केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान | फाइल फोटो
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को देश के कंपनी जगत की शोध फंडिंग के तरीके की आलोचना की और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) खर्च को ‘प्रतीकात्मक’ बताया। उन्होंने कंपनियों से सीधे शोध एवं नवाचार में निवेश बढ़ाने की अपील की। आईआईटी मद्रास टेक्नॉलजी समिट में शिरकत करते हुए प्रधान ने कहा कि भारत की शोध प्रणाली अब भी सरकार पर बहुत अधिक निर्भर है और कुल निवेश का लगभग 70 प्रतिशत सार्वजनिक क्षेत्र से आता है।
उन्होंने कहा, ‘यह अच्छा संकेत नहीं है। इस हिस्से को कम से कम आधा होना चाहिए और उद्योग से 50 प्रतिशत शोध निवेश आना चाहिए।’ उन्होंने यह भी कहा कि उद्योग, भारतीय संस्थानों और नवाचार केंद्रों पर पर्याप्त भरोसा नहीं कर रहा है। प्रधान ने कहा कि कंपनियों को शोध फंडिंग को सीएसआर गतिविधि के रूप में नहीं बल्कि मुख्य निवेश के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि नवाचार में खर्च सीधे लंबी अवधि की वृद्धि से जुड़ा है।
न्होंने कहा, ‘चीन का बाजार उसकी अपनी जनसंख्या है। इसी तरह, भारत का मुख्य बाजार भी उसकी अपनी जनसंख्या होना चाहिए और साथ ही ग्लोबल साउथ। पूरा ग्लोबल साउथ भारत की लागत-कुशलता पर निर्भर है।’
प्रधान ने सवाल किया कि कंपनियां फैक्टरियों, बुनियादी ढांचा और मानव संसाधनों में निवेश करती हैं तब फिर घरेलू शोध का समर्थन करने में क्यों हिचकिचाती हैं। उन्होंने कहा कि उद्योग अक्सर विदेश से तकनीक या लाइसेंस खरीदना पसंद करता है जो विदेश में भारतीयों द्वारा विकसित किए जाते हैं बजाय इसके कि वे देश के नवाचार की फंडिंग करें। प्रधान ने अनुसंधान राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन (एएनआरएफ) की भूमिका पर जोर डालते हुए कहा कि यह मंच उद्योग, शोध संस्थानों और स्टार्टअप को जोड़ने और सहयोगी नवाचार को सक्षम बनाने के लिए बनाया गया है।
सरकार की 1 लाख करोड़ रुपये की शोध, विकास एवं नवाचार (आरडीआई) योजना भी इसी दिशा में है। यह योजना खासकर निजी क्षेत्र से शोध निवेश बढ़ाने के लिए बनाई गई है। एएनआरएफ के तहत संचालित इस योजना में लंबी अवधि के लिए शोध और नवाचार परियोजना को वित्तीय समर्थन दिया जाता है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।