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दूर तक फैले मैदान में कहीं आवारा पशु विचरते दिखते हैं तो कहीं हरे-भरे खेत हैं। यहीं पर वीरान पड़ी कंक्रीट की लंबी-लंबी सड़कें भी हैं तो कुछ जगहों पर टूटी-फूटी चारदीवारी। यह वह जगह है जिसकी पश्चिम बंगाल में औद्योगिकीकरण की शुरुआत करने के लिए निशानदेही की गई थी, लेकिन आज यह मानो खुद तय नहीं कर पा रही कि उसका क्या होना चाहिए?
यह कोलकाता से 40 किलोमीटर दूर सिंगूर है, जहां करीब 997 एकड़ में वर्ष 2006 में टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना का कारखाना बनने के लिए प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन आज दो दशक बाद यहां न तो उद्योग ही लग पाए और न ही यह वह खेती की जमीन रही, जिसका वादा उस समय नैनो कारखाने का विरोध करते समय राजनीतिक दलों द्वारा किया गया था।
यहां दिखता है तो केवल ऐसा परिदृश्य, जो उस जीत की कहानी कहता है, जिसने बंगाल की राजनीति की दिशा ही बदल दी। यही वह मुद्दा था, जिसने वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत करते हुए ममता बनर्जी को एकछत्र राज करने का मौका दिया, लेकिन जो सवाल आज 15 साल बाद भी बना हुआ है, वह है- अंततः सिंगूर में जीता कौन?
तीस वर्षीय तन्मय घोष उस आंदोलन की यादों के साथ पले-बढ़े हैं, जिसने आज भी उनका दरवाजा नहीं छोड़ा है। उनके माता-पिता और चाचा-चाची की जमीन भी टाटा मोटर्स की नैनो कार परियोजना के लिए चिन्हित की गई थी। उनकी लगभग 22 बिस्वा जमीन ली जानी थी, लेकिन परिवार ने मुआवजे के चेक लेने से इनकार कर दिया और अन्य लोगों के साथ जमीन के अधिग्रहण का कड़ा विरोध किया।
उमस भरी दोपहर में तन्मय दीवार के पास खड़े होकर ब्रश से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए पोस्टर तैयार कर रहे हैं। कॉलेज के दिनों में वह तृणमूल छात्र परिषद के सदस्य थे, लेकिन 2016 के बाद वह भगवा पार्टी में शामिल हो गए। आज वह पक्के तौर पर यह मान रहे हैं कि यदि उनके परिवार ने उस समय जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनकारियों का साथ नहीं दिया होता, तो हालात कुछ और ही होते।
घोष ने स्नातक तक पढ़ाई की है। वह स्पष्ट कहते हैं, ‘रोजगार के अवसर कहां हैं? अगर कारखाना यहां बन जाता, तो इससे रोजगार पैदा होता और आसपास का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र उसी हिसाब से विकसित होता।’ उन्हीं की तरह श्यामाचरण कोली की भी यही राय है। उन्होंने भी टाटा की परियोजना के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया था। वह कहते हैं, ‘मेरे दोनों बेटे हर दिन काम के लिए कोलकाता जाते हैं। इस बार मैं स्वेच्छा से अपनी जमीन किसी भी परियोजना को दे दूंगा, ताकि बेटों को यहीं रोजगार मिल जाए।’
सिंगूर में दो गुट हैं- एक चाहता था कि यहां उद्योग आएं और दूसरा इसका विरोध करता था। लगभग 20 लोग ऐसे थ, जिन्होंने जमीन अधिग्रहण का विरोध करते हुए मुआवजा लेने से इनकार कर दिया था। औद्योगीकरण के पक्ष में जो लोग थे, उन्होंन चुपचाप वाम मोर्चा सरकार से मुआवजे का चेक लेकर अपनी जमीन परियोजना के लिए दे दी थी। हालांकि इस आंदोलन में जीत ममता बनर्जी समर्थित छोटे समूह की हुई और लंबे आंदोलन के बाद 2008 में टाटा मोटर्स सिंगूर से बाहर निकल गई। नतीजा यह हुआ कि 2011 में राज्य में साढ़े तीन दशक बाद वाम मोर्चा सरकार से बेदखल हो गया और ममता मुख्यमंत्री बन गईं।
आज चाहे घोष परिवार हो या कोली, सभी को ममता सरकार हर महीने 2,000 रुपये और 16 किलोग्राम मुफ्त चावल देती है। बनर्जी ने जमीन अधिग्रहण का विरोध करने वाले भूमिहीनों को यह सहायता सामग्री देने का वादा किया था।
वैसे, 61 वर्षीय शेफाली रुईदास और उनके परिवार को यह सहायता सामग्री नहीं मिलती, क्योंकि अपने बेटों के लिए सुरक्षित भविष्य का सपना देखते हुए उन्होंने टाटा की परियोजना के लिए खुशी-खुशी अपनी जमीन छोड़ दी थी। शेफाली के पति के पास तीन बिस्वा जमीन थी। वह कहती हैं, ‘अपने बेटे की नौकरी की आस में हमने अपनी जमीन सरकार को सौंप दी थी। हालांकि न कारखाना बना और न उनके बेटे को नौकरी मिली।’
