देश के कृषि क्षेत्र पर पश्चिम एशिया का संकट जारी रहने की स्थिति में प्रभाव पड़ सकता है। वित्त वर्ष 26 में भारत के कुल सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) में कृषि की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत थी। देश के कुल खाद्य निर्यात का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया को होता है। हालांकि कृषि के प्रमुख इनपुट जैसे उवर्रक की आपूर्ति लंबे समय में मुश्किल हो सकती है।
ग्लोबल ट्रेड ऐंड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) नामक शोध संस्था की हालिया रिपोर्ट के अनुसार ईरान के साथ लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत के कृषि क्षेत्र को खासा नुकसान पहुंचा सकता है। कारण यह है कि पश्चिम एशिया को वर्ष 2025 में 11.8 अरब डॉलर का निर्यात हुआ था और यह भारत के कुल कृषि निर्यात का पांचवां हिस्सा था।
इस संकट से प्रभावित होने वाली फसलों में अनाज में विशेष रूप से चावल, फल, सब्जियां, मसाले, मांस, डेरी और पेय पदार्थ शामिल हो सकते हैं। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने बताया, ‘कई भारतीय कृषि उत्पाद खाड़ी बाजारों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इसलिए व्यवधान जारी रहने पर कई भारतीय राज्यों के किसानों, खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं और निर्यातकों पर सीधा असर पड़ सकता है।’
रिपोर्ट के अनुसार चावल का निर्यात सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका है। भारत का 2025 में पश्चिम एशिया को चावल निर्यात 4.43 अरब डॉलर था। यह वैश्विक चावल निर्यात का 36.7 प्रतिशत था। लिहाजा खाड़ी देशों का बाजार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के उत्पादकों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हो गया है।
भारत के जिन उत्पादों का 70 प्रतिशत निर्यात पश्चिम एशिया को होता है, वे ‘अत्यधिक जोखिम वाले उत्पाद’ हैं। इनमें भेड़ और बकरी का मांस (98.9 प्रतिशत), ताजा या ठंडा गोमांस (97.4 प्रतिशत), खोपरा या सूखा नारियल (83.9 प्रतिशत), बीयर (81 प्रतिशत), केले और प्लांटैन (79.6 प्रतिशत) और जायफल, जावित्री व इलायची (70.5 प्रतिशत)शामिल हैं।