उद्योग

CBSE और NEET विवाद से डगमगाया कंपनियों का भरोसा, नौकरी के लिए अब देना पड़ सकता है अलग से टेस्ट

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटाओं के बाद उद्योग जगत नौकरी के उम्मीदवारों को अलग से परखकर यह तय करने के लिए मजबूर हो सकता है

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गुलवीन औलख   
अहोना मुखर्जी   
Last Updated- June 02, 2026 | 10:23 PM IST

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) पर हाल में छिड़े विवाद के बाद छात्रों को मिले अंकों में नियोक्ताओं का भरोसा डगमगा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटाओं के बाद उद्योग जगत नौकरी के उम्मीदवारों को अलग से परखकर यह तय करने के लिए मजबूर हो सकता है कि वे नौकरी पर रखने के लायक हैं या नहीं। ऐसे में उद्योग का बोझ ही बढ़ेगा।

बड़ी कंपनियों के लिए मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं क्योंकि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) में निवेश पर वे अभी बहुत नापतोल कर कदम बढ़ा रहे हैं। 

टीमलीज ग्रुप की शिक्षा एवं रोजगार इकाई टीमलीज एडटेक के संस्थापक एवं सीईओ शांतनु रूज ने कहा,‘बड़े पैमाने पर भर्ती में शैक्षिक कसौटी पर भरोसा थोड़ा भी दरका तो परिचालन से जुड़ा बोझ काफी बढ़ सकता है।’

रूज ने कहा कि अगर स्कूल या कॉलेज में मूल्यांकन के तरीकों की की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे तो नियोक्ताओं को भर्ती से पहले उम्मीदवारों की दावेदारी जांचने के लिए योग्यता परीक्षण, संचार मूल्यांकन, एआई और डिजिटल तत्परता जांच और पर्यवेक्षित मूल्यांकन जैसी अतिरिक्त स्क्रीनिंग प्रक्रियाएं लागू करनी पड़ सकती हैं। उन्होंने कहा कि इन तमाम प्रक्रियाओं से उन पर बोझ काफी बढ़ सकता है।

उन्होंने कहा,‘एक मोटे अनुमान के मुताबिक प्रति 10,000 आवेदकों के परीक्षण, मूल्यांकन कार्य और पुनः जांच (री-स्क्रीनिंग) पर प्रति उम्मीदवार 300 से 700 रुपये का खर्च से अलग से आया तो भी 30 से 70 लाख रुपये तक का खर्च बढ़ सकता है। यह खर्च तो प्रशिक्षण से पहले ही हो जाएगा। और इसके बाद भी तो कई खर्च हैं।’

अलग से मूल्यांकन और जांच-पड़ताल से नियोक्ताओं का झंझट बढ़ सकता है। यानी कार्यभार संभालने में देरी हो सकती है, चयन के बाद भी कर्मचारी निकाले जा सकते हैं और नए लोगों को नियुक्त करने की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। उन्होंने कहा,‘एआई आने के बाद शुरुआती स्तर पर नए लोगों से अपेक्षाएं काफी बढ़ गई हैं। इससे नियोक्ता केवल शैक्षणिक अंक पत्रों को नौकरी का आधार मानने के बजाय व्यावहारिक क्षमता का परीक्षण करेंगे।’

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘व्यवस्थागत गड़बड़ी होने पर दो चुनौतियां सामने आती हैं। सबसे पहले तो चयन गलत हो सकता है जिससे गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूसरी चुनौती यह होगी कि प्रतिभा का पलायन हो सकता है। यानी मेधावी छात्र आगे की पढ़ाई के लिए देश से बाहर चले जाते हैं। ये दोनों ही बातें देश के लिए हानिकारक हैं। भारतीय कंपनियों को उम्मीदवारों के चयन के लिए और अधिक जांच-पड़ताल करनी होगी। सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि मौजूदा समस्या इतनी बड़ी है कि पूरा देश इसकी चपेट में आ जाता है। इसकी अनदेखी बिल्कुल नहीं की जा सकती।’

ओडगर्स की शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख अमृता दत्ता ने कहा कि एक संवेदनशील समुदाय का विश्वास हिलने से पूरे राष्ट्र का भविष्य हिल जाता है।  

ओडगर्स एक वैश्विक कार्यकारी खोज एवं नेतृत्व सलाहकार कंपनी है। दत्ता के मुताबिक मूल्यांकन प्रणालियों में खामियों की वजह से  योग्यता-आधारित मानदंड विकृत हो जाते हैं जिससे योग्य छात्र अच्छे अवसर से वंचित रह सकते हैं जबकि कम योग्य उम्मीदवार आगे निकल जाएंगे।

दत्ता ने आगाह किया कि इस तरह की खामियां समय के साथ संस्थानों को कमजोर कर सकती हैं और स्कूल या कॉलेज स्तर की मूल्यांकन प्रणालियों की विश्वसनीयता में सेंध लगा सकती हैं।

एक्सफेनो के सह-संस्थापक अनिल एथानुर भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के अंक, प्रमाणपत्र और योग्यताएं आम तौर पर प्रतिस्पर्द्धी भर्ती प्रक्रियाओं में नियोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मुख्य मानदंड होते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रणाली में खामियां होने से योग्य छात्र पीछे रह जाएंगे हैं और कमजोर लोग आगे बढ़ते जाएंगे। कंपनी जगत की ये चिंताएं इस वर्ष भारत की कुछ बड़ी परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बीच सामने आई हैं। 

सीबीएसई की नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली के उत्तर पुस्तिकाओं के साथ मिलान में गड़बड़ी, पन्नों के नदारद रहने, जांच त्रुटियां, पोर्टल की गड़बड़ियों और मूल्यांकन में अनियमितताओं से जुड़ी कई शिकायतों सामने आई हैं। सीबीएसई इस प्लेटफॉर्म से जुड़े साइबर सुरक्षा संबंधी आरोपों की भी जांच कर रहा है।

ओडगर्स की दत्ता ने छात्रों पर बढ़ते मनोवैज्ञानिक दबाव की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा,‘भारतीय छात्र और कितना तनाव झेल सकते हैं? व्यवस्थागत खामियां पहले से ही तनाव से जूझ रहे छात्रों पर मनोवैज्ञानिक दबाव और बढ़ा देती हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो नीट की तैयारी मध्य कक्षाओं में शुरू हो सकती है जिससे तनाव और बढ़ने का खतरा है।’

उन्होंने तर्क दिया कि बार-बार विवाद प्रतिस्पर्द्धा बढ़ा सकते हैं और परीक्षा से जुड़ी तैयारियां कहीं न कहीं छात्रों एवं उनके अभिभावकों के लिए अत्यधिक तनाव का सबब बन जाएंगी।

First Published : June 2, 2026 | 10:23 PM IST