Representative image
देश में बीते तीन दशकों में निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च लगभग दस गुना तक बढ़ गया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की स्वास्थ्य पर घरेलू सामाजिक खपत पर 80वें दौर की सर्वेक्षण रिपोर्ट में ये चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी अस्पतालों में मरीजों द्वारा अपनी जेब से किया जाने वाला खर्च वर्ष 1995-96 में मात्र 4,822 रुपये था, जो 2025 आते-आते बढ़कर 50,508 रुपये हो गया है। यह दस गुना की भारी वृद्धि है। ऐसा नहीं है कि निजी अस्पतालों में ही तस्वीर बदली है, सरकारी अस्पतालों में भी इलाज का खर्च बढ़ा है। यहां खर्च 2,138 रुपये से बढ़कर 6,631 रुपये हो गया है, जो तीन गुना वृद्धि दर्शाता है।
निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच खर्च का अंतर अब काफी बढ़ गया है। जहां पहले यह अंतर दोगुना था, वहीं अब मरीजों को निजी अस्पतालों में सरकारी के मुकाबले सात गुना से अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है।
सर्वेक्षण में एक और महत्त्वपूर्ण बात सामने आई है कि तीन दशकों में पहली बार सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले ग्रामीण मरीजों का अपनी जेब से होने वाला खर्च शहरी मरीजों से अधिक हो गया है।
ग्रामीण परिवारों में सबसे निचले 20 प्रतिशत आय वर्ग में अस्पताल में भर्ती होने की लागत शहरी लोगों के मुकाबले अधिक पाई गई है। रिपोर्ट में यह भी दर्शाया गया है कि राज्यों में यह खर्च अलग-अलग हो रहा है। इसके अनुसार सबसे अधिक और सबसे कम खर्च करने वाले राज्यों के बीच लगभग तीन गुना का अंतर देखा गया है।