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जी-सेक में बढ़ा निवेशकों का रुझान, लेकिन ब्याज दर जोखिम से रहें सावधान

जिराफ के सह-संस्थापक सौरभ घोष कहते हैं, 'यील्ड बढ़ती है तो बॉन्ड की कीमत घटती है। ऐसे में वक्त से पहले बॉन्ड भुनाने वाले निवेशकों को मार्क टु मार्केट घाटा हो सकता है।'

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हिमाली पटेल   
Last Updated- April 13, 2026 | 8:53 AM IST

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, बढ़ती यील्ड, शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव और नवंबर 2021 में शुरू किए गए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के रिटेल डायरेक्ट प्लेटफॉर्म की जानकारी के कारण सरकारी प्रतिभूतियों में सुरक्षित निवेश के प्रति निवेशकों का रुझान बढ़ रहा है। इस प्लेटफॉर्म पर खरीद-फरोख्त की गतिविधियां एक साल पहले करीब 1,756.08 करोड़ रुपये की थीं जो बढ़कर 16 मार्च, 2026 तक करीब 8,211.91 करोड़ रुपये की हो चुकी हैं।

बढ़ती लोकप्रियता

ये प्रतिभूतियां आसानी से उपलब्ध होने के कारण लोकप्रिय हो गई हैं। मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज के प्रमुख (धन प्रबंधन- तय आय) हरित ओबेरॉय के मुताबिक आरबीआई रिटेल डायरेक्ट प्लेटफॉर्म से व्यक्तिगत निवेशकों के लिए उपलब्धता और पारदर्शिता काफी बढ़ी हैं।

सरकारी प्रतिभूतियों में क्रेडिट जोखिम बहुत कम होता है। स्टेबल मनी के सह-संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी सौरभ जैन कहते हैं, ‘इनमें निवेशकों को सरकारी गारंटी वाली सुरक्षा मिलती है, इसलिए डेट के लिहाज से ये सबसे भरोसेमंद हैं।’ इस समय यील्ड भी इसे आकर्षक बना रही है। 6 अक्टूबर 2035 को परिपक्व होने जा रहे 6.48जीएस 2035 बॉन्ड पर करीब 6.74 फीसदी यील्ड चल रही है, जबकि भारतीय स्टेट बैंक 10 वर्षीय सावधि जमा (एफडी) पर 6.05 फीसदी और एचडीएफसी बैंक 6.15 फीसदी ब्याज दे रहा है। जैन के हिसाब से इस यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियां पूंजी की सुरक्षा के साथ पर्याप्त आय दे रही हैं। इनमें हर छह महीने में कूपन यानी ब्याज भुगतान से नकदी भी आती रहती है।

ब्याज दर जोखिम से रहें सतर्क

मगर सरकारी प्रतिभूतियों में ब्याज दर का जोखिम बड़ी चिंता है। जिराफ के सह-संस्थापक सौरभ घोष कहते हैं, ‘यील्ड बढ़ती है तो बॉन्ड की कीमत घटती है। ऐसे में वक्त से पहले बॉन्ड भुनाने वाले निवेशकों को मार्क टु मार्केट घाटा हो सकता है।’

दोबारा निवेशक करने पर भी जोखिम रहता है। जैन समझाते हैं, ‘ब्याज दर घट रही हों तो प्रतिभूतियों से मिली रकम कम यील्ड पर दोबारा निवेश करनी पड़ सकती है।’ तरलता बढ़ी है मगर अलग-अलग अवधियों के लिए अलग-अलग है। जैन के अनुसार इससे कुछ खुदरा निवेशकों का फायदा कम हो सकता है।

सरकारी प्रतिभूतियों पर कर

कूपन आय पर निवेशक के आय स्लैब के मुताबिक कर वसूला जाता है। प्रतिभूति परिपक्व होने तक रखी जाए तो पूंजीगत लाभ नहीं माना जाता मगर प्रतिभूति 12 महीने रखने के बाद भुनाया जाए तो लाभ पर इंडेक्सेशन के बिना 12.5 फीसदी दर से दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर लगता है। 12 महीने के भीतर भुनाएं तो आयकर स्लैब के अनुसार कर लगता है।

कैसे चुनें सरकारी प्रतिभूति

परिपक्वता पर यील्ड बड़ा पैमाना है। मगर ब्याज दर और निवेश अवधि के जोखिम का हिसाब भी रखा जाना चाहिए। ग्रिप इन्वेस्ट के संस्थापक और समूह सीईओ निखिल अग्रवाल कहते हैं कि लंबी अवधि की प्रतिभूतियों में ब्याज दरों में कीमत पर ब्याज दरों का ज्यादा असर पड़ता है। नकदी की जरूरत भी जरूरी पैमाना है। इंडियाबॉन्ड्स डॉट कॉम के सह-संस्थापक विशाल गोयनका की राय है कि निवेशकों को भविष्य में नकदी की जरूरत के हिसाब से परिपक्वता चुननी चाहिए। कम अवधि की प्रतिभूतियां अल्पावधि जरूरतों के लिए बेहतर विकल्प हैं। घोष कहते हैं, ‘लंबी अवधि की सरकारी प्रतिभूतियां ब्याज दर जोखिम को समझने वाले और उतार-चढ़ाव में भी निवेश बनाए रखने वालों के लिए अच्छी हैं।’ लैडरिंग जोखिम को घटाती है। अग्रवाल कहते हैं कि थोड़ा-थोड़ा निवेश अलग-अलग अवधियों के लिए करने पर टुकड़ों में तरलता आती रहती है। अग्रवाल कहते हैं, ‘5 से 10 साल की अवधि अधिकतर खुदरा निवेशकों के लिए उचित संतुलन प्रदान करती है।’

किन विकल्पों पर करें विचार

ज्यादा जोखिम ले सकते हैं तो निवेश लायक कॉरपोरेट बॉन्ड पर विचार करना चाहिए। अग्रवाल बताते हैं, ‘इनकी ब्याज दर आम तौर पर सरकारी प्रतिभूतियों से 100-200 आधार अंक ज्यादा रहती हैं।’
कॉरपोरेट बॉन्ड में सरकारी बॉन्ड से ज्यादा क्रेडिट जोखिम होता है। मगर अग्रवाल के अनुसार अच्छी रेटिंग वाले कॉरपोरेट बॉन्ड में उन निवेशकों को जोखिम लेने पर अच्छा फायदा मिल सकता है, जो पूरी अवधि तक निवेश बनाए रखते हैं।

गोयनका ने कहा कि आरबीआई फ्लोटिंग रेट वाले बॉन्ड में एक निश्चित अवधि तक निवेश रखना पड़ता है, इसलिए सरकारी प्रतिभूतियों के मुकाबले इन्हें कम पसंद किया जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि पहली बार निवेश करने वालों को बॉन्ड खरीदने के बाद कुछ समय तक निवेश बनाए रखना चाहिए।

First Published : April 13, 2026 | 8:53 AM IST