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दवा नियामक योजना के लिए फंडिंग में रुकावट पर संसदीय समिति की चिंता

रिपोर्ट में कहा गया है, 'भारतीय औषधि महानियंत्रक के साथ केंद्रीकरण ने कई प्रमुख बाधाएं पैदा की हैं। यह चिकित्सा उपकरण विनिर्माण में भारत को अग्रणी बनाने में सबसे बड़ी बाधा है।

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संकेत कौल   
Last Updated- April 13, 2026 | 8:56 AM IST

भारत के औषधि एवं चिकित्सा उपकरण नियामकीय ढांचे में व्यवधान और ढांचागत कमियों पर गंभीर चिंता जताते हुए एक संसदीय स्थायी समिति ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से ‘राज्य औषधि नियामकीय प्रणाली को मजबूत करने वाली योजना (एसएसडीआरएस)’ के तहत आवंटन को तत्काल मंजूरी देने के लिए कहा है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण पर बनी संसदीय समिति ने स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए अनुदान मांगों की समीक्षा करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एसएसडीआरएस योजना को मिलने वाली रकम में काफी रुकावट देखी गई है। इस योजना का उद्देश्य दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी में सुधार करना और सस्ती दवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना है।

आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 के बजट अनुमान में इस मिशन के लिए मंत्रालय को 75 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। मगर उस वर्ष के लिए संशोधित अनुमान घटकर 50 करोड़ रुपये रह गया जिसमें से 48.32 करोड़ रुपये यानी 96.6 फीसदी ही खर्च किए गए।

वित्त वर्ष 2026 के लिए इस योजना मद में 50 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे जो संशोधित आवंटन में घटकर शून्य हो गया। वित्त वर्ष 2026 के लिए व्यय भी जनवरी 2026 तक शून्य रहा। केंद्रीय बजट 2026-27 में एसएसडीआरएस योजना के लिए कोई आवंटन नहीं किया गया।

राज्य सभा सदस्य राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा, ‘समिति इस तरह के अचानक वित्तीय ठहराव को देखकर चिंतित है। ऐसा मुख्य तौर पर योजना के विस्तार और उसके बाद एसएसडीआरएस 2.0 प्रस्ताव को मंजूरी देने में प्रक्रियागत देरी के कारण हुआ है। अचानक वित्तीय व्यवधान इस योजना की शुरुआत से अब तक कड़ी मेहनत से हासिल की गई बुनियादी ढांचागत उपलब्धियों को पटरी से उतारने का खतरा पैदा करता है।

वित्त वर्ष 2026 के लिए आवंटन न किए जाने के बारे में पूछे जाने पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने कहा कि जनवरी 2026 में व्यय विभाग से अनापत्ति प्राप्त होने के बाद इस योजना को अतिरिक्त वित्तीय परिव्यय के बिना 31 मार्च 2026 तक बढ़ाया जा चुका था।

विभाग ने समिति की रिपोर्ट के अनुसार कहा, ‘तब तक वित्त वर्ष 2026 के लिए संशोधित अनुमान को शून्य पहले ही कर दिया गया था।’

वित्त वर्ष 2027 के लिए शून्य आवंटन के बारे में विभाग ने कहा कि मौजूदा एसएसडीआरएस के तहत कोई बजटीय आवंटन नहीं किया गया था क्योंकि योजना की अवधि समाप्त हो गई थी। मगर संशोधित उद्देश्यों के साथ एसएसडीआरएस 2.0 को 496.16 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ पांच साल (2026-27 से 2030-31) की अवधि के लिए प्रस्तावित किया गया है।

विभाग ने कहा, ‘एसएसडीआरएस 2.0 के प्रस्ताव पर फिलहाल व्यय विभाग द्वारा विचार किया जा रहा है। वित्त वर्ष 2027 के लिए बजटीय आवंटन नई योजना की मंजूरी पर निर्भर करेगा।’ समिति ने जोर देकर कहा, ‘समिति सिफारिश करती है कि विभाग 496.16 करोड़ रुपये की एसएसडीआरएस 2.0 योजना को तत्काल मंजूरी दिलाने के लिए व्यय विभाग के साथ तालमेल बिठाए।’

