कंपनी कानून संशोधन विधेयक में छोटी कंपनियों के चुनिंदा वर्ग या वर्गीकृत कंपनियों के लिए संवैधानिक ऑडिटर की जरूरत को खत्म कर दिया गया है। इससे छोटी कंपनियों के लिए अनुपालन की सहजता होगी। छोटी कंपनियों के चुनिंदा वर्ग या कंपनियों के वर्गीकरण को बाद में अधिसूचित किया जाएगा।
विशेषज्ञों का तर्क है कि इस कदम से व्यवसाय करने में आसानी होगी। हालांकि इसमें वित्तीय अनुशासन और तीसरे पक्ष की निगरानी को कमजोर करने की क्षमता है। कॉर्पोरेट प्रोफेशनल के कॉर्पोरेट अफेयर्स ऐंड कंप्लायंस प्रमुख अंकित सिंघी ने कहा, ‘यह स्वागत योग्य कदम है। हालांकि सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी कई छोटी कंपनियां केवल कोष की आवाजाही या प्रविष्टियों के लिए बिचौलियों के रूप में स्थापित की जा रही हैं। इसलिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।’
सूत्रों ने बताया कि चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की अगली परिषद की बैठक में भी इस संशोधन पर चर्चा होने की उम्मीद है। कारण यह है कि यदि बड़ी संख्या में छोटी कंपनियों को ऑडिट की आवश्यकता से छूट दी जाती है तो कई सीए के व्यवसायों पर इसका असर पड़ेगा।
अन्य महत्वपूर्ण संशोधन में विधेयक ने प्रस्तावित किया है कि कंपनी का पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक जो निदेशक नहीं है, जैसे सीईओ या सीएफओ। इनका इस्तीफा कंपनियों के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में दायर नहीं करने की स्थिति में यह पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक अपना इस्तीफा रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज को दायक करेगा।
केएस लीगल ऐंड एसोसिएट्स की प्रबंध भागीदार सोनम चंदवानी ने कहा, ‘ये प्रस्तावित संशोधन छोटे संस्थाओं के लिए अनुपालन को आसान बनाने के साथ-साथ व्यक्तिगत जवाबदेही को मजबूत करने की ओर स्पष्ट नियामक बदलाव को दर्शाते हैं, लेकिन वे कंपनी कानून के भीतर कुछ संरचनात्मक खिंचावों को भी उजागर करते हैं।’
चंदवानी ने कहा कि गैर-निदेशक केएमपी को स्वतंत्र रूप से अपना इस्तीफा दाखिल करने की अनुमति देने वाला प्रावधान प्रबंधन द्वारा दमन के खिलाफ स्वागत योग्य सुधार है और पारदर्शिता के सिद्धांतों के अनुरूप है। इससे पद छोड़ने के बाद निरंतर ‘माना गया दायित्व’ के जोखिम को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह संकट की स्थितियों के दौरान सामरिक रूप से उपयोग किए जाने पर गवर्नेंस अस्थिरता को तेजी से बढ़ा सकता है।
विधेयक ने यह भी प्रस्तावित किया है कि किसी व्यक्ति के पास निदेशक के रूप में नियुक्त होने के समय और पूरे कार्यकाल के दौरान वैध निदेशक पहचान संख्या (डीआईएन) होनी चाहिए। वैध डीआईएन की अनुपस्थिति में ऐसे निदेशक का पद खाली माना जाएगा जो अयोग्यता का नया आधार पेश करता है। कंपनी कानून के विशेषज्ञों ने कहा कि अनिवार्य ‘सभी समय पर वैध डीआईएन’ आवश्यकता, पता लगाने की क्षमता को मजबूत करने और निष्क्रिय या निष्क्रिय पहचान के दुरुपयोग को रोकने के साथ-साथ, व्यवहार में कठोर हो सकती है, खासकर जहां डीआईएन का निष्क्रियण तकनीकी गैर-अनुपालन (जैसे केवाईएल चूक) के कारण होता है।
लोक सभा में सोमवार को कंपनी कानून संशोधन विधेयक पेश किया गया। इसमें महत्त्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इसके अंतर्गत विभिन्न प्रक्रियात्मक चूक का अपराधीकरण समाप्त करना, एनएफआरए को मजबूत करना, गैर-ऑडिट सेवाओं के लिए सख्त प्रावधान और शेयरों की पुनर्खरीद में लचीलापन शामिल थे। कंपनी कानून संशोधन विधेयक में कंपनी अधिनियम, 2013 और सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008 में परिवर्तन शामिल हैं। विधेयक को संसद की संयुक्त समिति को भेजा गया है।