प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय दवा कंपनी बायोकॉन दुनिया की ‘सबसे बड़ी’ इंसुलिन कंपनी बनना चाहती है, क्योंकि बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनियां जीएलपी-1 दवाओं जैसी मधुमेह (डायबिटीज) की नए उपचारों की तरफ जा रही हैं। यह कहना है बायोकॉन की चेयरपर्सन किरण मजूमदार-शॉ का। उन्होंने कहा, ‘बड़ी इंसुलिन कंपनियां कार्ट्रिज या पेन में इंसुलिन नहीं बनाना चाहतीं। वे शीशियों में इंसुलिन बेचने का रुख कर रही हैं, क्योंकि वे जीएलपी-1 के मौकों पर ध्यान देना चाह रही हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि यह पद्धति उम्मीद जगाती है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं।
टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित रोगी और यहां तक कि बाद वाले चरण के टाइप-2 रोगी इन दवाओं पर निर्भर नहीं रह सकते और इसलिए इंसुलिन अनिवार्य है। बायोकॉन उन कुछ वैश्विक कंपनियों में से एक है, जिनके पास इंसुलिन और जीएलपी-1 उपचार पद्धतियों में क्षमता है। उन्होंने बेंगलूरु में मीडिया के साथ बातचीत के दौरान कहा कि कंपनी की अमेरिका के इंसुलिन बाजार में खासी मौजूदगी है और वह उन 80 बाजारों में विस्तार की योजना बना रही है, जिनमें उसे मंजूरी मिली हुई है।
बायोकॉन ‘वैल्यू मैक्सिमाइजेशन’ (मूल्य अधिकतम करने की प्रक्रिया) पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यह ऐसी रणनीति है, जिसमें पूंजी आवंटन इंसुलिन और जीएलपी-1 उपचार पद्धतियों के बीच तुलनात्मक मार्जिन से तय होता है, क्योंकि ऑफ-पेटेंट (जिनका पेटेंट खत्म हो चुका है) जीएलपी-1 दवाओं की कीमत उभरते बाजारों में कम होती हैं। उन्होंने कहा, ‘हमें मूल्य निर्धारण को देखना होगा और यह देखना होगा कि क्या इंसुलिन में जीएलपी-1 की तुलना में
बेहतर मार्जिन है और फिर हम इंसुलिन निर्माण पर अधिक ध्यान केंद्रित करेंगे।’ बायोकॉन के नए प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी श्रीहास ताम्बे ने कहा कि कंपनी की भारत में वैश्विक दिग्गज बनने की आकांक्षा है और वह जीवन रक्षक दवाओं को अधिक सस्ती बनाने वाले नवाचारों पर ध्यान दे रही है।
ताम्बे ने कहा कि अब 60 प्रतिशत से अधिक बीमारियां गैर-संचारी हैं और अगले दशक में वैश्विक स्तर पर मधुमेह के मामले 45 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 85 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। उन्होंने कहा, ‘स्वास्थ्य सेवा खर्च तीन प्रमुख क्षेत्रों – ऑन्कोलॉजी, इम्यूनोलॉजी और मधुमेह में होने जा रहा है। हम पहले से ही इन क्षेत्रों पर ध्यान दे रहे हैं।’
बायोकॉन ने वित्त वर्ष 26 के पहले नौ महीने में 7,676 करोड़ रुपये का बायोसिमिलर राजस्व दर्ज किया। इसमें इंसुलिन इस श्रेणी में प्रमुख हिस्सा है, लेकिन उसे जाहिर नहीं किया गया है। साल 2025 में वैश्विक इंसुलिन बाजार 29 से 31 अरब डॉलर का रहने का अनुमान था। इसमें भारत की हिस्सेदारी लगभग 65 से 70 करोड़ डॉलर थी, जो देश में अवसरों की व्यापकता को बताता है।