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भारत में कैंसर के इलाज से जुड़े तंत्र का विस्तार अब देश के महानगरों से इतर दूसरे छोटे और मझोले शहरों में भी हो रहा है। इस बीमारी से जुड़े अस्पताल, जांच केंद्रों से जुड़ी कंपनियां और मरीज की सहायता करने वाले संगठन इन शहरों में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इसकी मुख्य वजह कैंसर की बढ़ती दर, बीमारी के प्रति जागरूकता और बेहतर जांच सुविधाएं उपलब्ध होना है। स्वास्थ्य सेवा प्रदाता कंपनियों के अनुसार मुंबई, दिल्ली और बेंगलूरु जैसे परंपरागत केंद्रों के बाहर अब कैंसर के इलाज से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं में सुधार देखने को मिल रहा है।
डायग्नॉस्टिक्स कंपनियां कैंसर के इलाज की बढ़ती मांग के कारण महानगरों से बाहर पंख फैला रही हैं। कैंसर जीनोमिक्स और डायग्नॉस्टिक्स सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनी 4बेसकेयर, जम्मू और कोट्टायम जैसे स्थानों के बाद अब श्रीनगर, गुवाहाटी, कोयंबत्तूर और राजस्थान के कई शहरों में अपनी सेवाएं बढ़ा रही है। 4बेसकेयर के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हितेश गोस्वामी ने कहा, ‘हम मझोले और छोटे शहरों में भी मरीजों को अत्याधुनिक जीनोमिक जांच की सुविधा देने का प्रयास कर रहे हैं। अभी इन जगहों पर इस तरह की सेवाएं सीमित ही हैं।’ 4बेसकेयर की विशेषज्ञता जीनोमिक प्रोफाइलिंग में है, जो डॉक्टरों को निजी इलाज की योजनाएं बनाने में मददगार होती है। गोस्वामी ने कहा कि कंपनी पारंपरिक केंद्रीकृत डायग्नोस्टिक्स मॉडल से हटकर अस्पतालों के भीतर ही नमूने की जांच की सुविधाएं दे रही है। अब नमूनों को जांच के लिए महानगरों के केंद्रों में नहीं भेजा जाता।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि छोटे शहरों में विस्तार के लिए आर्थिक चुनौती बड़ी है। इन जगहों पर भले ही किराये और रियल एस्टेट की लागत कम होती है, लेकिन उपकरण और अनुपालन लागत लगभग समान रहती है। गोस्वामी ने कहा, ‘इस बीमारी की जांच से जुड़ी मशीन की लागत कम नहीं होती है, भले ही आप इसे बेंगलूरु में लगाएं या फिर किसी छोटे शहर में। महानगरों से बाहर लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती होती है। कभी-कभी प्रशिक्षित पेशेवरों को इन जगहों पर स्थानांतरित करने पर लागत बढ़ जाती है, क्योंकि प्रशिक्षित कर्मचारी को अतिरिक्त प्रोत्साहन देकर ही महानगरों के बाहर भेजा जा सकता है।’
पूंजीगत खर्च भी बहुत मायने रखता है। 4बेसकेयर के अनुसार, जीनोमिक्स लैब के पैमाने और उपकरण के हिसाब से इसे स्थापित करने में 3 करोड़ से 10 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है। अस्पतालों और डायग्नॉस्टिक्स कंपनियों के साथ, मरीज सहायता संगठन भी महानगरों में जाने के वित्तीय और भावनात्मक बोझ को कम करने के लिए सेवाओं का विकेंद्रीकरण कर रहे हैं। एक्सेस लाइफ असिस्टैंस फाउंडेशन, बच्चों के कैंसर के इलाज के लिए आवास और अन्य सेवाएं मुहैया करता है और यह पुणे, सिल्चर एवं मणिपाल के बाद अब तिरुवन्नामलाई, रायपुर और पुदुच्चेरी में अपना विस्तार कर रहा है। एक्सेस लाइफ असिस्टेंस फाउंडेशन के संस्थापक और अध्यक्ष के गिरीश नायर का कहना है, ‘हमने देखा कि सुविधाओं की कमी के कारण गांवों के बच्चे इलाज के लिए महानगरों में जा रहे थे। हमारी रणनीति छोटे और मझोले शहरों में उन अस्पतालों की पहचान करना है, जिनके पास उपचार के बेहतर दिशानिर्देश हैं और उनके आसपास एक समर्थन वाली प्रणाली बनाना है।’ नायर ने कहा कि आवास, भोजन और परिवहन जैसे गैर-चिकित्सीय खर्च, लंबे समय तक कैंसर उपचार कराने वाले परिवारों के कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा हो सकते हैं।
देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्से में सामुदायिक कैंसर केंद्र चलाने वाले एमओसी कैंसर केयर ऐंड रिसर्च सेंटर ने इस वित्त वर्ष के अंत तक अपने नेटवर्क को 28-29 से बढ़ाकर लगभग 40 केंद्रों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। कंपनी ने हाल ही में नवी मुंबई में नया केंद्र शुरू किया है और दिल्ली-एनसीआर तथा बेंगलूरु, हैदराबाद, चेन्नई और कोच्चि जैसे दक्षिण के बाजारों में विस्तार की योजना बना रही है।
एस कंपनी के संस्थापक और निदेशक आशिष जोशी ने कहा, ‘हम अपने सामुदायिक कैंसर केंद्र का विस्तार कर रहे हैं जो पंजीकृत अस्पताल हैं न कि केवल डेकेयर केंद्र। ये मरीजों की पहुंच और इलाज के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।’ जोशी के अनुसार, महानगरों के बाजार अब भी तात्कालिक प्राथमिकता में हैं क्योंकि वहां कैंसर से जुड़ी विशेष सुविधाएं, बेहतर बीमा कवरेज और कैंसर के डॉक्टरों की उपलब्धता अधिक है।