भारत की प्रमुख फार्मा कंपनियां स्पेशलिटी दवाओं, कॉम्प्लेक्स जेनेरिक्स, श्वसन संबंधी उत्पादों और स्थानीय विनिर्माण रणनीतियों के जरिये अमेरिकी बाजार में अपना निवेश बढ़ा रही हैं, जबकि दूसरी ओर कीमतों के दबाव, इन्वेंट्री में कमी और पारंपरिक जेनेरिक्स में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते वित्त वर्ष 2026 में उस देश को भारत का दवा निर्यात लगभग 10 प्रतिशत कम हो गया है।
फार्मएक्सिल के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में अमेरिका को निर्यात 9.47 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9.98 प्रतिशत कम है। टीके सबसे तेजी से बढ़ने वाली श्रेणी के रूप में उभरे, जबकि यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका (लैटम) ने अमेरिकी बाजार की तुलना में मजबूत वृद्धि दर्ज की।
फार्मएक्सिल के चेयरमैन नमित जोशी ने कहा कि अमेरिकी बाजार में आई गिरावट ऊंचे आधार प्रभाव, जेनेरिक दवाओं की कीमतों में कमी, इन्वेंट्री में गिरावट और उत्पाद चक्र समय के कारण थी और यह कोई ढांचागत चिंता का विषय नहीं है। जोशी ने वित्त वर्ष 2026 के निर्यात की समीक्षा करते हुए कहा, ‘अमेरिका सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। एएनडीए का प्रवाह मजबूत बना हुआ है और स्पेशियल्टी जेनेरिक्स तथा इंजेक्टीबल्स में अवसर मजबूत बने हुए हैं।’
कई भारतीय दवा कंपनियां अपनी अमेरिकी ऑर्डर प्रवाह, स्पेशियल्टी पोर्टफोलियो और निर्माण क्षमताओं का विस्तार कर रही हैं। कंपनियां श्वसन संबंधी उत्पादों, इंजेक्टीबल्स, बायोसिमिलर्स और दुर्लभ बीमारियों के इलाज में अपना निवेश बढ़ा रही हैं। साथ ही, वे अमेरिकी बाजार के और करीब पहुंचने तथा सामान्य ओरल जेनेरिक दवाओं पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए 505(बी)(2) फाइलिंग और चुनिंदा स्थानीय निर्माण जैसे अलग-अलग नियामकीय तरीकों को भी अपना रही हैं।
विभिन्न कंपनियों के अधिकारियों ने बड़े ऑर्डर प्रवाह, विशिष्ट उत्पाद फाइलिंग और बाजार के अधिक करीब विनिर्माण क्षमताओं को अमेरिका में विकास के अगले चरण के रूप में चिन्हित किया है।
सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज में यह बदलाव पहले से ही दिखाई दे रहा है। उत्तरी अमेरिका में सन फार्मा के मुख्य कार्याधिकारी रिचर्ड एशक्रॉफ्ट ने कंपनी की अर्निंग्स कॉल के दौरान कहा, ‘जेनेरिक्स की तुलना में, अमेरिका में अब नई दवाएं सबसे बड़ा बिजनेस बन गई हैं।’
मोतीलाल ओसवाल ने कहा कि सन फार्मा का अमेरिकी जेनेरिक्स बिजनेस बेस पोर्टफोलियो की कीमतों में गिरावट से प्रभावित हुआ, जबकि नई दवाएं वृद्धि को आगे बढ़ाती रहीं। ब्रोकरेज ने अमेरिका में बढ़ते खर्च और जेनेरिक्स में धीरे-धीरे हो रही रिकवरी पर भी जोर दिया।
इस बीच, ल्यूपिन ने अपने भारतीय समकक्षों के बीच अमेरिका में सबसे मजबूत प्रदर्शन में से एक दर्ज किया। वित्त वर्ष 2026 में उसका अमेरिकी कारोबार सालाना आधार पर लगभग 40 प्रतिशत बढ़कर 1.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। फिर भी, कंपनी ने अमेरिकी जेनेरिक बाजार में लगातार बने मूल्य निर्धारण संबंधित दबाव और बढ़ती प्रतिस्पर्धा को भी स्वीकार किया।
ल्यूपिन की अर्निंग्स कॉल के दौरान कंपनी की सीईओ विनीता गुप्ता ने कहा, ‘इस साल हमारे मुख्य कारोबार में भी बढ़ोतरी हुई। इसकी वजह ज्यादा बिक्री थी, जिसने कुछ खास उत्पादों में कीमतों में हुई मामूली गिरावट और जेनेरिक उत्पादों से मिली अतिरिक्त चुनौती की भरपाई कर दी।’
वहीं सिप्ला अमेरिका में, विशेष रूप से जटिल श्वसन उत्पादों के लिए बाजार को ध्यान में रखकर निर्माण की रणनीति पर जोर दे रही है।