Puri Jagannath temple secures IP protection for sacred 'words'
ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) ने 12वीं शताब्दी के इस मंदिर से जुड़े प्रमुख शब्दों और अभिव्यक्तियों के लिए बौद्धिक संपदा (आईपी) संरक्षण प्राप्त किया है और अपने आधिकारिक लोगो का ट्रेडमार्क पंजीकरण कराया है। देश में किसी धार्मिक स्थल ने पहली बार ऐसा किया है। उसका यह कदम हिंदू धर्म के सबसे पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को कानूनी रूप से सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
मंदिर प्रशासन ने ‘पतितपावन’ (पतितों का उद्धारक) और ‘आनंद बाजार’ (मंदिर परिसर का वह स्थान जहां भक्त महाप्रसाद ग्रहण करते हैं) के लिए शब्द-चिह्न सुरक्षित किए हैं, साथ ही ‘नीलचक्र’ (मंदिर के मुख्य शिखर पर स्थित पवित्र धातु चक्र) के लिए लोगो भी सुरक्षित किया है। वही एसजेटीए का आधिकारिक लोगो है। इसके अतिरिक्त, प्रशासन ने 26 और पूजनीय शब्दों, वाक्यांशों, डिजाइनों और पहचान-चिह्नों जैसे ‘श्रीमंदिर’, ‘जगन्नाथ धाम’, ‘पुरुषोत्तम क्षेत्र’, ‘श्रीक्षेत्र’, ‘बड़ा दंड’ और ‘महाप्रसाद’ के संरक्षण के लिए आवेदन किया है ताकि क्षेत्रीय स्तर पर इनकी गलत प्रस्तुति को रोका जा सके।
यह घटनाक्रम उस हालिया विवाद की पृष्ठभूमि में आया है जिसमें तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल के दीघा स्थित जगन्नाथ मंदिर परिसर के लिए ‘धाम’ शब्द का उपयोग किया था। ओडिशा ने यह कहते हुए इसका तीखा विरोध किया था कि ‘जगन्नाथ धाम’ ऐतिहासिक और शास्त्रीय रूप से केवल पुरी से जुड़ा है जो चार पवित्र चार धामों में से एक है। यह मुद्दा दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस का कारण बना, जिसके बाद नवनिर्वाचित भाजपा सरकार ने दीघा मंदिर के साइनबोर्ड से धाम शब्द हटा दिया।
राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और एसजेटीए के मुख्य प्रशासक अरविंद कुमार पाधी ने कहा कि मंदिर प्रशासन को ‘आनंद बाजार’ और ‘श्री पतित पावन’ जैसे दो प्रमुख शब्दों के लिए वर्ड मार्क और एसजेटीए के लिए लोगो मार्क की बौद्धिक संपदा का अनुमोदन प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया, ‘मंदिर प्रशासन ने 29 वस्तुओं के लिए आईपी अधिकारों के आवेदन किए थे जिनमें शब्द, वाक्यांश, प्रतीक और डिजाइन शामिल हैं जो भगवान जगन्नाथ मंदिर और जगन्नाथ संस्कृति से जुड़े हैं। ऐसा इसलिए ताकि मंदिर की संस्थागत पहचान को सुरक्षित किया जा सके। हमने अन्य 26 आवेदनों के समर्थन में सभी साक्ष्य और पहचान-चिह्न प्रस्तुत किए हैं। हमें शेष वस्तुओं के लिए भी अनुमोदन मिलने की आशा है।’ मंदिर अधिकारियों ने इन पंजीकरणों को ‘पेटेंट’ कहा, लेकिन बौद्धिक संपदा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह संरक्षण वास्तव में ट्रेडमार्क के रूप में है जो सामान्यतः आविष्कारों और तकनीकी नवाचारों के लिए दिए जाते हैं।
यह कदम उन शब्दों के दुरुपयोग, व्यावसायिक दुरुपयोग और गलत प्रस्तुति को रोकने में मदद करेगा जो सदियों से विकसित हुए हैं और ओडिशा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना में गहराई से रचे-बसे हैं।
‘जगन्नाथ धाम’ विशेष रूप से पुरी को संदर्भित करता है, जो हिंदू धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। ‘महाप्रसाद’ भगवान जगन्नाथ को अर्पित पवित्र भोजन को दर्शाता है, जिसे भक्तों में वितरित किया जाता है। ‘आनंद बाजार’ मंदिर परिसर के भीतर वह विशिष्ट स्थान है जहां भक्त महाप्रसाद ग्रहण करते हैं, जबकि ‘पतितपावन’ भगवान जगन्नाथ के उस स्वरूप को दर्शाता है जो सिंह द्वार के बाहर सेउन लोगों के लिए दिखाई देता है जो मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते।
एक वर्ड मार्क किसी विशेष शब्द या वाक्यांश की रक्षा करता है, जबकि एक लोगो मार्क किसी दृश्य प्रतीक या डिजाइन की रक्षा करता है। मंदिर के लिए ये पंजीकरण विशिष्ट अधिकार स्थापित करने और अनधिकृत व्यावसायिक या संस्थागत उपयोग को रोकने में मदद करेंगे, जो जनता को गुमराह कर सकता है। एसजेटीए के पूर्व प्रशासक (नीति) प्रदीप दास ने कहा, “यह हमारी धार्मिक विरासत को संरक्षित और सुरक्षित रखने की एक अच्छी पहल है।”
ट्रेडमार्क विशेषज्ञों के अनुसार एक पंजीकृत वर्डमार्क पाठ को स्वयं सुरक्षित करता है। फिर चाहे उसकी शैली, फॉन्ट या प्रस्तुति कुछ भी हो। उदाहरण के लिए, यदि ‘जगन्नाथ धाम’ आखिरकार पंजीकृत हो जाता है तो संरक्षित श्रेणियों में इस वाक्यांश का कोई भी भ्रामक व्यावसायिक उपयोग कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है। दूसरी ओर एक लोगो मार्क मंदिर की दृश्य पहचान की रक्षा करता है और उसके अनधिकृत उपयोग को रोकता है।
हालांकि भारत में कुछ धार्मिक संस्थानों ने पहले प्रसाद के लिए जीआई टैग प्राप्त किया है, जो बौद्धिक संपदा संरक्षण का एक अन्य रूप है, लेकिन एसजेटीए का प्रयास अनूठा है क्योंकि यह पूरे धार्मिक परंपरा से जुड़े पवित्र शब्दों और सांस्कृतिक पहचान-चिह्नों की व्यापक श्रेणी को सुरक्षित करने की कोशिश करता है। जीआई और सांस्कृतिक शोधकर्ता अनीता साबत ने कहा कि यह श्रीमंदिर से जुड़ी बौद्धिक संपदा (आईपी) की रक्षा और संरक्षण के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है।