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मोदी कैबिनेट का बड़ा फैसला: IBC और कंपनी कानून में बदलाव को मंजूरी, व्यापार करना होगा आसान

सूत्रों के अनुसार कंपनी अधिनियम और एलएलपी अधिनियम में किए गए बदलावों का उद्देश्य व्यवसायों पर प्रक्रियाओं और अनुपालन के बोझ को कम करना है

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रुचिका चित्रवंशी   
Last Updated- March 10, 2026 | 10:04 PM IST

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिवाला व ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के साथ कंपनी व सीमित देयता अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दे दी। यह जानकारी आधिकारिक सूत्रों ने मंगलवार को दी। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने बीते साल अगस्त में आईबीसी विधेयक पेश किया था। फिर इसे संसद की प्रवर समिति को भेज दिया गया था। जानकारी के अनुसार समिति के ज्यादातर सुझावों को स्वीकार किया गया है और इन्हें विधेयक में शामिल किया गया है।

सूत्रों के अनुसार कंपनी अधिनियम और एलएलपी अधिनियम में किए गए बदलावों का उद्देश्य व्यवसायों पर प्रक्रियाओं और अनुपालन के बोझ को कम करना है। दोनों अधिनियमों के तहत व्यापार करने में आसानी के लिए विभिन्न प्रपत्रों को युक्तिसंगत बनाने के साथ-साथ अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर भी अधिक कार्रवाई का प्रस्ताव है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहले ही कहा था कि आईबीसी विधेयक संसद के बजट सत्र के दूसरे भाग में पेश किया जाएगा।

आईबीसी विधेयक में ऋण-आधारित दिवालियापन समाधान प्रक्रिया, समाधान योजनाओं के लिए दो-स्तरीय अनुमोदन ढांचा और समूह व सीमा पार दिवालियापन के प्रावधानों सहित कई महत्त्वपूर्ण बदलावों का प्रस्ताव है।

विधेयक में राज्य या केंद्रीय अधिकारियों द्वारा उठाए गए दावों से संबंधित महत्त्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया गया है। इसके अनुसार यदि पक्षों के बीच संविदात्मक समझौता है, तभी ऐसे दावों को सुरक्षित लेनदार माना जाएगा और उन्हें आईबीसी में स्वतः ही उच्च प्राथमिकता नहीं मिलेगी। प्रस्तावित विधेयक में नया खंड जोड़कर महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। यह दिवालिया समाधान प्रक्रिया के तहत व्यक्तिगत या कॉर्पोरेट गारंटर की संपत्तियों को ऋणदाताओं को हस्तांतरित करने की अनुमति देता है।

खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर प्रतीक कुमार ने कहा, ‘दिवाला व शोधन अक्षमता संहिता और कंपनी अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब प्रणालीगत देरी को कम करने और सीमा पार दिवालियापन को बढ़ावा देने की तत्काल जरूरत है।’

संसद की प्रवर समिति द्वारा दिए गए महत्त्वपूर्ण सुझावों में से एक यह था कि न्यायनिर्णय प्राधिकारी स्तर पर होने वाली देरी को अधिक सक्रियता से दूर किया जाए और समाधान पेशेवरों के लिए सख्त सुरक्षा उपाय लागू किए जाएं ताकि उनकी निष्ठा में कोई कमी न आए। संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि विधेयक में संशोधन करके एक ऐसा प्रावधान शामिल किया जाए जो समाधान पेशेवर (आरपी) को परिसमापक बनने से रोके।

First Published : March 10, 2026 | 10:04 PM IST