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अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) कार्यालय की धारा 301 के तहत हुई सुनवाई भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में एक नए टकराव का कारण बन गई है। इसमें अमेरिकी उद्योग समूह ने भारत पर सरकारी मदद से जरूरत से ज्यादा उत्पादन करने और बेजा तरीके से सब्सिडी देने के आरोप लगाया है और भारतीय सामान पर दंडात्मक शुल्क लगाने की मांग की है। भारतीय अधिकारियों ने जोरदार बचाव करते हुए तर्क दिया कि देश में विनिर्माण का विस्तार बाजार-संचालित और मांग आधारित है तथा यह पूरी तरह से वैश्विक व्यापार नियमों के अनुरूप है।
इस महीने की शुरुआत में हुई सुनवाई के दौरान अमेरिकन आयरन ऐंड स्टील इंस्टीट्यूट का प्रतिनिधित्व करने वाले जेरेमी हेकहूस ने कहा कि भारत सरकार ‘चीन की पुरानी चाल’ चल रही है और अपने घरेलू इस्पात क्षेत्र को भारी सब्सिडी दे रही है। उन्होंने कहा, ‘भारत ने 2025 में तैयार इस्पात के निर्यात में मजबूत वृद्धि दर्ज की जो ऐसे बाजार के लिए चिंताजनक है जो घरेलू वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करने का दावा करता है। देश का इस्पात उद्योग संरक्षित बाजार में काम करता है जिसे निर्यात प्रोत्साहन, ऋण माफी और तरजीही ऋणों सहित पर्याप्त सरकारी सब्सिडी से लाभ होता है।’
धारा 301 की जांच को व्यापक रूप से अप्रैल 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए जवाबी शुल्क के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जिसे अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने फरवरी में रद्द कर दिया था।
मैंगनीज फेरोअलॉय के अमेरिका में प्रमुख विनिर्माता एरामेट मैरिएट का प्रतिनिधित्व करने वाले निकोलस फेल ने कहा कि अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग ने बार-बार पाया है कि भारतीय फेरोअलॉय उत्पादक निर्यात-उन्मुख हैं और उनके पास उत्पादन की पर्याप्त अतिरिक्त क्षमता और अप्रयुक्त क्षमता है। इसलिए हम भारत और मलेशिया से मैंगनीज फेरोअलॉय और अन्य प्रतिस्पर्धी उत्पादों के आयात पर धारा 301 के तहत शुल्क उपायों का समर्थन करते हैं।
अलायंस फॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग ऐंड ट्रेड का प्रतिनिधित्व करने वाली विली रेन की लॉरा एल सबावी ने कहा कि भारतीय सौर उत्पादकों को निर्यात सब्सिडी, ऋण गारंटी और कर छूट सहित पर्याप्त सरकारी सब्सिडी मिलती है, जिससे भारतीय उत्पादकों को अपने उत्पादन और अमेरिका के सौर बाजार में निर्यात को तेजी से बढ़ाने में मदद मिली है। उन्होंने कहा, ‘सरकारी नीतियों से पिछले साल अंत तक भारत की सौर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता सालाना 125 गीगावाट को पार करने की राह पर थी।’
अमेरिकी उद्योग प्रतिनिधियों के दावों को बेबुनियाद बताते हुए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के व्यापार और निवेश केंद्र के प्रमुख जेम्स नेदुमपारा ने यूएसटीआर को बताया कि जांच ‘अमेरिकी कानून के तहत वैधानिक सीमा को पूरा नहीं करती है’ और नोटिस में ऐसी किसी भी विशिष्ट भारतीय सरकारी अधिनियम, नीति या कार्यप्रणाली की पहचान करने में विफल रही है जिसे कार्रवाई योग्य माना जा सके।