प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी ने उन लाखों लोगों के सामने चुनौती खड़ी कर दी है, जो ऐप आधारित कंपनियों के भरोसे अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। लगभग चार साल के लंबे अंतराल के बाद तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में करीब 3 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया है। इस बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में अब पेट्रोल की कीमत लगभग 97.77 रुपये और डीजल 90.67 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गई है। दरअसल, पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में चल रहे तनाव और ईरान से जुड़े विवादों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं, जिसका सीधा असर अब भारत के आम आदमी और खासकर गिग वर्कर्स की जेब पर पड़ रहा है।
इससे पहले LPG सिलेंडर के दाम भी बढ़े थे, जिसने पहले ही बजट बिगाड़ रखा था। ऐसे में तेल की नई कीमतों ने देश के करीब 1.2 करोड़ गिग वर्कर्स (जैसे डिलीवरी बॉय और कैब-ऑटो ड्राइवर) के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
इस अचानक बढ़े बोझ को देखते हुए ‘गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन’ (GIPSWU) ने सरकार और जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो, ओला, उबर, रैपिडो, पोर्टर और अमेजन फ्लेक्स जैसी बड़ी डिजिटल कंपनियों से तुरंत राहत देने की मांग की है। यूनियन ने चेतावनी दी है कि अगर उन्हें मुआवजा या बढ़ा हुआ किराया नहीं मिला, तो इस सेक्टर में काम करने वाले लोग भारी संकट में आ जाएंगे और वे इस काम को छोड़ने पर मजबूर होंगे।
विरोध जताने के लिए यूनियन ने आज दोपहर 12:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक ऐप-आधारित सेवाओं को पूरी तरह बंद रखने (शटडाउन) का ऐलान किया है। यूनियन ने आम जनता से भी इस शांतिपूर्ण बंद को समर्थन देने की अपील की है।
यूनियन की अध्यक्ष सीमा सिंह का कहना है कि यह बढ़ोतरी उन वर्कर्स के लिए एक बड़ा झटका है, जो पहले से ही भीषण गर्मी और हीटवेव के बीच सड़कों पर जूझ रहे हैं। उन्होंने सरकार और कंपनियों से मांग की है कि गिग वर्कर्स के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का सर्विस रेट तय किया जाए।
GIPSWU के नेशनल कोऑर्डिनेटर निर्मल गोराना के मुताबिक, देश के लगभग 60 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में से करीब 1.2 करोड़ लोग गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर हैं। ये लोग अपनी बाइक या स्कूटर के दम पर रोज की कमाई करते हैं। ईंधन, गाड़ी की सर्विसिंग और रखरखाव का खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन कंपनियां उस अनुपात में पैसा नहीं बढ़ा रही हैं। अपनी आजीविका चलाने के लिए महिला वर्कर्स और डिलीवरी पार्टनर्स को हर दिन भारी ट्रैफिक और खराब मौसम के बीच 10 से 14 घंटे तक काम करना पड़ रहा है।
नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि साल 2020-21 में भारत में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जिसके 2029-30 तक बढ़कर 2.3 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है। ऐसे में बिना किसी केंद्रीय सुरक्षा कानून के काम कर रहे इन करोड़ों युवाओं के भविष्य और वर्तमान पर महंगाई की यह मार बेहद भारी साबित हो रही है। यूनियन ने इस संबंध में सरकार और कंपनियों को ज्ञापन सौंपकर तुरंत दखल देने और फ्यूल कंपनसेशन (ईंधन मुआवजा) देने की मांग की है।