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मिडकैप फंडों में इस साल अप्रैल में औसतन 11 फीसदी इजाफा देखा गया और स्मॉलकैप फंडों में 13.5 फीसदी वृद्धि देखी गई। फिर भी विशेषज्ञों को लगता है कि इस श्रेणी में चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। इसीलिए जिनका पहले से निवेश है और जो इनमें निवेश शुरू करने जा रहे हैं, उन्हें फूंक-फूंककर ही कदम आगे बढ़ाने चाहिए।
निवेशकों को इस उछाल को 2024 के आखिरी महीनों के दौरान इन श्रेणियों में आई भारी गिरावट के बाद की तेजी मानना चाहिए। उस समय मिडकैप और स्मॉलकैप श्रेणी में कुछ जगह तो 25 से 35 फीसदी गिरावट आई थी। निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के वरिष्ठ फंड मैनेजर (इक्विटी निवेश) रूपेश पटेल कहते हैं, ‘इस गिरावट की कई वजहें थीं मसलन शेयर बहुत महंगे हो जाना और राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों में सख्ती के बाद वृद्धि के आसार कुछ कमजोर हो जाना।’ इस गिरावट के बाद इन श्रेणियों के शेयर कम कीमत के कारण लुभावने हो गए। निवेश सलाहकार फर्म अरविंद राव ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक अरविंद राव मानते हैं, ‘गिरावट के बाद निवेशकों को लगा कि शेयरों की कीमत फिर उस जगह पहुंच गई हैं, जहां से उन्हें खरीदकर निवेश किया जा सकता है।’
निवेशकों को लगा कि मार्च में जरूरत से ज्यादा गिरावट आ गई। एडलवाइस म्युचुअल फंड के अध्यक्ष और मुख्य निवेश अधिकारी (इक्विटी) त्रिदीप भट्टाचार्य कहते हैं, ‘मार्च में बाजार 10 फीसदी से ज्यादा लुढ़क गया। यह गिरावट अनुमान से बहुत ज्यादा थी क्योंकि अनुमान यही था कि अप्रैल के अंत तक युद्ध का असर धीमा पड़ा तो चालू वित्त वर्ष की कमाई में 2 से 4 फीसदी कमी आ सकती है।’ पटेल के हिसाब से इन श्रेणियों में उछाल इस उम्मीद से आई कि भू-राजनीतिक समस्याएं जल्द सुलझ जाएंगी और कमाई में इजाफे की रफ्तार कम नहीं होगी।
देसी खपत भी पूरी तरह धराशायी नहीं हुई है। राव बताते हैं, ‘माल एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह, ऋण उठान में वृद्धि और कुछ क्षेत्रों में कंपनियों का मुनाफा बताता है कि देश के भीतर खपत बरकरार है।’ चुनिंदा देसी क्षेत्रों में मुनाफा बेहतर रहने की उम्मीद ने भी बाजार को सहारा दिया है। मंदी के बावजूद खुदरा निवेशकों ने शेयरों में निवेश छोड़ा नहीं है। राव ने कहा, ‘पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण हुई गिरावट के बावजूद एसआईपी में निवेश की आवक अच्छी बनी हुई है।’
तेजी कब तक और कैसी बनी रहेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भू-राजनीतिक तनाव कितने कम होते हैं और कच्चे तेल की कीमत में कितनी गिरावट आती है। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) विशाल धवन ने कहा, ‘तेल की कीमत लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल रहे और रुपये में ठहराव आए तो महंगाई थमेगी और आय तथा विदेशी निवेश को दम मिल सकता है।’अर्निंग में इजाफा भी शेयरों की कीमत के हिसाब से होना चाहिए। राव की राय है, ‘वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में आय में तेजी का असली इम्तिहान होगा।’ जो कंपनियां कीमत तय करती हैं, तेजी उन्हीं के बल पर आएगी। भट्टाचार्य का कहना है, ‘उन कंपनियों के शेयरों में तेजी ज्यादा बनी रह सकती है, जिनके पास कीमतें तय करने की ताकत है और जो कमोडिटी की कीमत बढ़ने से उछली लागत का बोझ उत्पादों की कीमतें बढ़ाकर ग्राहकों पर डाल सकती हैं।’
