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RBI ने पूंजी नियमों में दी बड़ी ढील, IFR खत्म करने से बैंकों को होगा सीधा फायदा

एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव के कारण बैंकों का करीब 35,000-40,000 करोड़ रुपये का आईएफआर कोष मुक्त हो सकता है।

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सुब्रत पांडा   
Last Updated- April 09, 2026 | 8:42 AM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को बैंकों के लिए प्रमुख नियमों में ढील दे दी है। इससे बैंकों के पूंजी अनुपातों पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है। केंद्रीय बैंक ने वाणिज्यिक बैंकों के लिए निवेश उतार-चढ़ाव आरक्षित निधि (आईएफआर) की जरूरत खत्म करने का प्रस्ताव किया है। साथ ही बैंकों को पूंजी पर्याप्तता अनुपात (सीआरएआर) गणना में प्रावधान स्तर में उतार-चढ़ाव की परवाह किए बिना तिमाही लाभ को शामिल करने की अनुमति दी है।

मौजूदा दिशानिर्देशों के तहत वाणिज्यिक बैंक सीआरएआर में तिमाही शुद्ध लाभ को केवल तभी शामिल कर सकते हैं जब गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) से जुड़े प्रावधान चार-तिमाही के औसत के 25 प्रतिशत से अधिक न हों। रिजर्व बैंक अब इस शर्त को हटाने जा रहा है। रिजर्व बैंक ने निवेश उतार-चढ़ाव आरक्षित निधि (आईएफआर) को भी समाप्त करने का प्रस्ताव किया है। कारण कि ज्यादातर वाणिज्यिक बैंक पहले से ही बाजार जोखिम के लिए पूंजी बनाए रखते हैं और निवेश वर्गीकरण व मूल्यांकन के लिए अपडेटेड मानदंडों का पालन करते हैं।

एक सरकारी बैंक के वरिष्ठ बैंकर ने कहा, ‘एनपीए से जुड़े परिवर्तन से मुख्य रूप से साल भर सीआरएआर को सुचारू बनाने में मदद मिलेगी। पहले बैंकों को तिमाही लाभ को सीआरएआर में शामिल करने की अनुमति नहीं थी और इसे केवल वित्त वर्ष के अंत में किया जा सकता था। अब इस बदलाव के साथ हरेक तिमाही में अर्जित लाभ जैसे-जैसे प्राप्त होगा, उसे सीआरएआर में शामिल किया जा सकता है। तथापि समग्र रूप से अंतिम परिणाम एक जैसा ही रहता है। इसलिए पूरे वर्ष के आधार पर कोई बड़ा अंतर नहीं पड़ेगा।’

उन्होंने कहा कि आईएफआर में बदलाव अधिक महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘ज्यादातर बैंक आईएफआर में लगभग 2 प्रतिशत या उससे कुछ अधिक बनाए रखते हैं, जिसकी अब जरूरत नहीं होगी। यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि इसे कैसे माना जाएगा – क्या इसे लाभ में स्थानांतरित किया जाएगा या किसी अन्य तरीके से संभाला जाएगा ।इस पर आगे स्पष्टता की प्रतीक्षा है।’

एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार इस बदलाव के कारण बैंकों का करीब 35,000-40,000 करोड़ रुपये का आईएफआर कोष मुक्त हो सकता है। इस कोष का उपयोग बैंक सीईटी-1 और लाभ-हानि खाते के बीच पिछले तिमाही में यील्ड में काफी वृद्धि होने के बावजूद बेहतर और विवेकपूर्ण तरीके से कर सकते हैं।

मैक्क्वेरी कैपिटल में वित्तीय सेवा अनुसंधान प्रमुख सुरेश गणपति के अनुसार अगर बैंक आईएफआर को पूरी तरह से उलट देते हैं तो बैंकों के लिए यह लगभग 20-30 आधार अंकों (बीपीएस) का लाभ होगा। उन्होंने कहा ‘हमारा मानना है कि कि बैंकों के इसे उलटने की संभावना नहीं है और हो सकता है कि वे हर साल अतिरिक्त आईएफआर रखना बंद कर दें। बैंकों के पास वैसे भी अब अतिरिक्त पूंजी होती है।’

