तमाम कल्याणकारी वादे कर रहे हैं। मगर सबसे अहम सवाल यह है कि क्या राज्य की वित्तीय स्थिति इन वादों को आसानी से झेल पालने में सक्षम है?

कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन का नेतृत्व करने वाले द्रमुक ने महिलाओं के लिए विस्तारित सहायता का प्रस्ताव दिया है जिसमें घरेलू अप्लायंसेज के लिए कूपन भी शामिल है। सत्तारूढ़ दल ने कॉलेज के छात्रों के लिए मुफ्त लैपटॉप और मासिक वजीफे का भी वादा किया है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ साझेदारी में अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने कर के दबाव और बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए प्रति परिवार 10,000 रुपये के एकमुश्त भुगतान का वादा किया है। इसके वादों में राशन कार्डधारकों के लिए मुफ्त रेफ्रिजरेटर और महिलाओं के लिए मासिक सहायता में वृद्धि शामिल है। टीवीके ने भी अपने चुनावी अभियान को महिलाओं और युवाओं पर केंद्रित कर दिया है। हालांकि आर्थिक प्रदर्शन कुछ राहत का संकेत देता है।

तमिलनाडु वित्त वर्ष 2020 से वित्त वर्ष 2025 के बीच सबसे तेजी से बढ़ने वाला दूसरा राज्य रहा है। इस दौरान उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में 39.26 फीसदी की वृद्धि हुई। प्रति व्यक्ति आय के मोर्चे पर वह राष्ट्रीय औसत से आगे निकल चुका है। राज्य में प्रति व्यक्ति आय वित्त वर्ष 2017 में राष्ट्रीय स्तर औसत के मुकाबले 149.31 फीसदी थी जो बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 176.12 फीसदी हो गई।

पिछले एक दशक के दौरान वित्तीय रुझान मोटे तौर पर स्थिर रहे हैं। राज्य का अपना कर राजस्व आम तौर पर जीएसडीपी का 6 फीसदी से अधिक रहा है। मगर हालिया अंतरिम बजट में वित्त वर्ष 2027 के लिए यह 5.64 फीसदी तक गिरकर 10 साल के निचले स्तर पर जाने का अनुमान है। पूंजीगत व्यय महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2021 में जीएसडीपी का 1.85 फीसदी तक बढ़ गया था। मगर यह वित्त वर्ष 2027 में 1.47 फीसदी रहने का अनुमान है। इसके बावजूद डीएमके के शासन काल में वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2027 के दौरान औसत पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 17 से वित्त वर्ष 2021 के बीच एआईएडीएमके के कार्यकाल के मुकाबले थोड़ा अधिक है।

राजकोषीय घाटा नियंत्रण भी में रहा है जो वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2026 तक जीएसडीपी के 3.5 फीसदी से नीचे रहा। मगर यह पिछली सरकार के कार्यकाल में कोविड पूर्व स्तरों से थोड़ा ऊपर है। वित्त वर्ष 2027 में इसे 3 फीसदी रहने का अनुमान है। राजस्व के मोर्चे पर दबाव बिल्कुल स्पष्ट तौर पर दिख रहा है। वित्त वर्ष 2026 में राजस्व घाटा बढ़कर जीएसडीपी का 1.94 फीसदी हो गया जो इससे पिछले वर्ष 1.47 फीसदी था। महामारी अवधि को छोड़ दिया जाए तो राजस्व घाटा अन्नाद्रमुक के कार्यकाल के मुकाबले डीएमके के कार्यकाल में अधिक रहा है।

बकाया देनदारी वित्त वर्ष 2022 से धीरे-धीरे कम हुई है जो वित्त वर्ष 2025 और वित्त वर्ष 2026 में जीएसडीपी के लगभग 27 फीसदी पर स्थिर हो चुकी है।

सामाजिक संकेतकों के मामले में तमिलनाडु बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल है। साल 2019 से 2021 के दौरान राज्य में बहुआयामी गरीबी 2.2 फीसदी थी जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा लगभग 15 फीसदी का था। महिलाओं और युवाओं में बेरोजगारी पिछले दशक में कम हुई है लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से थोड़ी ऊपर है।

बहरहाल राज्य की वित्तीय स्थिति फिलहाल अधिक दबाव में नहीं है, लेकिन यदि पार्टियां कल्याणकारी वादों के मामले में आपसी प्रतिस्पर्धा करती हैं तो वित्तीय अनुशासन को बनाए रखना महत्त्वपूर्ण होगा।

First Published : April 20, 2026 | 10:33 PM IST