एसआईपी और एकमुश्त निवेश से चलने वाले देसी म्युचुअल फंडों में लगातार आवक से बाजार में तरलता बेहतर हो सकती है। मुद्रास्फीति भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अनुमान के हिसाब से बनी रहती है तो ब्याज दरें इसी स्तर पर रहेंगी और रुख भी तटस्थ रहेगा। बुनियादी ढांचे पर लगातार सरकारी खर्च से कई मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों को फायदा मिल सकता है। राव को लगता है, ‘सड़क, रेलवे, रक्षा, विनिर्माण, इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स और कल-पुर्जा जैसे क्षेत्रों की मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों को सरकारी पूंजीगत व्यय का बड़ा लाभ मिला है।’
उछाल पर तलवार भी फंडों में इस उछाल के लिए भू-राजनीतिक अनिश्चितता बड़े जोखिम का काम कर सकती है। भट्टाचार्य के मुताबिक युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर रहती हैं तो उछाल गायब हो सकती है। ऐसे में देश के भीतर महंगाई की हालत भी चिंताजनक हो सकती है। महंगाई बढ़ेगी तो रिजर्व बैंक ब्याज दर में कटौती टाल सकता है, जिससे छोटी कंपनियों को झटका लगेगा। पटेल कहते हैं, ‘भू-राजनीतिक अनिश्चितता लंबी चली तो लागत बढ़ सकती है और आपूर्ति श्रृंखलाओं के बाधित होने के कारण आय वृद्धि का अनुमान खटाई में पड़ सकता है।’
अगर आय कमजोर होती है तो शेयरों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। राव को वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में मार्जिन पर दबाव दिखने की आशंका है। अमेरिकी शुल्क से जुड़े जोखिम भारत के विनिर्माण और फार्मास्युटिकल्स जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं। राव कहते हैं, ‘शुल्क के कारण अड़चनें आने से उन कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है, जो निर्यात बाजार में होड़ करती हैं।’
अगर वृहद वातावरण बिगड़ता है तो कुछ कंपनियां दूसरों के मुकाबले अधिक परेशान होंगी। भट्टाचार्य को लगता है, ‘कमजोर कारोबारी मॉडल वाली कंपनियों की लाभप्रदता में उम्मीद से अधिक गिरावट दिख सकती है।’ सितंबर 2024 की शीर्ष ऊंचाई के बाद इन श्रेणियों ने निवेशकों को खराब रिटर्न दिया है। आगे भी खराब प्रदर्शन जारी रहा तो खुदरा निवेशकों का हौसला कमजोर हो सकता है। धवन को लगता है कि इससे बाजार को सहारा देने वाले घरेलू निवेश पर भी असर पड़ेगा। राव के हिसाब से मॉनसून कमजोर रहा तो खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और खपत को नुकसान पहुंच सकता है।