उन्होंने कहा कि अन्य उपाय एनपीए प्रावधानों के संबंध में तिमाही सीएआर रिपोर्टिंग के लिए केवल एक साधारण रिपोर्टिंग परिवर्तन है और इससे बैंकों के लिए पूरे वर्ष का सीएआर आंकड़ा नहीं बदलेगा।
आईएफआर बफर है। इसे बैंक खासकर ब्याज दरों में बदलाव होने पर मार्क-टु-मार्केट (एमटीएम) में गतिविधियों से अपने निवेश पोर्टफोलियो के मूल्य में उतार-चढ़ाव से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए करते हैं।

बैंक इस आरक्षित निधि में मुनाफे का हिस्सा अलग रखते हैं, जिसका उपयोग बॉन्ड की कीमतें गिरने पर नुकसान कम करने के लिए किया जा सकता है। इससे आय पर प्रभाव को सुचारू बना रहता है।

आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार निवेश में परिवर्तन – जैसे कि बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव, जो बढ़ या घट सकता है – बैंकों की लाभप्रदता पर असर डालते हैं। बैंक तब इन नुकसान से निपटने के लिए हमारे पास आते हैं। इसलिए आईएफआर की अवधारणा को आंशिक रूप से इस तरह की अस्थिरता कम करने के लिए पेश किया गया था। बाजार की कीमतें मार्क-टू-मार्केट मूल्यांकन के माध्यम से परिलक्षित होती हैं। हालांकि, अब यह विचार है कि बाजार की कीमतों को पूरी तरह से शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि वे बैंकों की वास्तविक वित्तीय स्थिति बताती हैं। अगर निवेश का बाजार की कीमतों के अनुरूप मूल्यांकन किया जाता है, तो एक अलग उतार-चढ़ाव आरक्षित निधि की आवश्यकता कम हो जाती है।’

डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन ने समझाया कि आईएफआर का इतिहास कुछ हद तक मिला-जुला रहा है। इसे विशेष संदर्भ में शुरू किया गया था। फिर वापस ले लिया गया और बाद में फिर से पेश किया गया। बैंकों के प्रकार में भी एकरूपता की कमी थी। इस क्रम में विभिन्न बैंकों पर अलग-अलग दिशानिर्देश लागू होते थे। उन्होंने कहा ‘आईएफआर को अब प्रासंगिक नहीं माना जाता है। इसलिए इसे हटाने का उद्देश्य सरलीकरण करना है। इसके अतिरिक्त बैंकों में अनुपालन के विभिन्न स्तर थे, जिससे पर्यवेक्षी अवलोकन हुए। आवश्यकता को समाप्त करके, ढांचा लागू करना आसान और अधिक सुसंगत हो जाता है।’

इक्रा के वित्तीय क्षेत्र रेटिंग्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व सह-समूह प्रमुख अनिल गुप्ता के अनुसार आईएफआर बनाए रखने की जरूरत को हटाने के प्रस्ताव से बैंकों की रिपोर्टेड टियर एक अनुपातों में कुछ सुधार होगा क्योंकि आईएफआर वर्तमान में बैंकों की टियर दो पूंजी में शामिल है।’ उन्होंने कहा कि ज्यादातर बैंकों के लिए मजबूत पूंजी अनुपातों को देखते हुए टियर एक पूंजी अनुपात में वृद्धि का समग्र पूंजी अनुपातों पर कोई महत्त्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। हम उम्मीद करते हैं कि इस बदलाव का बैंकों के टियर एक पूंजी अनुपात पर 6 से 12 आधार अंक का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

First Published : April 9, 2026 | 8:42 AM IST