शेफाली अपने बड़े बेटे के साथ रहती हैं, जिसके कंधों पर परिवार के छह लोगों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है। वह सप्ताह में सात दिन काम करता है। बनर्जी की कल्याणकारी योजनाओं के साथ शेफाली और उनकी बहू मधुमिता द्वारा चलाई जाने वाली एक छोटी सी दुकान ही परिवार का सहारा है।
मधुमिता को हाल ही में बढ़ी हुई लक्ष्मी भंडार योजना के तहत हर महीने 1,700 रुपये मिलते हैं, जो 25 से 60 वर्ष की महिलाओं के लिए बुनियादी आमदनी है। शेफाली को वरिष्ठ नागरिक पेंशन योजना के तहत हर महीने 1,000 रुपये मिलते हैं। कल्याणकारी योजनाओं को ही ममता बनर्जी के समर्थन का आधार माना जाता है। भाजपा ने अपने चुनावी वादों में महिलाओं के लिए हर महीने 3,000 रुपये देने का ऐलान कर वित्तीय सहायता के रूप में ममता से बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की है, लेकिन शेफाली और मधुमिता में से कोई भी ऐसी घोषणाओं से प्रभावित नहीं दिखतीं। मधुमिता कहती हैं, ‘3,000 रुपये क्यों, 5,000 या 10,000 रुपये भी बेकार हैं। इनसे समस्या का समाधान नहीं होने वाला। हमें तो ऐसा वातावरण चाहिए, जिससे घर के पास रोजगार मिले। हमें जो जमीन लौटाई गई है, उसमें अब खेती नहीं हो सकती। यह बस खाली पड़ी है। यहां उद्योग लगे तो रोजगार का कुछ जरिया बने।’
भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में सिंगूर में औद्योगिक पार्क विकसित करने का वादा किया है। घोषणा पत्र जारी करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि संतुलित विकास और रोजगार को बढ़ावा देने के लिए भूमि का आधा हिस्सा एमएसएमई के लिए आरक्षित होगा, जबकि शेष जमीन बड़े उद्योगों के लिए दी जाएगी।
भाजपा के घोषणा पत्र पर टिप्पणी करते हुए कृषि विपणन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और सिंगूर से तृणमूल कांग्रेस विधायक बेचराम मन्ना ने कहा कि ये झूठे वादे हैं। उन्होंने कहा, ‘वे परियोजना कहां स्थापित करेंगे? जो जमीन टाटा को दी गई थी, वह तो अब वास्तविक मालिकों को लौटा दी गई है। ऐसे में किसी भी नई योजना के लिए नए सिरे से भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता होगी।’
उच्चतम न्यायालय ने 31 अगस्त 2016 को फैसला सुनाया था कि वाम मोर्चा सरकार द्वारा 2006 में सिंगूर में जमीन का अधिग्रहण कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन था। अदालत के निर्देश के अनुसार, जमीन उसके मूल मालिकों को लौटा दी गई और जो अधिग्रहण के पक्ष में थे, उन्हें जमीन का मुआवजा दिया गया। सवाल आज भी बना हुआ है कि इसमें कितनी जमीन खेती योग्य बची है।
हुगली जिले का यह ग्रामीण क्षेत्र वर्तमान में टीएमसी और भाजपा के रंगों से सराबोर है। दोनों दलों के झंडे गलियों में लहरा रहे हैं, लेकिन उद्योग की वकालत करने वाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोस्टर भी कहीं-कहीं दिखाई देते हैं, लेकिन भूमि आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे मन्ना जीत के प्रति आश्वस्त हैं। वह कहते हैं, ‘लोग इन झूठे वादों पर अपना फैसला देंगे।’
कभी तृणमूल के लिए सिंगूर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले रवींद्रनाथ भट्टाचार्य अब भाजपा का हिस्सा है। मन्ना को 2021 में भट्टाचार्य के खिलाफ मैदान में उतारा गया था। मन्ना ने 25,000 से अधिक मतों से जीत हासिल की थी। इस बार भाजपा ने एक हड्डी रोग विशेषज्ञ अरूप दास को मैदान में उतारा है। लेकिन, बड़ा सवाल उम्मीदवारों से अलग है। क्या जमीन में कारखाने लगेंगे? क्योंकि लोगों का मिजाज बदल रहा है। वे चाहते हैं कि उद्योग आएं और उन्हें रोजगार के नए अवसर मिलें। क्या सिंगूर चुनाव प्रचार के चंगुल से निकल कर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ पाएगा?