शेयरों की कीमतें अपने शिखर से नीचे आ गई हैं। भट्टाचार्य बताते हैं, ‘बाजार में गिरावट के बाद पिछले 12 से 15 महीनों के दौरान शेयरों के भाव में तेजी काफी हद तक खत्म हो गई है।’ साल 2024 के उच्चतम स्तरों पर मिडकैप इंडेक्स, प्राइस-टु-अर्निंग्स (पी/ई) आधार पर, निफ्टी 50 के मुकाबले लगभग 40 से 50 फीसदी ज्यादा या प्रीमियम पर कारोबार कर रहा था। लंबी अवधि का औसत प्रीमियम आम तौर पर 15 से 25 फीसदी की सीमा में रहा है। राव का कहना है कि मिडकैप और स्मॉलकैप के मौजूदा मूल्यांकन पिछले कुछ समय के औसत के करीब हैं।’ कई पॉकेट अब भी सस्ते नहीं हैं इसलिए आय में कोई भी कटौती इन श्रेणियों को प्रभावित कर सकती है। राव की राय में आय निराशाजनक रहने पर मूल्यांकन फिर बढ़ सकता है।
मिडकैप और स्मॉलकैप फंड लंबी अवधि में संपत्ति बना सकते हैं लेकिन वे अधिक अस्थिर होते हैं। अगर मौजूदा निवेशकों के पास समय है तो उन्हें तेजी के बाद निवेश समेटने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। धवन की सलाह है, ‘अपने पोर्टफोलियो पर ठीक से नजर डालें और अपने संपत्ति आवंटन के हिसाब से उसमें नए सिरे से संतुलन बनाएं।’ अधिक लाभ की उम्मीद में एकमुश्त निवेश से भी बचना चाहिए। राव आगाह करते हैं कि अंधाधुंध निवेश करने का मौका शायद मार्च में था मगर अब नहीं है। एक से तीन साल में आने वाले लक्ष्यों के लिए आवश्यक धन को मिडकैप और स्मॉलकैप फंडों से निकालकर जोखिम से बची रहने वाली संपत्तियों में डाल देना चाहिए। धवन सलाह देते हैं कि जिन निवेशकों को 20-30 फीसदी गिरावट से समस्या हो सकती है, उन्हें जोखिम कम कर लेना चाहिए।
नए निवेशकों केवल इसलिए निवेश न कर डालें कि पिछले कुछ समय में इन फंडों में तेजी आई है। उन्हें निवेश तभी करना चाहिए, जब उनके पास जोखिम सहने की क्षमता हो और निवेश बनाए रखने के लिए पर्याप्त समय हो। उन्हें एकमुश्त निवेश से बचना चाहिए। धवन का सुझाव है, ‘नए निवेशकों को 12 से 18 महीनों में एसआईपी या सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान (एसटीपी) के जरिये निवेश करना चाहिए। वे स्मॉलकैप फंडों में निवेश अवधि को 24 महीने तक बढ़ा सकते हैं।’
किस्तों में निवेश करने से निवेशकों को खरीद का खर्च ठीक करने में मदद मिलती है और लंबे समय में बेहतर रिटर्न हासिल करने में भी सहायता हो जाती है। नए निवेशकों को पहले समझना होगा कि उनमें बड़ी गिरावट को सहने की क्षमता है या नहीं क्योंकि इन श्रेणियों में एकाएक भारी गिरावट आने का अंदेशा बहुत होता है। स्मॉलकैप फंड खास तौर पर नाजुक होते हैं। राव बताते हैं, ‘इन शेयरों में तरलता कम होती है और विश्लेषक इन पर नजर भी कम रखते हैं। इस वजह से बाजार में स्थिति प्रतिकूल होने पर इनमें 30 से 35 फीसदी तक की तेज गिरावट आ सकती है।’
ऐसी गिरावट से घबराने वाले निवेशकों को स्मॉलकैप फंडों से बचना चाहिए। इन दो श्रेणियों में आवंटन जोखिम सहने की क्षमता के हिसाब से ही करना चाहिए। धवन की सलाह है, ‘जोखिम से तौबा करने वाले निवेशकों को अपने इक्विटी पोर्टफोलियो का 5 से 10 फीसदी मिडकैप फंडों में लगाना चाहिए और 5 फीसदी तक निवेश स्मॉलकैप फंडों के लिए रखना चाहिए। मध्यम निवेशकों को मिडकैप में 15 से 20 फीसदी और स्मॉलकैप में 5 से 10 फीसदी आवंटन रखना चाहिए। खतरों से खेलने वाले मिडकैप में 25 फीसदी और स्मॉलकैप में 15 फीसदी तक रकम लगा सकते हैं।’