समिति ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 19 नई और 28 नवीनीकृत राज्य दवा परीक्षण प्रयोगशालाओं को संशोधित योजना के औपचारिक कार्यान्वयन की प्रतीक्षा करते हुए परिचालन पंगुता का सामना न न करना पड़े। इसलिए अंतरिम वित्तीय ढांचे या पूरक अनुदान पर विचार करना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि एसएसडीआरएस 1.0 के तहत जांच क्षमता में काफी विस्तार हुआ जो सालाना 57,000 नमूनों से 1.66 लाख से अधिक नमूनों तक पहुंच गई। मगर राज्य स्तर पर श्रम बल के लगातार अभाव के कारण उसकी प्रभावशीलता प्रभावित हुई है।

इसमें कहा गया है, ‘समिति का मानना है कि पर्याप्त प्रशिक्षित विश्लेषकों और असंदिग्ध प्रवर्तन तंत्र के बिना अत्याधुनिक परीक्षण अवसंरचना को व्यर्थ बना दिया गया है।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति का मानना है कि पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित एनालिस्ट के बिना और सख्त प्रवर्तन ढांचे के बिना अत्याधुनिक परीक्षण ढांचा भी विफल हो जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जोखिम आधारित निरीक्षण ढांचे को सभी राज्य औषधि नियंत्रण कार्यालयों में स्थायी रूप से संस्थागत, मानकीकृत और पूरी तरह से डिजिटल किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अनुपालन न करने वाली विनिर्माण प्रथाओं पर की जाने वाली कार्रवाई देश भर में सुसंगत, पारदर्शी और डेटा पर आधारित बनी रहे। समिति ने कहा है कि चिकित्सा उपकरणों की मंजूरी को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिए।

संसदीय समिति ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) द्वारा उच्च जोखिम वाले चिकित्सा उपकरणों के लिए मंजूरियों में देरी और प्रक्रियात्मक अक्षमताओं को भी उजागर किया है। उसने सिफारिश की है कि सभी चिकित्सा उपकरणों की मंजूरी को पूरी तरह राज्य प्राधिकरणों को विकेंद्रीकृत की जानी चाहिए। फिलहाल राज्य सरकार के अधिकारी कम जोखिम वाले चिकित्सा उपकरणों के विनिर्माण को नियंत्रित करते हैं। मगर उच्च जोखिम वाले चिकित्सा उपकरणों के आयात और विनिर्माण की देखरेख केंद्र सरकार करती है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीजीसीआई) के साथ केंद्रीकरण ने कई प्रमुख बाधाएं पैदा की हैं। यह चिकित्सा उपकरण विनिर्माण में भारत को अग्रणी बनाने में सबसे बड़ी बाधा है।’

रिपोर्ट में कहा गया है कि विनिर्माण और आयात के 2,999 आवेदनों में से लगभग 62 फीसदी को दो बार से अधिक पूछताछ का सामना करना पड़ा। साथ ही 253 आयात आवेदन और यहां तक कि यूएसएफडीए/ सीई प्रमाणन वाले आवेदनों को भी 90 दिनों से अधिक समय तक लंबित रहे। समिति ने कहा है कि इस प्रकार की बाधाएं चीन, वियतनाम और मलेशिया जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती हैं।

समिति ने घरेलू निर्माताओं को चिकित्सा उपकरण नियम (एमडीआर) 2017 से निपटने में मदद करने के लिए सीडीएससीओ के भीतर एक समर्पित व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे आवदेनों को मंजूरी मिलने में देरी को कम किया जा सकेगा।

First Published : April 13, 2026 | 8:56 AM IST