पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सचिव नीरज मित्तल ने गुरुवार को कहा कि भारत की कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) के आयात के लिए होर्मुज पर निर्भरता वैश्विक औसत से अधिक है। यह ऊर्जा के मजबूत बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बेहतर तैयारियों की जरूरतों को उजागर करती है।
मित्तल ने एक उद्योग कार्यक्रम में कहा, ‘पश्चिम एशिया या खाड़ी संकट ने दिखाया है कि जब चीजें उतनी खराब नहीं होतीं जितनी हो सकती हैं, तब हम राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के विकास की खातिर प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने की योजना बनाना भूल जाते हैं। दुनिया की ऊर्जा निर्भरता होर्मुज स्ट्रेट पर लगभग 20 प्रतिशत है, लेकिन हमारी तीनों – कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एलपीजी पर निर्भरता इससे अधिक है। हमारा लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते होता है। ’
भारत पश्चिम एशिया संकट के दौरान कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की तुलना में एलपीजी की कमी का अधिक सामना कर रहा है। इसका कारण यह है कि भारत रसोई गैस की आपूर्ति के लिए इस क्षेत्र पर अधिक आश्रित है। भारत ने पिछले एक दशक में अपने स्रोतों में विविधता लाने के लिए कदम उठाए हैं। कच्चे तेल का आयात अब 41 देशों से हो रहा है, जो पहले 27 था। हालांकि पहले एलएनजी की आपूर्ति छह देशों से होती थी जबकि अब 30 देशों से प्राप्त की जा रही है। इस क्रम में एलपीजी की सोर्सिंग भी 10 देशों से बढ़कर 15 देशों तक बढ़ा दी गई है।
मित्तल ने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत के प्राकृतिक गैस को अपनाने के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला और यह 2030 तक प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को 15 प्रतिशत तक बढ़ाने के सरकार के लक्ष्य के अनुरूप है।
उन्होंने कहा, ‘ऊर्जा सुरक्षा केवल पर्याप्त गैस या अणु होने के बारे में नहीं है, यह इस बारे में भी है कि क्या हम अपने पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते हैं। क्या हम इसे उचित लागत पर प्राप्त कर सकते हैं? क्या यह टिकाऊ होगी? क्या हमारे पास ऐसी स्थिति में खरीदने के लिए पर्याप्त स्रोत हैं? इस सवालों का सटीक जवाब प्राकृतिक गैस है।’
इस बीच उन्होंने कहा कि सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को विस्तार लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ग्राहक सेवा और बुनियादी ढांचे की गति में सुधार करने की जरूरत है। मित्तल ने संपीड़ित बायोगैस को पाइप प्राकृतिक गैस के साथ मिलाने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस पहल को पांच अलग-अलग सरकारी मंत्रालयों द्वारा संभाले जाने के बजाय एक एकल ढांचे के तहत समेकित करने की जरूरत है।