Ashok Lahiri, vice-chairman of NITI Aayog (File Photo)
नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी ने बुधवार को कहा कि यदि भारत कृषि क्षेत्र की ढांचागत चुनौतियों को हल करना चाहता है तो उसे मध्यम से दीर्घावधि में कृषि के अधिशेष श्रम को उद्योग, सेवाओं और अन्य उत्पादक क्षेत्रों में स्थानांतरित करने, किसानों के लिए कुशल बाजार बनाने और जिंस से जुड़ी सब्सिडी को धीरे-धीरे प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण में बदलने पर अनिवार्य रूप से ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
लाहिड़ी ने इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) के नामचीन कृषि अर्थशास्त्री व प्रोफेसर अशोक गुलाटी, इक्रियर के फेलो राया दास और एनएसई के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. तीर्थंकर पटनायक की पुस्तक ‘गेटिंग एग्रीकल्चर मार्केट्स राइट’ की पुस्तक के लोकार्पण पर कहा, ‘कृषि और संबद्ध क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग छठा हिस्सा योगदान करते हैं जबकि लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर है। यदि आधी आबादी छठे हिस्से की जीडीपी पर निर्भर है तो संकट अपरिहार्य है। मध्यम से लंबी अवधि का समाधान कृषि से अधिशेष श्रम को निकालकर उद्योग, सेवाओं और अन्य उत्पादक क्षेत्रों में स्थानांतरित करना है।’
लाहिड़ी ने सब्सिडी पर निरंतर निर्भरता पर भी सवाल उठाया और प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के पक्ष में तर्क दिया। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह कहने से आसान है।
लाहिड़ी ने कहा ‘ज्यादातर अर्थशास्त्री इस बात से सहमत होंगे कि सब्सिडी की तुलना में हस्तांतरण बेहतर तंत्र है। हालांकि, हस्तांतरण राजनीतिक चुनौती पेश करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को हर महीने 35 किलोग्राम चावल मिलता है और चावल की कीमतें बढ़ती हैं तो उस सहायता का मूल्य अपने से बढ़ जाता है। लेकिन यदि सहायता नकद में दी जाती है तो लाभार्थियों को चिंता हो सकती है कि सरकार कीमतों में वृद्धि होने पर हस्तांतरण राशि नहीं बढ़ाएगी। इसलिए, सब्सिडी से हस्तांतरण में बदलाव कहना आसान है, करना कठिन है।’
लाहिड़ी ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की सहायता के बिना विकसित होने वाले मुर्गी पालन, मछली पालन और डेरी जैसे क्षेत्रों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा, ‘इसका उत्कृष्ट उदाहरण भारत की श्वेत क्रांति है। आज भी कई अन्य खाद्य वस्तुओं की तुलना में चिकन की कीमतें लंबे समय तक उल्लेखनीय रूप से स्थिर रही हैं। इससे महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है : क्या सरकारी समर्थन आवश्यक है? मेरा उत्तर है कि कुछ हस्तक्षेप निश्चित रूप से आवश्यक है लेकिन हमें इसके रूप पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए ।’ उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के विकृतिपूर्ण प्रभावों पर भी चिंता जताई।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने पुस्तक के निष्कर्षों का हवाला देते हुए कहा कि 10 प्रतिशत से कम किसान और कृषि उत्पादन के सकल मूल्य के 10 प्रतिशत से कम को न्यूनतम समर्थन मूल्य से सीधे लाभ मिलता है। इसके बावजूद यह नीति देश के बड़े हिस्सों में फसल योजनाओं को प्रभावित करती रहती है।
उन्होंने कहा कि खरीद काफी हद तक गेहूं और चावल पर केंद्रित है और इसकी कुल खरीदारी मूल्य में 78 प्रतिशत हिस्सेदारी है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में खरीददारी के विस्तार ने पानी-गहन अनाजों की खेती को प्रोत्साहित किया है जबकि दालों और तिलहन की ओर विविधीकरण को हतोत्साहित किया है।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने यह भी तर्क दिया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली खाद्य पदार्थों की कमी के युग में तैयार की गई थी, जब भारत आयात पर निर्भर था और अनाज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए मजबूत प्रोत्साहन की आवश्यकता थी। हालांकि, देश तब से कमी से अधिशेष की ओर बढ़ गया है। इससे वर्तमान प्रणाली की वित्तीय और पर्यावरणीय लागतों को उचित ठहराना तेजी से मुश्किल हो गया है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष और कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस. महेंद्र देव ने तर्क दिया कि यदि भारत स्थायी रूप से किसानों की आय बढ़ाना चाहता है तो उसे कृषि नीति के फोकस में बदलाव करने की आवश्यकता है। उसे उत्पादन-केंद्रित हस्तक्षेपों से हटकर कटाई के बाद के प्रबंधन, विपणन और कृषि-प्रसंस्करण की ओर स्थानांतरित करने की जरूरत है।
नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. रमेश चंद ने कहा कि समय के साथ भारत की कृषि नीति साक्ष्य-आधारित से राजनीतिक-अर्थव्यवस्था-आधारित, फिर लोकलुभावनवाद-आधारित और अंततः ऐसी स्थिति में आ गई है जहां चीजों का निर्णय केवल मनमाने ढंग से किया जाता था। सरकारी नीति को साक्ष्य-आधारित बनाने के लिए किसानों की मजबूत भागीदारी होनी चाहिए, जैसा कि कृषि कानूनों के आंदोलन के दौरान अनुभव किया गया था।