भारत से लोगों को दुनिया घुमाने की कमान यूरोप और ब्रिटेन की विमानन कंपनियों ने संभाल ली है। हुआ यूं है कि ईरान युद्ध के बाद नए विमानों की कमी से जूझ रही एयर इंडिया छुट्टियां मनाने विदेश जाने वाले लोगों को सेवाएं देने में मुश्किलों का सामना कर रही है।
हालांकि, ईरान युद्ध खत्म होने की उम्मीद बढ़ गई है मगर लोग तुरंत उस तरह विदेश यात्रा पर नहीं जाने वाले हैं जैसा वे युद्ध शुरू होने से पहले जा रहे थे। इसकी वजह यह है कि कई विमानन कंपनियों ने जून (गर्मी की छुट्टियों का पहला महीना) के लिए अपनी सीटों की संख्या कम कर दी है। इसका मुख्य असर पश्चिम और दक्षिण-पूर्व एशिया के लोकप्रिय ठिकानों पर पड़ा है।
हालांकि, भारत से यूरोप और ब्रिटेन के लिए सीट क्षमता बढ़ी है क्योंकि ब्रिटिश एयरवेज और लुफ्थांसा जैसी विमानन कंपनियों ने अतिरिक्त सीधी उड़ानें शुरू की हैं। विदेशी विमानन कंपनियां या तो सेवाएं बढ़ा कर या भारत से बड़े विमान उड़ाकर अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। सबसे बड़ा इजाफा भारत से ब्रिटेन के लिए सीधी उड़ानों में देखा जा रहा है जहां जून में सीट क्षमता में 18.7 प्रतिशत का भारी इजाफा हुआ है।
युद्ध के कारण पश्चिम एशिया होते हुए भारत से यूरोप और अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या में भारी गिरावट का सामना करने वाली इन विमानन कंपनियों को इसलिए फायदा हो रहा है कि एयर इंडिया सेवाओं में युक्तिकरण के कारण और उड़ान की व्यवस्था नहीं कर पा रही है।
एयर इंडिया ने बोइंग से 470 से अधिक विमानों का ऑर्डर दिया है। ईंधन की बढ़ती कीमतों और पाकिस्तान के ऊपर उड़ान भरने पर लगी पाबंदियों समेत हवाई क्षेत्र से जुड़ी अन्य दूसरी दिक्कतों के कारण इस साल गर्मी में एयर इंडिया अपनी अंतरराष्ट्रीय सेवाओं को व्यवस्थित कर रही है। इन पाबंदियों के कारण उसे लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है।
इस विमानन कंपनी ने न केवल युद्ध से प्रभावित पश्चिम एशिया के लिए बल्कि थाईलैंड, सिंगापुर और मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशिया के लोकप्रिय पर्यटन केंद्रों और पड़ोसी देश श्रीलंका के लिए भी सीटों की संख्या कम कर दी है। ओएजी के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 20 सबसे व्यस्त देशों के जोड़ों में भारत और यूएई के बीच सीटों की क्षमता सबसे अधिक कम हुई है। जून में यह सालाना आधार पर 14.9 प्रतिशत कम हो गई है और 3,40,426 से अधिक सीटें कम हो गई हैं। यह गिरावट ईरान युद्ध के कारण आई है।
दूसरा प्रभावित क्षेत्र दक्षिण-पूर्व एशिया है जहां हवाई किराये 15 से 30 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। भारत से जाने वाली विमानन कंपनियों के लिए दूसरे सबसे बड़े बाजार थाईलैंड में जून में सीट क्षमता 10 प्रतिशत कम हुई है। कुल 2,66,000 सीटें कम कर दी गईं।
यही हाल सिंगापुर (जो तीसरा सबसे बड़ा बाजार है) का भी है जहां सीट क्षमता 12 प्रतिशत गिरी और 2,49,000 सीटें कम हो गई हैं। मलेशिया में भी सीटों की संख्या 15.4 प्रतिशत कम हुई और उस महीने 29,000 सीटें कम की गईं।
पश्चिम एशिया में सीटों की संख्या में भारी कटौती केवल यूएई तक सीमित नहीं है। यूएई, सऊदी अरब, ओमान और कतर में कुल सीट क्षमता जून में 11 प्रतिशत गिरकर 15 लाख सीट रह गई है।
ट्रैवल एजेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष अनिल कल्सी ने कहा,‘पश्चिम एशिया जाने वाले 30 प्रतिशत भारतीय वहां से यूरोप या अमेरिका के लिए मार्ग बदलते हैं। युद्ध ने इस कारोबार पर बुरा असर डाला है और यूरोप एवं ब्रिटेन की विमानन कंपनियों ने इस मौके का फायदा उठाया है।’ विमानन कंपनियों द्वारा एशियाई मार्गों पर सीटें कम करने से ब्रिटेन और यूरोप के लोकप्रिय गंतव्यों के लिए संभावनाएं बेहतर हुई हैं।