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टैक्स और दीवाला कानून में ठनी: पुरानी कंपनियों के खरीदारों को ‘घाटे के लाभ’ पर मिली तगड़ी चुनौती

आयकर विभाग और दीवाला कानून (IBC) के बीच नियमों के टकराव से नई मुश्किलें पैदा हो गई हैं। कर अधिकारी अब दिवालिया कंपनियों के पुराने घाटे पर टैक्स लाभ देने से इनकार कर रहे हैं

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बीएस संवाददाता   
Last Updated- May 03, 2026 | 10:20 PM IST

समाधान प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों के लिए दीवाला कानून और कर नियमों में बढ़ते टकराव के कारण नई अनिश्चितता की स्थिति आ गई है।  विशेषज्ञों का कहना है कि कर अधिकारी, राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) द्वारा योजनाओं को मंजूरी देने के बाद भी कंपनियों को पिछले घाटे को आगे ले जाने (लॉस कैरी-फॉरवर्ड) के लाभ से लगातार इनकार कर रहे हैं।

दीवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत  फंसी कंपनियों का अधिग्रहण समाधान प्रक्रिया के माध्यम से नए मालिकों द्वारा किया जाता है। खरीदार अक्सर कंपनी के संचित घाटे को ध्यान में रखते हैं, क्योंकि ऐसे नुकसान भविष्य की कर देनदारी को कम कर सकते हैं। बहरहाल अब इस लाभ पर सवाल उठाया जा रहा है।

इस मसले की व्याख्या करते हुए टैक्स कनेक्ट एडवाइजरी के पार्टनर विवेक जालान ने कहा कि आयकर अधिनियम में आमतौर पर कंपनियों को शेयरधारिता में बड़े बदलाव की स्थिति में घाटे को आगे ले जाने की अनुमति नहीं होती है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 79 के तहत कंपनियों को आम तौर पर तब तक घाटे को आगे ले जाने की अनुमति नहीं है, जब तक कि उनकी 51 प्रतिशत से अधिक शेयरधारिता में बदलाव न हो। यह दीवाला मामले में सामान्य है।  

उन्होंने कहा, ‘दीवाला समाधान को समर्थन देने के लिए अपवाद लाया गया था, जिसमें ऐसे घाटे को बरकरार रखने की अनुमति दी गई है, अगर स्वामित्व में बदलाव आईबीसी समाधान योजना के माध्यम से हुआ है।’ लेकिन इस राहत के साथ एक शर्त जुड़ी हुई है।

 जालान ने बताया, ‘कानून के मुताबिक समाधान योजना को मंजूरी देने से पहले संबंधित र अधिकारी को अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर देना होता है।’ कई मामलों में कर अधिकारी इस आधार पर लाभ से इनकार कर रहे हैं कि उन्हें औपचारिक रूप से सूचित नहीं किया गया था या दीवाला प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया था। 

इसका मतलब यह है कि अगर समाधान योजना को एनसीएलटी ने मंजूरी दे भी दी है तो कंपनियां पिछले नुकसान को इस्तेमाल करने की क्षमता खो सकती हैं, क्योंकि प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है।  विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या की जड़ दोनों कानूनों के बीच तालमेल की कमी में निहित है।

राठी ऐंड कंपनी के पार्टनर पराग राठी ने कहा कि यह असंगति कानूनी डिजाइन में एक अंतर से पैदा हुई है। कर कानून में कहा गया है कि अधिकारियों को सुना जाना चाहिए, लेकिन दीवाला ढांचे में योजना को मंजूरी देने से पहले कर अधिकारियों को सूचित करने की विशेष रूप से जरूरत नहीं है। 

First Published : May 3, 2026 | 10:20 PM IST