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Editorial: ​​शिक्षा में चाहिए ज्यादा निवेश, ‘स्टडी इन इंडिया’ मिशन से क्या बदलेगी तस्वीर?

भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां जनसांख्यिकीय लाभ और तकनीकी बदलाव एक दूसरे के साथ मिल सकते हैं। बड़ी संख्या में युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- March 20, 2026 | 10:25 PM IST

हर साल बड़ी संख्या में भारतीय युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान सुविधाओं और करियर के अवसरों की तलाश में विदेश जाते हैं। अब ‘स्टडी इन इंडिया’ पहल के तहत 2030 तक प्रतिवर्ष 2,00,000 विदेशी छात्रों को आकर्षित करने का केंद्र सरकार का लक्ष्य यह संकेत है कि भारत को केवल प्रतिभाओं के आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास हो रहा है।

हाल के कई रुझान इस महत्त्वाकांक्षा को सार्थक बनाते हैं। उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या 2023 में 9,00,000 से अधिक से घटकर वर्ष 2025 में लगभग 6,25,000 रह गई है। इसके कई कारण हैं। प्रमुख गंतव्य देशों, खासकर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में आव्रजन नियमों में सख्ती आई है। वीजा जांच के अलावा वित्तीय लागत बढ़ गई है और अध्ययन के बाद रोजगार के रास्ते कम निश्चित हो गए हैं। कई छात्रों और परिवारों के लिए विदेशी शिक्षा पर निवेश का लाभ अब कुछ साल पहले की तुलना में कम निश्चित लगता है।

भारत इस व्यवधान को अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। लगभग 19 विदेशी विश्वविद्यालय देश में अपने परिसर स्थापित करने के लिए तैयार हैं, क्योंकि एक नीतिगत ढांचा अब अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को भारत में या गिफ्ट सिटी जैसे विशेष क्षेत्रों में संचालित करने की अनुमति देता है। इसका तर्क सीधा है। यदि वैश्विक विश्वविद्यालय भारत में डिग्री प्रदान कर सकते हैं, तो छात्र विदेश जाने के खर्च और अनिश्चितताओं के बिना अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे।

साथ ही, भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसर एशिया, अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों के छात्रों को आकर्षित कर सकते हैं। वैश्विक विश्वविद्यालयों के लिए आकर्षण स्पष्ट है। भारत में उच्च शिक्षा की मांग में तेजी से वृद्धि हो रही है और तृतीयक स्तर पर नामांकन आज के लगभग 5.3 करोड़ से बढ़कर 2035 तक 7 करोड़ से अधिक होने की उम्मीद है।

इसके विपरीत, जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के अपने परिसरों में नामांकन स्थिर बना हुआ है। ऐसे संकेत भी हैं कि भारत की अपनी उच्च शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचान मिल रही है। क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की संख्या 2014-15 के मात्र 11 से बढ़कर नवीनतम संस्करण में 54 हो गई है।

यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति और इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस योजना जैसी पहलों के तहत बुनियादी ढांचे, अनुसंधान और वैश्विक सहयोग में किए गए निवेश को दर्शाता है। फिर भी, मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है। हर साल, उपलब्ध सीटों की संख्या की तुलना में कहीं अधिक विद्यार्थी प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए अर्हता प्राप्त करते हैं, जो क्षमता की निरंतर कमी का संकेत देता है।

भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां जनसांख्यिकीय लाभ और तकनीकी बदलाव एक दूसरे के साथ मिल सकते हैं। बड़ी संख्या में युवा कार्यबल में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में देश को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों जैसे क्षेत्रों में तेजी से उन्नत कौशल विकसित करने की आवश्यकता है।

इन क्षेत्रों के लिए आवश्यक अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र और प्रतिभाओं के विकास में विश्वविद्यालयों की केंद्रीय भूमिका होगी। इसके अला​वा, अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का केंद्र बनने की महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए विदेशी परिसरों को आकर्षित करने या भारतीय विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में सुधार करने से कहीं अधिक की आवश्यकता होगी।

इससे भी बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय विश्वविद्यालय अनुसंधान की गुणवत्ता, संकाय क्षमता और शैक्षणिक स्वतंत्रता के मामले में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। इसका अर्थ है अनुसंधान निधि के साथ प्रयोगशालाओं में निरंतर निवेश, वैश्विक संस्थानों के साथ आसान सहयोग और ऐसे नियामक ढांचे जो कठोर मानकों को बनाए रखते हुए विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करें।

First Published : March 20, 2026 | 10:16 PM IST